इतिहास के पन्नों में 16 फरवरी

इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो पाएगें कि इसी दिन साल 2005 में क्योटो संधि लागू हुई. इसी दिन फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा के सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी.

2005 : क्योटो संधि लागू हुई

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Image caption दुनिया के सबसे बड़े प्रदूषक देश अमरीका ने क्योटो संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया

क्योटो संधि दुनिया के कई प्रमुख देशों के राज़ी होने के सात साल बाद आखिरकार इसी दिन अस्तित्व में आई. पर्यावरण की रक्षा के लिए इस संधि के मूल में इस बात की चिंता था कि ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए दुनिया में बढ़ता प्रदूषण ज़िम्मेदार है.

इस संधि में यह तय हुआ कि दुनिया के देश अपने अपने यहाँ कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाउस गैसों में कमी लायेगें. करीब 141 देश इस बात के लिए राज़ी हुए कि वो अपने अपने यहाँ साल 2012 तक पर्दूशक गैसों की मात्रा में 5.2 फ़ीसदी की कमी लायेगें. एक अनुमान के मुताबिक यह 141 देश दुनिया में पैदा होने वाली 55 फ़ीसदी ग्रीन हाउस गैसों के लिए ज़िम्मेदार हैं.

लेकिन दुनिया के सबसे बड़े प्रदूषक देश अमरीका ने क्योटो संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया. अमरीका का कहना था कि यह संधि उसे बहुत ही महंगी पड़ेगी और इस संधि में कई मूलभूत गलतियाँ हैं.

उनका कहना था कि इस संधि में भारत, चीन और ब्राजील जैसे बड़े प्रगतिशील देश अपने यहाँ प्रदूषण में फौरी कमी करने के लिए बाध्य नहीं हैं. रूस ने साल 2004 में इस संधि को मान्यता दे दी जिसकी वजह से यह कानूनी रूप से बाध्यकारी हो गयी.

ज़्यादातर विज्ञानिकों का कहना है कि पर्दूषण में कटौती के क्योटो संधि में तय स्तर बहुत ही कम हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार अगर दुनिया को ग्लोबल वॉर्मिंग के दुष्प्रभावों से बचाना है तो पर्दूषण में कम से कम 60 फ़ीसदी कटौती करना होगी. पर बहुत से लोगो का तर्क यह था कि बहले ही यह संधि कमज़ोर हो लेकिन कम से यह इस दिशा में व्यापक औपचारिक पहल तो है ही.

1959 : फिदेल कास्त्रो क्यूबा के प्रधानमंत्री बने

Image caption कास्त्रो दुनिया में सबसे लम्बे समय तक शासन करने वाले वामपंथी नेताओं में से एक हैं

इसी दिन साल 1959 में क्यूबा में क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो क्यूबा के इतिहास में सबसे कम उम्र में प्रधान मंत्री बने. महज़ 32 साल की उम्र में क्यूबा के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले कास्त्रो 1965 में देश के राष्ट्रपति बने. कास्त्रो ने आखिरकार साल 2011 के अप्रेल माह में जा कर सत्ता छोड़ी.

फिदेल ने उस क्रांतिकारी दस्ते का नेतृत्व किया था जिसने सात साल से चले आ रहे फ्लुजेनियो बतिस्ता के सैन्य शासन का अंत किया था. फौजियों की तरह हर रंग के कपडे पहने कास्त्रो ने शपथ लेने के बाद कहा " हमारे पास कई महान योजनायें हैं कष्ट तब होता है जब हम योजनाओं को जल्द लागू नहीं कर पाते. कुछ वक़्त लग सकता है लेकिन जल्द से जल्द सब होगा."

कास्त्रो ने देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा " अब सरकार क्रांति और देशवासी सभी एक रास्ते पर चलेगें."

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