इतिहास के पन्नों में 27 फरवरी

  • 27 फरवरी 2012

इतिहास के पन्नों को पलटेंगें तो पाएंगें कि 27 फरवरी 2002 को गुजरात में हिंदू-मुसलमान दंगों की शुरुआत हुई थी. उधर नाइजीरिया में 1999 में असैन्य शासन को ख़त्म करने के लिए मतदान हुए थे.

2002: गुजरात में सांप्रदायिक दंगे भड़के

Image caption गुजरात दंगों में कम से कम 1,000 लोग मारे गए थे

27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगाए जाने से 59 हिंदू तीर्थयात्रियों के मारे जाने के बाद पूरे गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई थी.

ये आग तब लगी जब अहमदाबाद को जाने वाली साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन से गुज़रने वाली थी.

इस ट्रेन में यात्रा कर रहे हिंदू तीर्थयात्री अयोध्या से लौट रहे थे. मुसलमानों के एक गुट ने कथित तौर पर ट्रेन में आग लगाई थी.

इस हादसे के बाद गुजरात में सांप्रदायिक तनाव फैल गया और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जनता से शांति की अपील की.

गोधरा में सभी स्कूल और दुकानें बंद करवा दी गईं और कर्फ़्यू लगा दिया गया. पुलिस को आदेश दिए गए थे कि वो दंगाइयों को देखते ही गोली मार दे.

विश्व हिंदू परिषद ने इस हमले का बदला लेने के लिए पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन किए, जिसके बाद हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगे शुरू हो गए.

इन दंगों में कम से कम 1,000 लोग मारे गए थे, जिनमें से ज़्यादातर मुसलमान थे.

जनवरी 2005 में ट्रेन हादसे में हुई जांच में सुप्रीम कोर्ट के जज उमेश चंद्र बैनर्जी ने पाया कि ये दंगे असल में मुसलमानों ने नहीं किए, बल्कि दुर्घटनावश हुए थे.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इस रिपोर्ट को राजनीतिक रूप से प्रभावित बताया.

इसके बाद नानावती कमीशन को इस मामले में कानूनी कार्रवाई तय करने के लिए कहा गया.

1999: नाइजीरिया में असैन्य शासन के लिए चुनाव

आज ही के दिन 1999 में नाइजीरिया में 15 साल में पहली बार असैन्य शासक चुनने के लिए मतदान हुआ था.

इस दिन भारी मात्रा में मतदान केंद्रों पर लोग अपना मत डालने पहुंचे.

पूर्व सैन्य शासक ऑल्युसेगन ऑब्सान्जो ने 1979 से नाइजीरिया की सत्ता संभाल रखी थी.

इस मतदान पर पश्चिमी देशों की भी नज़र टिकी हुई थी. तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने कहा कि मतदान प्रतिशत काफ़ी अच्छी रही.

पूर्व सैन्य शासक ऑल्युसेगन ऑब्सान्जो ने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से चुनाव लड़ा और बहुमत हासिल किया.

राष्ट्रपति की गद्दी संभालने के बाद उन्होंने सैन्य शासन के दौरान हुए मानवाधिकार हनन के मामलों को उठाया और राजनीतिक बंदियों को क़ैद से छुड़वाया.

इसके अलावा उन्होंने भ्रष्टाचार पर भी नकेल कसनी शुरू कर दी. लेकिन बाद में उनके आलोचकों ने उन पर धांधली के आरोप लगाए जिसके बाद 2002 में उन पर महाभियोग चलने की बातें होने लगीं.

लेकिन 2003 में हुए चुनावों में उन्होंने एक बार फिर भारी मत से जीत हासिल की.

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