अफजल गुरु की दया याचिका पर कश्मीर में हंगामा

  • 27 फरवरी 2012
कश्मीर विधान सभा इमेज कॉपीरइट BBC World Service
Image caption कश्मीर विधान सभा में अफजल गुरु की दया याचिका पर विवाद है

संसद पर हमले के मामले में मौत की सजा पाए कश्मीरी चरमपंथी अफजल गुरु की दया याचिका पर भारत प्रशासित कश्मीर में राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है.

87 सदस्यीय कश्मीर विधानसभा में एक सदस्य को उस वक्त सदन से बाहर कर दिया गया जब वे इस याचिका पर बहस की मांग कर रहे थे.

इससे पहले केंद्रीय मंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला ने कहा था, “एक भारतीय होने के नाते मेरा मानना है कि यदि कोई व्यक्ति देश के खिलाफ काम करता है तो उसे इसकी कीमत चुकानी ही चाहिए.”

फारूख अब्दुल्ला का ये बयान उनके बेटे और जम्मू-कश्मीर के मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला के रुख से मेल नहीं खाता.

हाल ही में उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर ये सुझाव दिया था कि जम्मू-कश्मीर विधान सभा इस बारे में ठीक उसी तरह एक प्रस्ताव पारित कर सकती है जैसा कि दक्षिणी राज्य तमिलनाडु ने किया था.

तमिलनाडु विधान सभा ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के आरोप में मौत की सजा पाए चार युवाओं की मौत सजा माफ करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया था.

कश्मीर विधान सभा में दया याचिका के एकमात्र समर्थक अब्दुल रशीद का कहना था, “सुरक्षा बलों और दूसरे लोगों ने कश्मीर में लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा है. उन्हें इसकी कीमत क्यों नहीं चुकानी चाहिए.”

विधान सभा में जम्मू आधारित पार्टियां अफजल गुरु को किसी भी तरह की राहत देने का तीव्र विरोध कर रही हैं.

सदन में भारतीय जनता पार्टी के नेता अशोक खजूरिया ने बीबीसी को बताया, “वो एक आतंकवादी है. हमें ये देखना होगा कि सदन पटल पर कोई भी दया याचिका न रखी जाए.”

विधान सभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के कुछ नेताओं ने रशीद पर भारतीय खुफिया एजेंसियों का एजेंट होने का आरोप लगाया है.

रशीद ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि याचिका का विरोध करने वाले खुद खुफिया एजेंसियों के संपर्क में थे.

दिलचस्प बात ये है कि कई सदस्यों ने रशीद पर ‘पाकिस्तानी एजेंट’ होने का भी आरोप लगाया है.

अफजल बचाओ अभियान

कश्मीर में कई अलगाववादी नेताओं ने ‘अफजल गुरु बचाओ’ अभियान चला रखा है. इनका दावा है कि इन्हें अरुंधती रॉय समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी समर्थन प्राप्त है.

वहीं पूर्व अलगाववादी नेता यासीन मलिक को डर है कि अफजल गुरु को फांसी देने के बाद हिंसा के एक और दौर की आशंका है.

उनका कहना है, “1984 में इन लोगों ने मकबूल भट को फांसी पर लटका दिया था. इस घटना ने सशस्त्र विरोध को प्रोत्साहित किया. अब लोग हिंसा से दूर हैं, लेकिन अफजल को फांसी देने से वे वापस हिंसा का रास्ता अपना सकते हैं.”

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