मंहगाई के कारण खाने में कटौती

  • 15 फरवरी 2012
भारत में कुपोषण इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption सर्वे में पाया गया है कि अभिभावकों को परिवार के भोजन में मंहगाई की वजह से कटौती करनी पड़ी है.

सहायता एजेंसी ‘सेव द चिल्ड्रन’ ने कहा है कि भारतीय बच्चों में से आधे शारीरिक रुप से पूरी तरह विकसित नहीं हैं. और साथ ही एक चौथाई भारतीय माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चों कभी-कभार या अकसर बिना भोजन के रहते हैं.

सहायता एजेंसी भारत, बांग्लादेश, पेरू, पाकिस्तान और नाइजीरिया में सर्वेक्षण के बाद इस नतीजे पर पहुंची है.

ये जानकारियां सर्वे के बाद सेव द चिल्ड्रन द्वारा जारी की गई रिपोर्ट – ‘ए लाइफ़ फ़्री फ़्रोम हंगर: टेकलिंग चाइल्ड मालन्यूट्रीशन’ - से सामने आई हैं.

‘सेव द चिल्ड्रन’ ने कहा है कि खाने के दामों में बढ़ोतरी की वजह से दुनिया भर में करोड़ों माता-पिता को अपने बच्चों के भोजन में कटौती करनी पड़ी है.

छह में से एक माता-पिता ने कहा है कि उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है ताकि वे पेट भरने के लिए काम कर सकें.

‘सेव द चिल्ड्रन’ के अनुसार बढ़ते दामों ने कुपोषण की स्थिति को और बिगाड़ दिया है और इससे बाल-मृत्यू दर को कम करने के प्रयासों को आघात पहुंच सकता है.

सहायता एजेंसी ने कहा है कि अगर इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाले 15 सालों में पचास करोड़ बच्चे शारीरिक और दिमागी तौर पर अविकसित रह जाएंगे.

‘सेव द चिल्ड्रन’ ने ये सर्वे अंतरराष्ट्रीय पोलिंग एजेंसी ग्लोबस्कैन द्वारा उन पांच देशों में करवाया है जहां दुनिया के आधे कुपोषित बच्चे रहते हैं.

एजेंसी ने पाया है कि बीते एक साल में पचीस करोड़ माता-पिता ने अपने परिवार के भोजन में कटौती की है.

सर्वे किए गए लोगों में एक तिहाई माता-पिता ने कहा है कि उनके बच्चे उनसे अपर्याप्त भोजन मिलने की शिकायत करते हैं.

सहायता एजेंसी ‘सेव द चिल्ड्रन’ ने ब्रिटेन से भूख कम करने और दामों में वृद्धि से बच्चों की रक्षा करने में पहल करने की गुजारिश की है.

एजेंसी ने कहा है कि इसकी शुरूआत लंदन खेलों के दौरान होने वाली भूख पर बैठक से की जा सकती है.

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