दलित बस्ती में पसरा सन्नाटा

दलित
Image caption दलित डर रहे हैं कि मायावती की हार के बाद कहीं उनसे बदला तो नहीं लिया जाएगा

लखनऊ से 14 किलोमीटर दूर सुल्तानपुर रोड पर एक गांव है मस्तामऊ. यहां मुख्य सड़क से गांव की ओर मुड़ने वाली सड़क के चौराहे पर समाजवादी पार्टी के समर्थकों की ही धूम थी.

मस्तामऊ गांव में बड़ी संख्या में दलितों के भी घर हैं. यूं तो इस गांव में समाजवादी पार्टी के भी काफी मतदाता हैं लेकिन मायावती का समर्थन करने वालों की भी कोई कमी नही है.

दोपहर के वक्त जब मैं इस गांव में पहुंचा तो इक्का-दुक्का दुकान ही खुली हुई थी और पास ही की खाली ज़मीन पर कुछ लोग चिनाई का काम कर रहे थे.

मिस्त्री का काम करने वाले गजोधर कहते हैं कि उन्होंने हाथी को वोट दिया था ये सोचकर कि बहन मायावती एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनेंगी.

लेकिन चुनाव परिणाम से उन्हें ही नहीं, उनके साथ के तमाम लोगों को धक्का लगा है और वो काफी निराश हुए हैं.

गजोधर कहते हैं कि जब आप किसी का समर्थन करते हैं और वो हार जाता है तो आपको थोड़ा खराब तो लगता ही है.

मुलायम से उम्मीदें

ये पूछे जाने पर कि क्या कभी मायावती ने इस गांव का दौरा किया या फिर यहां कोई काम करवाया तो वे कहते हैं, ''मायावती यहां कभी नही आई हैं और न ही यहां कोई खास काम हुआ है लेकिन बड़ी बात ये है कि वो हमारी ही जाति की हैं इसीलिए वो उनका समर्थन करते हैं.''

पर इसी गांव के यादव जी कहते हैं,"हमने बीएसपी को वोट न देकर मुलायम सिंह यादव को इसलिए वोट दिया क्योंकि मायावती सिर्फ पत्थर लगवाइन, हाथी लगवाइन और अपनी मूर्ति खड़ी किहिन".

तो मायावती ने दलितों का कितना कल्याण किया..इस सवाल पर गजोधर कहते हैं, उनकी समझ में तो सबसे बड़ा काम यही था कि दलित जिन्हें दबाया जाता था जिनका शोषण किया जाता था उससे कम से कम हमें मुक्ति मिल गई थी. समाज में बैठने की जगह मिली, ऊंच-नीच वाली बात अब नही रही.

अब गजोधर और उन जैसे कई बीएसपी समर्थकों को उम्मीद जताते हैं कि मुलायम सरकार सत्ता में आने के बाद ना तो उनके साथ बदले की भावना से काम न करे और न ही कोई भेदभाव करे.

इस बीच राजधानी लखनऊ की सड़कें और चौराहे जो बहुजन समाज पार्टी के भारी भरकम नीले रंग के पोस्टरों से पटे रहते थे, चुनाव परिणाम आने के चंद घंटों में ही उनकी जगह विशालकाय मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी के पोस्टरों ने ले ली है.

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