अयोध्या से गोधरा, एक बार फिर

साबरमती एक्सप्रेस
Image caption सुशील झा ने साबरमती एक्सप्रेस के कई यात्रियों से बात कर अपनी डायरी भेजी है.

साबरमती एक्सप्रेस का कोच एस-6 और सीट नंबर 64. ये वही डिब्बा है जो दस साल पहले गोधरा में जला था.

मुझे पता नहीं सीट नंबर 64 का यात्री बचा था या मारा गया था. इस सीट पर बैठे बैठे दिमाग में ये ख्याल बार बार आ रहा है और शरीर में एक सिहरन सी हो रही है.

ट्रेन बहुत ही गंदी और बड़ी संख्या में बिना रिज़र्वेशन के लोग हैं. अधिकतर प्रवासी मज़दूर, कुछ परिवार और कुछ छोटे मोटे व्यापारी, यही आबादी है इस डिब्बे की.

ये उन कुछ ट्रेनों में से है जिसमें अभी भी कोई पैंट्री कार नहीं है यानी खाने की चीज़ें बेहद कम. मोबाइल चार्जर के लिए भी मात्र एक स्थान. माहौल ऐसा कि आदमी बैठे बैठे कुंठित हो जाए.

बात करने के लिए माइक उठाता हूं तो लोग गोधरा और बाबरी का नाम सुन कर मुंह मोड़ लेते हैं.कोई कुछ नहीं कहना चाहता.

'डर लगता है'

लेकिन फिर भी कुछ लोग तैयार होते हैं. अहमदाबाद में लंबे समय से रह रहे प्रेमशंकर पांडे कहते हैं, ‘‘क्यों नहीं याद आता है. जब जब इस ट्रेन पर बैठता हूं तो डर लगता है कि कहीं फिर से वैसा ही कुछ न हो जाए.’’

लेकिन क्या जो हुआ वो ग़लत नहीं था. पांडे कहते हैं, ‘‘जो हुआ सही हुआ. पहले ट्रेन में लोग मरे उसके बाद दंगे हुए जिसमें पता नहीं कितने लोग मरे. जो हुआ भगवान की मर्ज़ी ही है और कुछ नहीं. सबको शांति से रहना चाहिए लेकिन एक घर में बाप-बेटे में लड़ाई होती है. ये समझिए भाई भाई की लड़ाई थी.’’

पांडे कहते हैं कि गुजरात में मोदी बहुत लोकप्रिय हैं और हर आदमी चाहता है उसका बच्चा नरेंद्र मोदी जैसा हो.

बलिया के युवा रीतेश को गोधरा दंगों की याद बहुत नहीं है. वो सिर्फ 24 साल के हैं. वो कहते हैं, ‘‘मैं बीजेपी को समर्थन करता हूं लेकिन गोधरा के दंगे ग़लत थे. धर्म के नाम पर राजनीति बिल्कुल ग़लत है. ये नहीं होना चाहिए. पार्टी में अटल जी जैसे नेता होने चाहिए. यहां तो मोदी और आडवाणी ही लड़ते रहते हैं. वैसे पार्टी ठीक है.’’

दूसरे युवाओं की राय अलग है लेकिन वो इस बात पर एकमत थे कि धर्म और राजनीति अलग अलग होनी चाहिए.

अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद ढहाए जाने के बाद बीजेपी तेज़ी से आगे बढ़ी थी लेकिन गोधरा की घटना के दो वर्ष बाद एनडीए की सरकार सत्ता से हटी तो अभी तक सत्ता से बाहर है.

'केंद्र में आना असंभव'

प्रेम शंकर पांडे हंसते हैं और कहते हैं, ‘‘राज्य की राजनीति अलग होती है. समझिए परिवार है और परिवार के मुखिया दादा जी हैं तो दादा के लिए सारे बच्चे एक जैसे होंगे. लेकिन सारे बच्चे एक दूसरे से तो लड़ेंगे न. गुजरात में मोदी क्यों जीत रहे हैं वो सबको पता है. लेकिन इस राजनीति से केंद्र में आना असंभव है.’’

मनोज सिंह युवा हैं और वो कहते हैं कि बीजेपी का केंद्र में नहीं आना सिर्फ गोधरा के कारण नहीं है लेकिन गोधरा दंगों का नुकसान बीजेपी को भुगतना पड़ा है.

भरत सिंह ठाकुर मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं. वो खेती करते हैं.

वो बीच में कूद पड़ते हैं और कहते हैं, ‘‘जो हुआ उसको छोड़िए. मोदी को हिंदुत्ववादी नेता मान लिया गया है.बाकी पार्टियां उनको सपोर्ट नहीं करेंगी. वो तो प्रधानमंत्री भी नहीं बन पाएंगे. वो सांप्रदायिकता वाले नेता हो गए हैं.वो न ध्यान रखें. बाकी राज्यों में मुस्लिमों का ध्यान तो रखा जाएगा.’’

गोधरा दंगों को बीजेपी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कलंक माना था और ये भी सत्य है कि गोधरा के दो वर्ष बाद पार्टी केंद्र में सत्ता से बाहर हुई और उसके बाद दो चुनाव हो चुके हैं.

गोधरा एक कारण भले ही न हो लेकिन लगता है कि इस कारण ने बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान ज़रुर पहुंचाया है.

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