इतिहास के पन्नों में: 28 फ़रवरी

  • 28 फरवरी 2012
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Image caption ओलोफ़ पाल्मे देश में काफ़ी लोकप्रिय प्रधानमंत्री थे

इतिहास के पन्नों में 28 फ़रवरी को दर्ज प्रमुख घटनाएँ-

1986- स्वीडन के प्रधानमंत्री की हत्या

स्वीडन के प्रधानमंत्री पर स्टॉकहोम के मध्य में एक हमला हुआ जिसमें उनकी मौत हो गई. उनकी पत्नी उस हमले में घायल हो गई थीं.

स्थानीय समयानुसार रात के साढ़े ग्यारह बजे जब ओलोफ़ और लिस्बेथ पाल्मे सिनेमा से घर लौट रहे थे तब उन पर हमला हुआ.

ओलोफ़ पाल्मे को दो बार पेट में गोली मारी गई जबकि उनकी पत्नी को पीठ में गोली लगी.

पुलिस के अनुसार एक टैक्सी ड्राइवर ने इस घटना के बारे में जानकारी दी.

प्रधानमंत्री को तुरंत अस्पताल ले जाया गया मगर तब तक उनकी मौत हो चुकी थी.

प्रधानमंत्री पाल्मे को आई चोटों के लिए उनका इलाज हुआ मगर उनकी चोटें घातक नहीं थीं.

ओलोफ़ पाल्मे एक समाजवादी डेमोक्रैट थे और दूसरी बार वह नेता बने थे. उन्होंने ख़ुद ही कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में ढील दिलवाई थी.

आधिकारिक कार्यक्रमों में उनके पास दो सुरक्षा गार्ड होते थे मगर वह अक़सर स्वीडन की राजधानी में अकेले ही घूमने निकल पड़ते थे.

उनकी हत्या से स्वीडन के लोगों को काफ़ी धक्का लगा. उन लोगों को हमेशा इस बात पर गर्व होता था कि उनके प्रधानमंत्री आम लोगों की तरह सड़क पर घूम सकते हैं जबकि दूसरी जगहों पर राष्ट्राध्यक्षों के पास सुरक्षा का बड़ा घेरा होता है.

वह पहली बार 1969 में प्रधानमंत्री बने थे. वह शांति और अहिंसा के समर्थक थे और उन्हें वियतनाम का युद्ध जल्द से जल्द समाप्त करने के लिए अभियान भी चलाया था.

उन्होंने एक बार कहा था, "मुझे पता है कि थैचर और रीगन जैसे लोग एक दिन सत्ता से हट जाएँगे. बस हमें तब तक किसी तरह बचे रहना है."

1991- खाड़ी युद्ध में संघर्ष विराम के बाद उत्सव का माहौल

खाड़ी युद्ध में बंदूकें शांत हो गईं और युद्ध समाप्त हुआ.

संयुक्त राष्ट्र के सभी 12 प्रस्ताव इराक़ के मानने के बाद अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने वॉशिंगटन में संघर्ष विराम की घोषणा की.

राष्ट्र को संबोधित करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा, "कुवैत स्वतंत्र हो चुका है. इराक़ की सेना हार गई है. हमारा सैनिक लक्ष्य पूरा हो चुका है."

उन्होंने ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म में शामिल सभी 32 देशों की तारीफ़ की, "ये पूरी मानवता की, क़ानून के नियम की और सही राह की जीत है."

ब्रितानी प्रधानमंत्री जॉन मेजर ने कहा, "हमारे सैनिकों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया. सच की जीत हुई है."

इराक़ ने जो 12 माँगें मानी उनमें अमरीका और उसकी सहयोगी सेनाओं के सभी बंदियों को लौटाने के साथ ही इराक़ ले जाए गए कुवैती नागरिकों की भी वापसी की बात थी.

कभी दुनिया की सबसे बड़ी सेना रही इराक़ी सेना पूरी तरह नष्ट कर दी गई.

कुवैत शहर में लोगों ने घरों से निकलकर हवा में गोलियाँ चलाईं.

मगर भागती इराक़ी फ़ौज ने कुवैती तेलक्षेत्रों में आग लगा दी जिसकी वजह से कुवैती आसमान पर काले बादल से छा गए.

उधर बग़दाद की सड़कों पर जिन इराक़ियों से बात हुई वे इस बात से संतुष्ट थे कि उनके शहर पर अब बमबारी नहीं होगी.

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