अनदेखी से रूठा हुआ एक पुराना दोस्त रूस

  • 3 मार्च 2012
रूस इमेज कॉपीरइट AFP

रूस में राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों और वैश्विक मुद्दों पर पल-पल करवट लेते कूटनीतिक संबंधों के बीच राजनीतिक विशेषज्ञ भारत-रूस संबंधों पर गंभीर चिंतन कर रहे हैं.

भारत और रूस के बीच रिश्तों को किसी दो देश के बीच सबसे बेजोड़ कूटनीतिक संबंधों के उदाहरण के रूप में देखा जाता है, फिर चाहे वो स्टैलिन के जमाने का रूस हो या पुतिन के जमाने का.

लेकिन अतरराष्ट्रीय परिदृश्य में हाल फिलहाल में कई बदलाव हुए है. इस बदलते परिवेश में भारत-रूस संबंधों में भी उतार-चढ़ाव हो रहें है.

रूस में रविवार के चुनाव में मजबूत दिख रहें व्लादिमीर पुतिन का राष्ट्रपति बनना लगभग तय माना जा रहा है. जानकार कहते है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से पुतिन के व्यक्तिगत रिश्ते बहुत अच्छे है.

मनमुटाव

Image caption प्रोफेसर वोलोडीन कहते है कि रूस चीन की साम्राज्यवादी नीतियों को लेकर भी चिंतित है.

लेकिन क्या इन सब के बावजूद भी भारत और रूस के बीच कूटनीतिक स्तर पर संबंध में कोई तनाव आने की आशंका है?

रूस में कूटनीतिक शिक्षा प्रदान करने वाली एक संस्था, ओरिएंटल स्टडीज़ डिपार्टमेंट के प्रमुख प्रोफेसर वोलोडीन ने कहा, “हम भारत की विदेश नीति में होने वाले छोट मोटे बदलाव को लेकर चिंतित हैं. जैसे की सीरिया पर मतदान का मामला लीजिए..आप किसको समर्थन देते हैं. क्या आप सउदी अरब के एकदम तानाशाही सत्ता को समर्थन देते हैं..जिसने सीरिया के खिलाफ प्रस्ताव तैयार किया है..लेकिन आपने उस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए.. आप ऐसा करने से बच सकते थे.”

चीन और रूस ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था. प्रस्ताव में सीरिया की कड़ी निंदा की गई थी. कहा गया था कि सीरिया में मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है. वोलोडीन मानते है कि भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में अपना मत देकर इन आरोपों पर अपनी मुहर लगा दी, जिससे रूस नाराज हुआ.

वोलोडीन का कहना है कि भारत की विदेश नीतियां अमरीका के दबाव में तय की जा रहीं है. इसलिए कभी वो ईरान के विरोध में खड़े दिख रहे है तो कभी चीन के.

नीतियां

प्रोफेसर वोलोडीन कहते है कि रूस चीन की साम्राज्यवादी नीतियों को लेकर भी चिंतित है.

उन्होंने कहा, “हमें लगता है कि सूदूर पूर्व में रह रहे रूसी आबादी, रूस और चीन के सीमावर्ती इलाकों में कथित रूप से बढ रही चीनी प्रभाव को लेकर चिंतित हैं. और इसीलिए रूस के सदूर पूर्व और सायबेरिया में विकास रूस के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है.”

प्रोफेसर वोलोडीन मानते है कि सुदूर पूर्व और साइबेरिया भविष्य में एशिया का सबसे बड़ा कूटनीतिक मुद्दा बन सकता हैं. रूस और चीन की सीमा करीब चार हजार किलोमीटर की है जिसमे एक बड़ी आबादी रहती है.

हालांकि इस इलाके में प्राकृतिक संपदा कम है, जबकि रूस के इलाके में काफी तेल और गैस है. लेकिन रूस के पास इन खनिजों और तेल आदि के उत्पादन के लिए जरूरी लोग नहीं है. रूस को आशंका है कि ऐसे हालात में चीन उस इलाके पर धीरे धीरे अपना कब्जा बना लेगा. वोलोडीन का कहना है कि रूस चाहता है कि भारत साइबेरिया में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए उसकी मदद करे.

निवेश

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption रविवार के चुनाव में मजबूत दिख रहें व्लादिमीर पुतिन का राष्ट्रपति बनना लगभग तय माना जा रहा है.

वोलोडीन और क्रेमलिन इस बात से भी नाराज़ है कि भारतीय उद्योगपति साइबेरिया में निवेश नहीं करना चाहते, रूस की कोशिशों के बाद भी भारत इस इलाके में व्यापार करने पर रूचि नहीं दिखाते है.

वोलोडीन ने कहा, “हम खुले दिल से भारतीय उद्योगपतियों को यहां आने के लिए निमंत्रित करते है, लेकिन वो सिर्फ पश्चिमी देशों की तरफ देखते हैं. वो पीछे छूट जाएंगे.”

भारत-रूस रिश्तों के एक और जानकार व्लादिमीर राड्युखिन ने कहा, “भारत और रूस के रिश्तों पर पश्चिमी देशों का दबाव तो रहता ही है और आगे भी रहेगा. इसके बावजूद दोनों देशों के बीच रिश्तें मजबूत रहेंगे.”

उन्होंने कहा, “भारत से रिश्ते अच्छे होने के कई कारण है, एक उदाहरण के तौर पर देखे तो रूस को इस बात से चिंता है कि जब अफगानिस्तान से नेटो सेना वापस लौट जाएंगी तब तालिबान जैसी चरमपंथी ताकतें मध्य एशिया में फैल सकते है. इस इलाके से रूस की हजारों किलोमीटर लंबी सीमाएं जुड़ी हुई है और इसीलिए इसे रूस की कमजोर कड़ी मानी जाती है. भारत की भी कुछ ऐसी ही चिंताएं है शायद इसीलिए दोनों देशों के बीच संबंध इतने अच्छे है. ये तो केवल एक उदाहरण है, ऐसे कई हैं.”

इस बातचीत से एक बात तो साफ पती चलती है कि रूस की विदेश नीति अभी भी पूरी तरह अमरीका के विरेध में खड़ी है. एक जमाने में रूस और भारत दोनों ही अमरीका के विरोधी थे, इसी बात ने भारत-रूस संबंधों को नए मुकाम पर पहुंचाया.

हालांकि अब भारत ने अमरीका के साथ संबंधों में अपने तेवर बदल लिए है और शायद इसी से बदल रही है रूस और भारत की दोस्ती भी.

जाते-जाते प्रोफेसर वोलोडीन ने कहा कि ये एक गुजरता दौर है और उन्हें पूरा यकीन है कि भारत अपनी निष्पक्ष विदेश नीति कायम रखेगा और दोनों देशों के बीच दोस्ती भी बरकरार रहेगी.

संबंधित समाचार