मृतकों को सम्मान दिलाता अफगानिस्तान का 'अंडरटेकर'

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Image caption अब्दुल हाकिम कहते हैं कि हर मृतक को सम्मानजनक अंतिम-संस्कार का अधिकार है.

तालिबान और उनके भगौड़े नेता मुल्ला मोहम्मद उमर की जन्मस्थली दक्षिण अफ़गानिस्तान के प्रांत कंधार में अंडरटेकर यानि मृतसंस्कार का प्रबन्ध करने वाले अब्दुल हाकिम एक अनोखी भूमिका में हैं.

नेटो और अफ़गान सेना के हाथों मारे गए लड़ाकों के अंतिम संस्कार के लिए चरमपंथी सिर्फ़ उन्हीं पर भरोसा करते हैं. अब्दुल हाकिम तालिबान के नियंत्रण वाले क्षेत्र में मारे गए सैनिकों के शवों को भी अधिकारियों तक पहुंचाते हैं.

पिछले छह वर्षों में हाकिम कई शवों को सरकार और चरमपंथियों के बीच ले जाते रहे हैं. और उन्होंने ऐसे कई शवों की दफनाया भी है जिनपर किसी ने दावा नहीं किया.

लंबी सफेद दाड़ी वाले अब्दुल हाकिम मृत रिश्तेदार के शोक को भली-भांति समझते हैं. उन्होंने भी इसका दुख झेला है.

उनके दो पुत्रों और दामाद को तालिबान लड़ाकों ने मारा था और हाकिम को उनके शवों के लिए 14 दिनों का लंबा और दर्दनाक इंतज़ार करना पड़ा था.

अब अपने मरे हुए लड़ाकों के बारे में जानकारी के लिए तालिबान सबसे पहले उन्हीं से संपर्क साधते हैं.

अनुमति

सरकार और तालिबान के नियंत्रण वाले इलाके में बे-रोकटोक आवाजाही के लिए तालिबान ने उन्हें विशेष अनुमति पत्र दिया हुआ है. ऐसा ही एक पत्र सरकार ने भी जारी किया है.

तालिबान के संपर्क किए जाने के बाद हाकिम कंधार के शवगृह में जाते हैं. वहां अगर उन्हें कोई मृत तालिबान लड़ाका मिल जाता है तो वे उसे एक पीली शव ढोने वाली गाड़ी में चरमपंथियों के पास ले जाते हैं.

पैंसठ वर्षीय अब्दुल हाकिम कहते हैं कि पहली बार छह वर्ष पहले तालिबान ने उन्हें अपने एक लड़ाके के शव को लौटाने में सहायता करने का आग्रह किया था.

उन्होंने रेड क्रॉस के अफ़गानी स्वरूप ‘अफ़गान रेड क्रेसेंट’ का अपना कार्ड सरकारी अधिकारियों को दिखाना और उन्हें शव दे दिया गया.

इसके तुरंत बाद कंधार में अधिकारियों ने पांच सरकार के पक्षधर लड़ाकों के शव तालिबान नियंत्रित इलाके से लाने के लिए कहा. तालिबान ने अब्दुल हाकिम को इसकी इजाज़त दे दी.

इसके बाद वे दोनों तरफ़ के विश्वासपात्र बन गए.

मालिक काको के नाम से भी जाने जाने वाले अब्दुल हाकिम कहते हैं, “अब तक में 250 शवों को संभाल चुका हैं. इनमें से तालिबन के 127, आम लोगों के 28 और बाक़ी सरकारी पक्ष के थे. ”

मोबाइल पर तस्वीरें

नेटो और अफ़गान सेना मृत तालिबान लड़ाकों को कंधार के मीरवायज अस्पताल में लाते हैं. इन शवों को दो महीने तक शवगृह में रखा जाता है.

हाकिम कहते हैं, “अगर इस दौरान कोई शवों पर अपना दावा नहीं पेश करता तो मैं मृतकों को स्थानीय कब्रगाह में दफ़ना देता हूं.”

लेकिन अगर कोई दो माह बाद संपर्क तो?

अब्दुल हाकिम के पास इसका भी समाधान है. दफ़नाने से पहले वे अपने मोबाइल फोन पर शवों की तस्वीर उतार लेते हैं. वे कहते हैं कि उनकी योजना आंखों और बालों का रंग, कपड़े, घड़ियां और अंगुठियों आदि का रिकॉर्ड भी रखना चाहते हैं ताकि रिश्तेदारों को शिनाख्त में दिक्कत ना आए.

उन्होंने बीबीसी को बताया, “अगर कोई गुमशुदा व्यक्ति और मृतक को ढूंढ रहा होता है तो वो मुझसे संपर्क करता है. मैं उन्हें मोबाइल पर ली गई तस्वीरें दिखाता हूं. अगर उनके संबंधी की तस्वीर मिल जाती है तो मैं उन्हें कब्रगाह में ले जाता हूं. ”

हाकिम कहते हैं कि रेड क्रॉस अब हर शव का रिकॉर्ड रखती है और उन्होंने तस्वीरें उतारने के लिए फ़ोटोग्राफ़र भी नियुक्त किए हैं.

उन्होंने कंधार शहर में मारे गए 35 तालिबान लड़ाकों को दफनाया है जिनका कोई परिवार नहीं था.

इंतज़ार का दर्द

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Image caption अब्दुल हाकिम के दो पुत्र और दामाद तालिबान के हाथों मारे गए थे.

मीरवायज अस्पताल में शवगृह के इंचार्ज मोहम्मद असलम बताते हैं कि पुलिस को ये पता होता है कि कौन-सा शव आमलोगों का है और कौन-सा तालिबान का.

असलम कहते हैं, “पुलिस ही बताती है. हम शवों को फ़्रिज में रखते हैं. अगर कोई पुलिस मुख्यालय से पत्र लाता है तो हम उन्हें शव दे देते हैं. ”

शवगृह से निकाले गए हर शव के लिए किसी ना किसी को हस्ताक्षर करने होते हैं. तालिबान के शवों के लिए अब्दुल हाकिम ही दस्तखत करते हैं.

अब्दुल हाकिम की अपनी कहानी भी काफ़ी दर्दनाक है.

उनके दो बेटे और दामाद कंधार प्रांत के शवाली कोट जिले में एक पानी का टैंकर ले जा रहे थे कि तभी उनपर तालिबान ने हमला कर दिया. वे कहते हैं कि उन्हें इंतज़ार का दर्द मालूम है और इसीलिए वे लोगों की सहायता करते हैं.

हाकिम ने एक बार एक दिन के भीतर 14 तालिबान लड़ाकों के शव निकाले थे. वे कहते हैं कि हर शव की सम्मानजनक अंतिम संस्कार होना चाहिए.

अफ़गानिस्तान में पिछले 35 सालों से युद्ध और खूनी संघर्ष चल रहा है. इस देश में ऐसी ही कई अनकही कहानियां हैं, ऐसी कहानियां जिन्हें किसी ने ना तो लिखा, ना सुनाया और ना ही सुना.

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