अब भारत जुटा श्रीलंका को मनाने में

मनमोहन और राजपक्षे
Image caption श्रीलंकाई में भारत के रुख को लेकर नाराज़गी की ख़बरें हैं

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने के बाद श्रीलंका को मनाने के लिए मनमोहन सिंह ने शनिवार को राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को पत्र लिखकर कहा है कि भारत ने प्रयास किया और वह इसमें सफल भी हुआ कि प्रस्ताव को संतुलित किया जाए.

साथ ही मनमोहन सिंह ने लिखा है कि श्रीलंका को अल्पसंख्यक तमिलों की शिकायतें दूर करने के लिए टिकाऊ राजनीतिक हल निकालना चाहिए.

उल्लेखनीय है कि गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार से जुड़े एक प्रस्ताव पर भारत ने इसके पक्ष में मत दिया था.

इस प्रस्ताव में कहा गया था कि श्रीलंका को तमिल विद्रोहिया के ख़िलाफ़ युद्ध में सेना की ओर से व्यापक पैमाने पर तमिलों की हत्या के आरोपों के लिए युद्धापराध की जाँच की जाने चाहिए.

श्रीलंका में अल्पसंख्यक तमिल समुदाय का आरोप है कि युद्ध के दौरान श्रीलंका की सेना ने हज़ारों तमिलों की हत्या की थी.

इसके बाद केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए के एक प्रमुख घटक द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने सरकार पर दबाव बनाया था कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के पक्ष में मत दे.

मानमनौव्वल

इस प्रस्ताव के बाद ये सवाल उठाए गए थे कि घरेलू राजनीति के दबाव में कहीं भारत ने विदेश नीति को ग़लत मोड़ तो नहीं दे दिया.

कुछ विशेषज्ञों का मत था कि भारत ने ऐसा करके ग़लती की है और इससे श्रीलंका नाराज़ हो सकता है. श्रीलंका की मीडिया में आई ख़बरों में इस नाराज़गी की झलक साफ़ दिखाई पड़ी थी.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने पत्र में राष्ट्रपति राजपक्षे को लिखा है, "मैंने अपने प्रतिनिधि मंडल को निर्देश दिए थे कि वे श्रीलंका के समकक्षों के लगातार संपर्क में रहें और कोई सकारात्मक रास्ता तलाश करने का प्रयास करें. महामहिम को इस बात की जानकारी होगी कि हमने भरसक कोशिश की और प्रस्ताव की भाषा में संतुलन बनाने में सफल भी रहे."

अपने पत्र में प्रधानमंत्री सिंह ने इस बात का ज़िक्र भी किया है कि महिंदा राजपक्षे ने प्रस्ताव पर वोट से तीन दिन पहले उन्हें पत्र लिखा था और दोनों देशों ने एक ऐसे राजनीतिक प्रस्ताव पर चर्चा की थी जिससे तमिलों से जुड़े सभी मुद्दों का हल निकाला जा सके.

अपने पक्ष में मनमोहन सिंह ने श्रीलंका के राष्ट्रपति को याद दिलाया है कि पिछले तीन वर्षों से दोनों सरकारों ने युद्ध के दौरान विस्थापित हुए तमिलों के पुनर्वास के लिए और ढाँचागत विकास के लिए सघन प्रयास किए हैं.

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