क्या 'सेक्सी' सिर्फ एक शब्द है ?

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Image caption भारतीय समाज में महिलाओं पर सार्वजनिक तौर पर किए गए लैंगिक टिप्पणियों को गलत माना जाता है.

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा कुछ दिन पहले अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल द्वारा आयोजित दिशाबोध कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जयपुर पहुंची.

इस दौरान वहां आयोजित सेमिनार में महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर बोलते हुए ममता ने कहा कि देश में महिलाओं की स्थिति आज भी कोई ज्य़ादा अच्छी नहीं है.

उन्होंने आगे कहा कि यदि महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम करना है तो पंचायत एवं ब्लॉक स्तर पर कार्य करना होगा और फिर उन्होंने खासकर कॉलेज जाने वाली और कामकाजी लड़कियों से कहा कि वे 'सेक्सी' शब्द से न डरें क्योंकि सेक्सी का मतलब होता है सुंदर और आकर्षक होना.

उन्होंने कहा कि सेक्सी शब्द का गलत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए एवं इसे सकारात्मक रूप में लेना चाहिए.

लेकिन ममता शर्मा के इस बयान ने पूरे देश में एक सामाजिक और राजनैतिक बहस छेड़ दी है. सवाल उठता है कि ममता जिन लड़कियों या महिलाओं से अपनी सोच उदार करने की बात कर रही हैं क्या वो उनकी इस राय से सहमत हैं.

बीजेपी समेत सभी विपक्षी दलों ने ममता से इस्तीफा मांगा है, उनका तर्क है कि वो 'ममता शर्मा' के रूप में जो चाहें कह सकती हैं लेकिन राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रमुख के तौर पर इस तरह के हास्यास्पद बयान नहीं दे सकतीं.

दिल्ली में सत्यवती कॉलेज में शिक्षिका और महिला विषयों पर बेबाकी से लिखने वाली प्रो. अनामिका कहती हैं, ''महिलाओं ने इतने दिनों तक जो संघर्ष किया है वो इसीलिए किया है कि उनको कमतर ना आंका जाए, और महिलाओं के पास जो प्राकृतिक संपदाएं हैं उसके लिए सार्वजनिक जगहों पर फब्तियां कसना फूहड़ता है. किसी भी स्त्री का सुंदर या सेक्सी होना या फिर ना होना सिर्फ एक संयोग है, इसके लिए जो महिलाएं कम सुंदर हैं उन्हें नीचा नहीं दिखा सकते हैं.''

ममता भले ही कहें कि उनका बयान दुर्भावनापूर्ण नहीं है लेकिन भारत जैसे बड़े देश में जहां महिलाओं की स्थिती आज भी दोयम दर्जे की है, जहां हर गांव, कस्बे और घर की लड़की आगे बढ़ने के लिए एक अलग किस्म की लड़ाई लड़ रही है, वहां उनका ये बयान कितना सही है.

झारखंड के धनबाद की श्वेता वर्मा कहती हैं, ''धनबाद जैसे छोटे शहर में एक मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की के लिए अगर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल होता है तो इसे काफी ग़लत माना जाता है. बड़े शहरों के लोग उन जैसी छोटे शहरों की लड़कियों की परवरिश को काफी संकुचित मानते हैं, जबकि जिस माहौल में वो रहती हैं वहां शिक्षित होने के बावजूद अगर वो ऐसे टिप्पणियों का स्वागत करेंगी तो उन्हें ग़लत माना जाएगा इसलिए ममता शर्मा को ऐसे बयान देते हुए सावधानी बरतनी चाहिए.''

शहर अलग लेकिन 'सोच' एक

श्वेता और डॉ अनामिका दोनों दो अलग-अलग पृष्टभूमि के होने के बावजूद इस मसले पर एक राय रखती हैं, दोनों को लगता है कि इस तरह की लैंगिक रंग-रूप वाली टिप्पणियां महिलाओं की तारीफ के मकसद से कम और उत्पीड़न के मकसद से ज्य़ादा होती है और भारत का कानून भी यही कहता है, कि इस तरह के बयान महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को बढ़ावा देते हैं.

दिल्ली और धनबाद के बाद मैंने कोलकाता में बात की साहित्यकार कावेरी रॉयचौधरी से और पूछा कि एक साहित्यकार के तौर पर आप इस बयान को कितना सही मानती हैं.

कावेरी मानती हैं,''सेक्सी शब्द 'सेक्स' से जुडा़ हुआ शब्द है और भारतीय परिवेश में 'सेक्स' एक बेहद निजी, सुंदर और गंभीर विषय है. हमारे जीवन में सेक्स का वो मतलब नहीं है जो चौपाया जानवरों के जीवन में होता है और हमारी यौनता पर बोलने का अधिकार हमारे जीवन में मौजूद पुरुष को होता है फिर चाहे वो हमारा प्रेमी हो या पति, ना कि किसी जान-पहचान वाले या अपरिचित को.''

हालांकि जब इस विवाद ने तूल पकड़ा तो इसे कम करने की कोशिश करते हुए ममता शर्मा ने कहा कि चूंकि वह युवाओं को संबोधित कर रहीं थीं इसलिए उनका ये बयान सकारात्मक और बड़े परिप्रेक्ष्य में दिया गया था, और ये अजनबियों या रोडसाइड रोमियो पर लागू नहीं होता जो लड़कियों को छेड़ने के लिए सेक्सी शब्द का इस्तेमाल करते हैं।

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Image caption भारतीय महिलाओं के लिए 'सेक्स' एक बेहद निजी विषय है, जिसे वो अपने अस्मिता से जोड़कर देखती है

लखनऊ की प्रियंका सिंह के मुताबिक,''अगर कोई आपका बहुत ही नज़दीकी व्यक्ति ऐसा कहता है तब तो ठीक है लेकिन हर कोई ऐसा नहीं कह सकता है.''

वो ये भी कहती हैं कि तारीफ के लिए और भी शब्द हैं जिनका इस्तेमाल हो सकता है.

उनके अनुसार लड़कियां पहले से काफी मज़बूत हैं और खुद को ज्य़ादा प्रभावशाली साबित करने के लिए उन्हें इस तरह शब्दों की ज़रुरत नहीं है.

देश के बड़े-छोटे शहरों की महिलाओं से बात करके ये तो साफ है कि इस विवाद में कहीं ना कहीं वास्तविक मुद्दा खो गया है, क्योंकि कोई भी शब्द अनापेक्षित या अवांछित नहीं होता, अवांछित या असराहनीय वो व्यक्ति या माहौल होता है जो किसी महिला की मर्ज़ी के खिलाफ़ उसकी यौनता से संबंधित टीका-टिप्पणी करता है, और तब यही व्यवहार अपराध कहलाता है.

यहां मुद्दा 'शब्द' नहीं बल्कि 'शब्द' के ग़लत इस्तेमाल का है.

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