'केवल पीटने के लिए राष्ट्रहित'

कुडनकुलम
Image caption प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि कुडनकुलम परमाणु परियोजना के विरोधे के पीछे विदेशी पैसा लगा है.

कुडनकुलम में आंदोलन कर रहे गैर सरकारी पर कार्रवाई एक भयंकर गलत कदम है. इस देश में विरोध करने की आज़ादी सबको है. हम प्रधानमंत्री का विरोध कर सकते हैं प्रधानमंत्री हमारा विरोध कर सकते हैं.

अगर यह अधिकार छीना जाए तो समझिये लोकतंत्र की नीवं टूटेगी. परमाणु ऊर्जा की तकनीक विदेश से आई हुई है. अब अगर यह विदेश से आई तकनीक है तो विरोध के तरीके भी विदेश से ही आयेगें ना क्योंकि ग्रीन पीस हो या अमरीका ब्रिटेन में दूसरे परमाणु ऊर्जा विरोधी वो लोग सालों से लड़ रहे हैं परमाणु ऊर्जा के खिलाफ.

जब हमें पीटना चाहते हैं तभी इनको राष्ट्र का हित दिखता है. वरना चीन से राखी बन कर आती है, पेप्सी जैसी विदेशी कम्पनियां बीकानेर का नमकीन बना रही हैं वो इन्हें नज़र नहीं आता.

इतना विदेशी पूँजी लेने वाली सरकार अगर जन आंदोलनों में विदेशी पैसे की बात ना ही बोले तो ही ठीक रहेगा. अगर किसी विरोध आंदोलन में शक्ती है तो वो जीतेगा वरना चलता रहेगा यूं ही बेअसर.

दरअसल भारत में लोकतंत्र ने जड़ पकड़ ली है इसलिए किसी विरोध की आवाज़ को दबाना मुश्किल हो गया है क्योंकि आवाज़ अब देश और समाज के कई हिस्सों से आती है. मुझे लगता है की देश में पूजी और सरकार के बीच में गठबंधन हो गया है. लोगों को आवाज़ को ख़त्म करने के लिए साराकर को सामने कर दिया जाता है.

लेकिन इस हालत के लिए सरकार पूरी तरह से ज़िम्मेदार है क्योंकि उसकी जवाबदेही तो उन लोगों के प्रति है जो उसे चुनते हैं.

यूं तो हमारा संगठन मजदूर किसान सहलती संगठन तो किसी विदेशे या देशी संस्था से पैसे नहीं लेता लेकिन जो लेते हैं वो उसी तरह से काम कर रहे हैं जिस तरह से सरकार.

जनसंगठनों में से तो कोई यह सवाल नहीं उठाता की प्रधानमंत्री या सरकार विदेशो से पैसा लेते हैं और विदेशो उद्योगों को लाभ पहुंचाने वाले काम करते हैं या बयान देते हैं.

पूँजी इस देश में सरकार को चलाती थी फिर वो मीडिया को चलाने लगी अब धीरे धीरे कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी के नाम पर वो उस जगह भी घुस रहे हैं जहाँ जनांदोलनों और जनचेतना की बात होती है. उदहारण के तौर पर रिलायंस को ले लीजिये वो पूरी तरह से मीडिया को प्रभावित करते हैं अब उन्होंने कोई फाउनडेशन शुरू कर दिया है.

सरकार उनसे प्रभावित है मीडिया उनसे प्रभावित है अब जहाँ आज़ाद आवाज़ की बात है अगर वहां भी वो पैसा लगाएंगें तो कैसे चलेगा.

मैं केवल रिलायंस की बात नहीं कर रही. मुझे लगता है किहमें पूँजी का चरित्र समझना पड़ेगा. पूरी दुनिया में जिस तरह से व्यापार किया जा रही है उससे बहुत सारी कठिनाईयां आने लग गयी हैं.

बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त से अरुणा रॉय की बातचीत पर आधारित.

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