इतिहास के पन्नों में 15 फरवरी

  • 15 फरवरी 2012
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Image caption इस लड़ाई में लगभग 15 हजार सोवियत सैनिक भी मारे गए थे.

इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो 15 फरवरी के दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं दर्ज हैं.

1989: अफगानिस्तान से सोवियत सेना की वापसी

आज ही के दिन 1989 में तत्कालीन सोवियत संघ की सेना ने अफगानिस्तान से वापसी की थी.

अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद नजीबुल्लाह ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, ''मैं अफगानिस्तान की मदद करने के लिए सोवियत संघ की जनता और सोवियत सरकार का शुक्रिया अदा करता हूं.''

1979 में तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति लियोनिड ब्रेजनेव ने अफगानिस्तान में नजीबुल्लाह के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकार की मदद के लिए सेना भेजने का फैसला किया था.

लेकिन सोवियत संघ के इस फैसले के विरोध में अमरीका ने पाकिस्तान की मदद से अफगान मुजाहिदीन को लड़ाई करने के लिए तैयार कर दिया.

अमरीका ने पूरी दुनिया से इस्लामी लड़ाकों को जमा कर उन्हें हथियार और पैसे दिए और सोवियत सेना के खिलाफ युद्घ करने के लिए अफगानिस्तान भेजा.

सोवियत सेना और अफगान मुजाहिदीन के बीच हुई जंग में लगभग 10 लाख लोग मारे गए और उससे कहीं ज्यादा लोग देश छोड़कर पाकिस्तान और दूसरे देश चले गए.

इस लड़ाई में लगभग 15 हजार सोवियत सैनिक भी मारे गए थे.

अफगानिस्तान से वापसी के फैसले को भी सोवियत संघ ने अपनी जीत करार दिया था लेकिन ज्यादा तर लोगों का मानना था कि उनका ये फैसला सोवियत सेना के लिए बहुत बड़ी हार थी.

सोवियत सेना के जाने के बाद भी अफगानिस्तान में गृह युद्ध जारी रहा लेकिन तीन साल बाद 1992 में अफगान मुजाहिदीन ने नजीबुल्लाह को अपदस्थ कर दिया था और बुर्हानुद्दीन रब्बानी राष्ट्रपति बने थे.

1996: इराक को हथियार संबंधित रिपोर्ट जारी

आज ही के दिन 1996 में प्रतिक्षित रिपोर्ट जारी की गई थी जिसमें इस बात की जानकारी दी गई थी कि 80 के दशक में ब्रिटेन ने इराक को हथियार किन हालात में दिए और इसके लिए कौन से मंत्री ज़िम्मेदार थे.

हाई कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश सर रिचर्ड स्कॉट ने इस रिपोर्ट को तैयार करने में तीन साल लगाए थे.

अपनी रिपोर्ट में जस्टिस स्कॉट ने ब्रितानी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार ने हथियार निर्यात कानून में बदलाव की जानकारी ससंद को नहीं दी थी.

रिपोर्ट में अटॉर्नी जनरल और वित्त मंत्री के रोल की भी आलोचना की गई थी लेकिन प्रधानमंत्री ने उनपर किसी तरह की कार्वाई करने से इनकार कर दिया था.

इस रिपोर्ट के आने के बाद कंजरवेटिव पार्टी के नेता रॉबिन कुक ने मांग की थी कि जांच रिपोर्ट की सिफारिश को पूरी तरह लागू किया जाए लेकिन 1997 में सत्ता में आने के बाद से लेबर पार्टी ने स्कॉट रिपोर्ट की किसी भी सिफारिश को नहीं लागू किया था.

1942: दूसरे विश्व युद्ध में सिंगापुर का आत्मसमर्पण

Image caption जापानियों ने ब्रितानी साम्राज्य के लगभग 60 हज़ार सैनिकों को युद्ध बंदी बना लिया था

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1942 में आज ही के दिन सिंगापुर में मौजूद ब्रितानी सेना ने जापान के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया था.

तत्कालीन ब्रितानी प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल ने सिंगापुर के पतन को ब्रिटेन के इतिहास में सबसे बड़ी त्रासदी और आत्मसमर्पण करार दिया था.

जापानियों ने ब्रितानी साम्राज्य के लगभग 60 हज़ार सैनिकों को युद्ध बंदी बना लिया था.

उनमें 16 हजार ब्रितानी, 14 हजार ऑस्ट्रेलियाई और 32 हजार भारतीय सैनिक शामिल थे. जापानी सैनिकों ने भारी मात्रा में गोलेबारूद और हथियार भी कब्जा कर लिया था.

इसके बाद जापानी सेना बर्मा होते हुए भारत की सीमा तक पहुंच गई थी.

प्रशांत क्षेत्र में जापानी सैनिकों की बढ़त पर आख़िरकार जून में रोक लगी जब अमरीकी सेना ने जापान के चार विमानवाहक युद्धपोतों को नष्ट कर दिया था.

उसी तरह 1944 में बर्मा के रास्ते भारत पर हमला करने के जापान के इरादों को ब्रितानी सेना ने असफल कर दिया था.

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