ओडिशा: पंचायत चुनाव में माओवादी भी

माओवादी
Image caption जानकारों का मानना है कि माओवादी अब अपनी रणनीति बदल रहें हैं.

ओडिशा में जारी पंचायत चुनाव में माओवादियों ने अपनी नीति के ख़िलाफ़ जाते हुए लगभग 40 पंचायतों में अपने सरपंच उम्मीदवार खड़े किए हैं और लगभग सभी ऐसे उम्मीदवार निर्विरोध चुन भी लिए गए हैं.

भुवनेश्वर से संवाददाता संदीप साहू के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि सीमा सुरक्षा बल यानि बी.एस.एफ़. के बढ़ते दबाव का सामना करने के लिए माओवादियों ने पंचायतों पर अपना क़ब्ज़ा बनाने का निर्णय लिया है.

माओवादियों का गढ़ माने जाने वाले दक्षिणी ओडिशा में माओवादी-विरोधी अभियान में जब से बी.एस.एफ़. शामिल हुआ है, माओवादियों को एक के बाद एक कई कड़े झटके लगे हैं.

कई माओवादी सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मरे गए हैं, जबकि इस इलाक़े के एक प्रमुख माओवादी नेता 'आज़ाद' सहित कई माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है.

संदीप साहू के अनुसार जानकारों का यही मानना है कि माओवादियों ने एक तरफ़ जहाँ चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया है, वहीँ दूसरी और अपने सबसे सशक्त गढ़ मलकानगिरी ज़िले के क़रीब 30 पंचायतों में और कोरापुट जिले के नारायणपटना इलाके के नौ पंचायतों में सरपंच के उम्मीदवार खड़े किए हैं.

नारायणपटना में निर्विरोध चुने गए सभी सरपंच उम्मीदवार माओवादी समर्थित चासी मुलिया आदिवासी संघ के सदस्य हैं, जबकि मलकानगिरी जिले में सभी उम्मीदवार माओवादियों के प्रजा अदालत में चुने गए हैं.

इस इलाके में माओवादियों के दबदबे के कारण केवल नारायणपटना के एक पंचायत को छोड़ कर बाकी सभी माओवादी समर्थित उम्मीदवार बिना किसी विरोध के चुन लिए गए हैं. आपना नाम गुप्त रखने कि शर्त पर इस इलाके में तैनात राज्य पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी से कहा कि अपने चुने हुए सरपंचों के ज़रिए माओवादी अब अपने बचे खुचे इलाक़े में अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं, जिससे सुरक्षा बल उन तक नहीं पहुँच पाएं.

रायपुर से बीबीसी संवाददाता सलमान रावी का कहना है कि माओवादी अब अपनी रणनीति बदल रहें हैं.

ओड़िशा में पंचायत के चुनाव नें केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है. इससे पहले झारखण्ड में भी 32 वर्षों बाद संपन्न हुए पंचायत के चुनाव में भी इसी तरह की बातें सामने आई थी.

हांलाकि माओवादियों नें पंचायत चुनाव का बहिष्कार करने का आहवान किया था मगर कहा जा रहा है कि झारखण्ड में भी लगभग सात हज़ार उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके माओवादियों से संबंध रहे हैं और जिन्हें निर्विरोध चुन लिया गया है.

हालाँकि माओवादियों का परोक्ष रूप से समर्थन करने वाले संगठनों का कहना है कि माओवादियों द्वारा उम्मीदवार खड़े किए जाने की बात सरासर ग़लत है.

बीबीसी के साथ फ़ोन पर बातचीत के दौरान ऐसे ही एक संगठन जन अधिकार मंच के प्रमुख दंडपानी मोहन्ती ने कहा कि यह सब 'कॉर्पोरेट मीडिया' का दुष्प्रचार है.

झारखण्ड में पंचायत चुनाव में माओवादियों की उम्मीदवारी के सवाल पर गृह मंत्री पी चिदंबरम ने तब कहा था कि वह इससे चिंतित नहीं हैं.

दिल्ली में आयोजित एक समारोह में उन्होंने कहा था, "ये संभव है कि कुछ नक्सली इन चुनावों में जीत जाएं. संभव है कि पंचायत और ब्लॉक स्तर पर नक्सलवादी कब्ज़ा कर लें. लेकिन तो क्या हुआ, कम से कम वो लोगों के प्रति जवाबदेह तो होंगे."

आतंरिक सुरक्षा के कुछ एक जानकारों का भी मानना है कि जो संगठन लोकतांत्रिक ढांचे को ही नकारता है और अगर वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले रहा है तो इसमें हर्ज ही क्या है.

उनका मानना है कि इसी बहाने यह लोग लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में शामिल तो हो रहे हैं.

शायद यही वजह है चाहे झारखण्ड हो या फिर ओडिशा, राज्य सरकारों ने ऐसे उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की.

लेकिन अब ओडिशा में पंचायत में माओवादियों की पैठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की नींद उड़ा दी है. ख़ास तौर पर इसलिए भी क्योंकि पूर्वी भारत में ओडिशा को ही माओवादियों का अब सबसे मज़बूत गढ़ माना जा रहा है.

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