सुरक्षित हाथों में है हिंदी कविता- रवींद्र कालिया

  • 21 मार्च 2012
कविता
Image caption भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह 'यात्रा' और 'आधी रात में देवसेना' का कवर

''आह से उपजा होगा गान.....नैनों से बहकर....चुपचाप बही होगी कविता अंजान''.

किसी ने ठीक कहा है कि सृष्टि में जो पहला गीत रचा गया होगा वो दरअसल किसी के मन की आहत भावना से उपजा था, और जब मनु्ष्य की आंखों में आंसू की बूंदे आईं होंगी तभी कविता का जन्म हुआ होगा.

विश्व कविता दिवस के मौके पर बीबीसी हिंदी ने कविता के नए साधकों और नए पड़ाव के बारे में जानने की कोशिश की और समझने की कोशिश की कि क्या हिंदी कविता का दारोमदार मज़बूत कंधों पर है.

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, नागार्जुन, केदार सिंह, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, मैथिलीशरण गुप्त, त्रिलोचन वगैरह ने जिस अलख को जगाया था उसे बाद में केदार नाथ सिंह, अरुण कमल, बोधिसत्व, राजेश जोशी, हरीश चंद्र पांडे और अनामिका आदि ने आगे बढ़ाया और आज इस मशाल की लौ को जला कर रखा है देश भर के कुछ युवा कवियों ने जिनकी कविताओं को ना सिर्फ पहचान मिल रही है बल्कि उन्हें सम्मानित भी किया जा रहा है.

पहले कविता छंदों में बंधी होती थी लेकिन निराला ने अपने समय तक की पीढ़ी की परिपाटी को तोड़ते हुए मुक्त छंद की शुरुआत की थी और कविता छंद से मुक्त होकर गद्यात्मक हो गई. आज की पीढ़ी के कवि मुक्त छंद में लिखते हैं और ज़्यादतर कविता लेखन इसी में हो रहा है.

युवा कवियों की नई पीढ़ी

मध्यप्रदेश के खरगौन में 1978 में जन्मे प्रदीप जिलवाने पेशे से कंप्यूटर ऑपरेटर हैं और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं.

प्रदीप को लिखने का शौक बचपन से ही है.

इन्होंने इंदौर के देवी अहिल्याबाई विश्व विद्यालय से हिंदी में एमए किया है और वर्ष 2007 में उनकी पहली कविता छपी थी.

प्रदीप के शब्दों में साहित्य के प्रति उनकी रुचि राजेंद्र यादव की उपन्यास ''सारा आकाश'' से जगी और नरेश मेहता की ''ये पथ बंधु था'' किताब ने उनके जीवन को बदल दिया और उनकी गंभीर साहित्य में रुचि जगी.

उनकी कहानी ''उधेड़बुन'' को कथादेश द्वारा पुरस्कृत भी किया गया था और उनकी साहित्यिक यात्रा के पांचवे साल में ही भारतीय ज्ञानपीठ ने उनकी कविता संग्रह ''जहां भी हो ज़रा सी संभावना'' के लिए उन्हें वर्ष 2010 के युवा नवलेखन सम्मान से सम्मानित किया.

''दुख''-प्रदीप जिलवाने

''दुःख, हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है देह के जरूरी अंग-सा

दुःख, नमक की तरह घुल जाता है आसानी से और हलक में छोड़ जाता है अपना खारा अनुभव हर घूँट के बाद एक नया अनुभव

हम दुःख को दुःख हमें जानते हैं पहचानते हैं अच्छी तरह हम दुःख को और दुःख हमें घर के सामने लगे घूरे-से घूरते रहते हैं अकसर''

वरिष्ठ कवि, लेखक और भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवींद्र कालिया कहते हैं, ''इन नए कवियों की कविताओं में एक किस्म की ताज़गी है. उनकी सोच नई है, उनकी भाषा नई है जो किसी की नकल नहीं लगती और ज़िंदगी से लबरेज़ है. इन लोगों ने कविता को नई स्फूर्ति और ताज़गी दी है जो हिंदी कविता से गायब हो गई थी.''

अंशुल त्रिपाठी का जन्म 19 जुलाई 1975 को इलाहाबाद में हुआ था.

उन्होंने हिंदी में एमए किया है और पेशे से शिक्षक हैं. अंशुल 1998-99 से लगातार कविता लिख रहे हैं और लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में इनकी कविताएं छपी हैं.

इन्होंने 10-12 साहित्यिक शोधलेख भी लिखा है.

भारतीय ज्ञानपीठ ने हाल ही में इनकी अनुशंसित कविता संग्रह ''आधी रात में देवसेना'' को प्रकाशित किया है.

अंशुल कहते हैं कि उनपर शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के साहित्य का गहरा असर है, शरतचंद्र के उपन्यास 'श्रीकांत' और 'चरित्रहीन' पढ़ने के बाद उनका जीवन के प्रति नज़रिया बदला.

वे कहते हैं कि उन्होंने ज़्यादातर कहानी पढ़ी है लेकिन लिखी कविता है. इसके अलावा इलाहाबाद का साहित्यिक माहौल, शेखर जोशी, मार्केड्य जी, अमरकांत, बोधिसत्व और रविकांत जैसे अन्य युवा कवियों के साथ को अंशुल अपनी इस यात्रा के अहम साथी मानते हैं.

''इतिहास में स्त्रियां''- अशुंल त्रिपाठी

अपने बांझपन के इलाज में व्यस्त रानियां थीं गर्भ संभाले टहलती हुई दासियां थीं आखेट पर जाकर न लौटने वाली राजकुमारियां थीं शहंशाहों के मकबरों पर रोने को थीं वेश्याएं...

इतिहास में स्त्रियां कहां थीं..?

Image caption युवा कवि रविकांत और अंशुल दोनों ने ही इला.विवि से हिंदी में एमए किया और लगभग एक ही पीढ़ी के कवि हैं

वरिष्ठ कवि, साहित्यकार और भारत भूषण पुरस्कार से सम्मानित बोधिसत्व कहते हैं कि इन नए कवियों के बारे में सोचने पर जो पहले विचार हमारे दिमाग में कौंधते हैं वो ये कि, ''ये पीढ़ी किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं है, इनके लेखन में किसी तरह का सामाजिक, राजनैतिक और वैचारिक दबाव नहीं देखा जा सकता और इनका लेखन पूरी तरह से स्वतंत्र है.''

युवा कवि रविकांत का जन्म इलाहाबाद में 8 सितंबर 1975 को हुआ. उन्होंने हिंदी में एमए किया है.

रविकांत 1991 से कविताएं लिख रहे हैं.

कविता लिखने की शुरुआत किशोरावस्था में सच बोलने को लेकर एक ज़िद के साथ हुई कि आखिर झूठ क्यों बोला जाए ?

इसी कशमकश से पैदा हुई द्वंद की स्थिती में उन्होंने अचानक कुछ लिखा और बाद में पता चला कि पन्नों पर जो कुछ भी लिखा गया है वो असल में कविता है....इस पहली कविता का शीर्षक था 'वह सतपथी'.

इस तरह से कविता लिखने की शुरुआत हुई.

कविता लिखने पर उनके घर में विरोध के हल्के स्वर भी उठे, उन्हें तब तक तिरछी नज़र से देखा जाता रहा जब तक कि उनकी पहली कविता अख़बार में छपकर नहीं आ गई.

तीन साल तक डर-डर कर कविता लेखन करने के बाद घरवालों का नज़रिया बदला और तब उनकी मां ने बताया कि वो भी कविता लिखती थी और रविकांत के मुताबिक, ''इस तरह से मुझे एक नई बात पता लगी और अपनी कविता लेखन की परंपरा का पता चला...और मुझमें मां की कविता जीवित रही.''

रविकांत को उनकी पहली कविता संग्रह 'यात्रा' के लिए वर्ष 2008 का भारतीय ज्ञानपीठ से नवलेखन पुरस्कार मिला और इसी पुस्तक को वर्ष 2011 का हेमंत स्मृति पुरस्कार भी मिला.

रविकांत के अनुसार, ''शुरु का लेखन अपने संघर्षों की देन थी, फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लेखकों से वामपंथी विचारधारा के संस्कार मिले और इन विचारों ने जीवन को देखने का नज़रिया बदल दिया और ईश्वर और निजी कामनाओं की जगह जनता प्रतिष्ठित हो गई.''

'संजीव हुसैन'- रविकांत

मै पंजाबी हूँ मेरा नाम संजीव है कुछ ही दिन पहले की बात है मुझे एक अपरिचित घर में जाना पड़ा उस घर के सब बड़े सदस्य काम पर गए थे, मुझे वहां केवल दो बच्चे मिले. दो भाई. मैंने उनसे उनका नाम पूछा, तो बड़े ने बताया- तद्बीरुल हुसैन छोटे ने बताया- तन्वीरुल हुसैन. छोटा बहुत नटखट था उसने झट से पूछा- और आपका नाम ? मेरा नाम सुनकर शायद उसे कुछ अधूरा-सा लगा हो उसने बहुत खुश होते हुए इसे पूरा किया- संजीव हुसैन !

बोधिसत्व आगे कहते हैं, ''पहले की पीढ़ी के कवियों की रचना महानता के बोझ के तले दबी हुई थी. उनमें ये भावना थी कि हमें बड़ा काम करना है लेकिन मौजूदा दौर के युवा कवियों में ऐसा नहीं है. ये लोग दिन प्रतिदिन के छोटे-छोटे ब्यौरों के ज़रिए ही बड़ी कविता की रचना कर रहे हैं. उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि बड़ी कविता की रचना के लिए ये बड़े मुद्दों को उठाए और ऐसा करते हुए उनमें ये भावना बिल्कुल नहीं है कि ये महानता के सर्जक हैं.''

रवींद्र कालिया ये भी कहते हैं,''इस नई पीढ़ी के कवियों की कविता में ज़िंदगी धड़कती है. ये पीढ़ी ज़्यादा पढ़ी-लिखी पीढ़ी है और शायद इसलिए इनकी और पुरानी पीढ़ी के कवियों की संवेदनाओं में ज़मीन-आसमान का अंतर है.''

इन दोनों ही वरिष्ठ साहित्कारों की मानें तो हिंदी साहित्य और विशेषकर हिंदी कविता ना सिर्फ सुरक्षित हाथों में है बल्कि उन लोगों के संरक्षण में है जो छोटे-छोटे गांवों, कस्बों में रहने वाले लेकिन बड़े मूल्यों और कैनवास की सोच रखने वाले कवियों के हाथ में है.

Image caption प्रदीप जिलवाने की कविता संग्रह 'जहां भी जैसी भी हो संभावना' को वर्ष 2010 का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया गया है

राष्ट्रकवि दिनकर, नागार्जुन, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा आदि के बाद मंगलेश डबराल, केदार नाथ सिंह, अरुण कमल, बोधिसत्व, राजेश जोशी, हरीश चंद्र पांडे और अनामिका के हाथों होते हुए अब प्रदीप जिलवाने, विमलेश त्रिपाठी, नीलकमल, उमाशंकर चौधरी, अंशुल त्रिपाठी, रविकांत और कुमार अनुपम के हाथ में ना सिर्फ पूरी तरह से सुरक्षित है बल्कि उसकी वृद्धि ही हो रही है.

बोधिसत्व के शब्दों में अगर कहें तो, ''इस समय हिंदी के पास ऐसे 12 से 15 कवियों की एक श्रृंखला है जो लगातार गंभीर और संप्रेषण युक्त कविता लिख रहे हैं और इनमें अपनी कविता के ज़रिए पुरानी वर्जनाओं को तोड़ने और नई बात कहने का हौसला है. इस नई पीढ़ी ने कविता के सृजन में बुद्धि के बजाए अपने हृदय को ज़्यादा बड़ा स्थान दिया है, जिस कारण हिंदी कविता ज़्यादा समृद्ध और सहृदय हुई है, आम इंसान के करीब हुई है.''

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