कोई राह नहीं निकली उत्तराखंड में

विजय बहुगुणा
Image caption विजय बहुगुणा को समझौता उम्मीदवार बताया गया था

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री विजय बहुगणा को लेकर कांग्रेस में अभी तक एकता नहीं हो पाई है.

एक तरफ हरीश रावत खेमा अब भी बहुगुणा के खिलाफ अड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ विजय बहुगुणा ने भी साफ कर दिया है कि वो मुख्यमंत्री रहें या जाएं, दबाव में आने वाले नहीं हैं. उन्होंने खुद को पार्टी की गरिमा के रक्षक के रूप में पेश कर लड़ाई का रुख दिल्ली की ओर मोड़ दिया है.

दरअसल 6 मार्च को चुनाव के नतीजे आने के बाद कांग्रेस पार्टी में उपर से सभी लोग एक साथ ही दिख रहे थे लेकिन छह दिन बाद जैसे ही सोनिया गांधी ने विजय बहुगुणा के नाम पर मुहर लगाई, पार्टी में बगावत हो गई.

कांग्रेस अध्यक्ष के इस फैसले के विरोध में हरीश रावत ने इसके विरोध में केंद्र में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. कल तक मुख्यमंत्री पद के लिये एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे हरक सिंह रावत ने भी बहुगुणा के खिलाफ हरीश रावत से हाथ मिला लिया.

कई तरह की अटकलों के बीच विजय बहुगुणा ने 14 मार्च को जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उनके साथ सिर्फ 12 विधायक थे. नई सरकार के गठन के इस समारोह से सभी बड़े नेताओं ने दूरी बनाए रखी और पाँच साल बाद सत्ता में कांग्रेस की वापसी का कोई जोश नजर नहीं आ रहा था.

पार्टी के 20 विधायक दिल्ली में हरीश रावत के साथ ही डटे रहे और उन्होंने अपनी ही सरकार के गठन का बहिष्कार कर दिया. यहां तक कि पार्टी के एक दर्जन से ज्यादा विधायकों ने अभी तक विधानसभा में शपथ नहीं ली है. बताया जाता है कि कभी नरम तो कभी गरम रूख अपनाकर कांग्रेस हाईकमान कोई बीच का रास्ता तलाशने की कोशिश में लगा हुआ है.

मंत्रीपद मेरी जूते की नोक पर- हरक

इस घटनाक्रम के बाद मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे हरक सिंह रावत पहली बार शनिवार को देहरादून लौटे.

उनके बगावती तेवर कायम थे और कम से कम वो किसी समझौते के मूड में बिल्कुल नजर नहीं आए.

अपने शुद्ध ठाकुर तेवरों के साथ उन्होंने कहा,"हरक सिंह पर किसी व्हिप या सिप का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. हरक सिंह रावत प्यार और मोहब्बत से तो गला कटा देगा लेकिन विधायक क्या मंत्रीपद भी मैं जूते की नोक पर रखता हूं."

उन्होंने कहा,"मैंने कसम खाई है, मैं मंत्रिपद नहीं लूंगा चाहे इसके लिए मुझे कितना भी नुकसान क्यों ना उठाना पड़े."

ये पूछे जाने पर कि कांग्रेस बहुमत कैसे साबित करेगी इसपर उनका कहना था कि "ये मुख्यमंत्री का काम है और ये आप उन्हीं से पूछिये."

चाहो तो कलेजा ले लो

उधर विजय बहुगुणा खेमे को उम्मीद है कि रूठे मना लिए जाएंगे और सरकार चल निकलेगी. उन्हें विश्वास है कि बागी विधायक कांग्रेस छोड़कर कथित तौर पर राजनीतिक आत्महत्या नहीं करना चाहेंगे. अगर इसे एक इशारा समझा जाए तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने भी एक ज़ोरदार डॉयलॉग उछाल दिया है.

"मुझमें कोई जिद्द नहीं है, कोई अकड़पन नहीं है, मैं अपने को सबसे मूर्ख व्यक्ति समझता हूं लेकिन दबनेवाला नहीं हूं. मैं केंद्रीय नेतृत्त्व की गरिमा नहीं गिरने दूंगा, पार्टी का सम्मान गिरने नहीं दूंगा, उसके बाद चाहे तो मेरा कलेजा ले लो या कुर्सी ले लो."

उत्तराखंड विधानसभा में कांग्रेस के कुल 32 विधायक हैं, इसके अलावा तीन निर्दलीय, तीन बीएसपी और उत्तराखण्ड क्रांति दल (पी) के एक विधायक के समर्थन से सदन में पार्टी ने कुल 39 विधायकों के समर्थन का दावा पेश किया है.

बहुगुणा खेमे को थोड़ी राहत इस बात से हो सकती है कि एक-एक कर हरीश रावत खेमे से कुछ विधायक बहुगुणा खेमे में लौट रहे हैं. इन्हीं नामों में ताजा़ नाम इंदिरा ह्रदयेश का भी है जिन्होंने शनिवार को विजय बहुगुणा से मुलाकात की.

हालांकि इस इस दौरान पार्टी का प्रदेश नेतृत्व दम साधे पल-पल गिन रहा है कि बाकी विधायक कब लौटते हैं और ये बात पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य के इस बयान से साफ होता है, "अभी तो दो दिन बचे हैं शपथ लेने के लिये 19 तारीख तक का दिन है हमारे पास."

राजनीतिक अस्थिरता का खतरा

Image caption विजय बहुगुणा ने दावा किया है कि वे सदन में अपना बहुमत साबित कर देंगे

अगर स्थिति यही रही तो 26 मार्च तक ही ये स्पष्ट हो जाएगा कि कांग्रेस की सरकार रहेगी या जाएगी. 26 मार्च को विधानसभा के स्पीकर का चुनाव होगा और पार्टी इसके लिये जाहिर तौर पर व्हिप जारी करेगी. 29 को सरकार को लेखानुदान पेश करना है और ये तभी हो पाएगा जब विजय बहुगुणा के पास सदन के भीतर ज़रूरी बहुमत हो.

अगर इसमें कोई अड़चन आती है तो उत्तराखंड में राजनीतिक अस्थिरता का खतरा पैदा हो जाएगा और ऐसे माहौल में प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू होने का खतरा पैदा हो जाता है. मीडिया में छपी खबरों के अनुसार राज्यपाल मार्गरेट अल्वा भी एक हफ्ते में केंद्र को रिपोर्ट दे सकती है.

इसके पहले 21 तारीख को मंत्रिमंडल का गठन भी होना है. इसमें भी गठबंधन सरकार होने के नाते कई विधायकों को उनकी वफादारी का इनाम देना है और नाराज गुट को भी सरकार में शामिल करना है.

ऐसे में कौन रहेगा...कौन जाएगा, उसके बाद विधानसभा स्पीकर के पद का चुनाव, फिर सदन में बहुमत साबित करना. ये तीन ऐसे पायदान हैं जिनपर विजय बहुगुणा को जीत हासिल करनी है. विजय बहुगुणा पहाड़ में जमीन से जुड़े नेता नहीं माने जाते हैं और कल तक उनका पहला परिचय हेमवती नन्दन बहुगुणा के बेटे के तौर पर ही था.

ऐसे में कई सवाल और समीकरण उभरकर सामने आ रहे हैं. सूत्रों के अनुसार सबसे पहली संभावना तो यही है कि कांग्रेस आलाकमान समझौते का कोई ऐसा फॉर्मूला लाएंगे जिसपर हरीश रावत खेमा राजी हो जाए और दूसरी संभावना ये है कि उत्तराखंड में कांग्रे पार्टी दो हिस्सों में बंट जाए और बहुगुणा की सरकार गिर जाए.

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