गूगल अर्थ ने मिलाया बिछड़े मां-बेटे को

सारू
Image caption सारू अब अपने नए घर और परिवार के साथ तस्मानिया में रहते हैं

पच्चीस साल पहले अपनी मां और परिवार को खो देने के बाद एक भारतीय लड़का गूगल अर्थ के उपग्रह चित्रों की मदद से दोबारा अपने परिवार तक पहुंचने में सफल रहा है.

जब सारू खोए थे तब उनकी उम्र सिर्फ पांच साल थी और वो झाड़ू लगाने वाले अपने बड़े भाई के साथ भारत में ट्रेन में यात्रा कर रहे थे.

उस रात की घटना को याद करके सारू कहते हैं कि वो अपने भाई के साथ थे और घूमते-घूमते काफी थक गए थे. जिस स्टेशन पर ट्रेन खड़ी थी उससे नीचे उतरकर वो प्लैटफॉर्म की एक सीट पर आराम करने के लिए बैठ गए लेकिन बदकिस्मती से उनकी आंख लग गई.

नींद की उस एक झपकी ने सारू की जिंदगी बदल दी.

सारू कहते हैं, ''मुझे लगा कि मेरे बड़े भाई आएंगे और मुझे जगाकर ले जांएगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जब मैं उठा तो मुझे मेरे भाई कहीं भी नहीं मिले. मेरे सामने प्लैटफॉर्म पर एक ट्रेन खड़ी थी और मैं उसमें चढ़ गया ये सोचते हुए कि शायद मेरे भाई मुझे उस ट्रेन में मिल जाएंगे लेकिन मैं उनसे नहीं मिल पाया.''

सारू को ट्रेन में भी उनके भाई नहीं मिले और वे फिर से सो गए. इस बार जब उनकी नींद 14 घंटे बाद खुली और तब तक ट्रेन कोलकाता पहुंच चुकी थी.

सारू कहते हैं, ''मैं बहुत डर गया था और समझ नहीं पा रहा था कि कहां पहुंच गया हूं, मैं लोगों से मदद मांग रहा था. वो एक बहुत ही डरावनी जगह थी. मेरे ख्याल से कोई भी माता-पिता ये नहीं चाहेंगे कि उनका पांच साल का बच्चा कोलकाता की झोपड़पट्टियों में भटके.''

नए अभिभावक

पांच साल का छोटा बच्चा सारू ये जान गया था कि अब उसे खुद अपना ध्यान रखना है. वो सड़कों पर भीख मांगने लगा लेकिन इस दौरान भी उसने ये ध्यान रखा कि वो गलत लोगों के हाथों में ना पड़ जाए.

सारू के अनुसार, ''एक बार एक आदमी उसके पास आया और उसे खाना और आश्रय देने का लालच देने लगा लेकिन सारू को उस पर भरोसा नहीं हुआ और वहां से बचकर भाग निकला.''

कुछ समय बाद वो एक अनाथालय पहुंच गया जिसने उसे तस्मानिया के एक दंपत्ति ब्रायरलीज़ को गोद दे दिया. सारू भी तब तक ये जान चुका था कि वो वापस अपने घर नहीं जा सकता इसलिए वो भी ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए तैयार हो गया.

सारू अपने नए अभिभावकों के साथ उनके घर में बड़ी ही आसानी से घुल-मिल गया, लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ा होता गया उसके अंदर अपने बिछड़े हुए घरवालों से मिलने की इच्छा बढ़ती चली गई.

लेकिन इसमें कई समस्याएं थी. एक पांच साल के अनपढ़ बच्चे के तौर पर सारू को अपने कस्बे का नाम नहीं पता था. उसके ज़ेहन में बस कुछ यादें ताजा थीं. इन्ही यादों के सहारे वो गूगल अर्थ की मदद से अपना खोया घर ढूंढने लगा.

मेहनत रंग लाई

सारू कहते हैं कि ये पूरा अनुभव एक सुपरमैन जैसा था जो एक तस्वीर के सहारे तब तक अपनी खोज जारी रखे हुए था जब तक कि उसे सफलता नहीं मिल गई.

आखिरकार सारू ने एक ज्यादा कारगर तरीका ढूंढ निकाला, उसने अपनी यात्रा के 14 घंटों को भारतीय रेल की गति से गुणा किया जो लगभग 1200 किलोमीटर की दूरी निकला.

फिर उसने एक मानचित्र लिया जिसमें कोलकाता केंद्र में बना था, फिर उसके दायरे में उसने 1200 किलोमीटर की दूरी पर बसे शहरों को ढूंढना शुरु किया और जल्दी ही उसे खंडवा शहर मानचित्र में मिल गया.

सारू कहते हैं, ''जब मुझे खंडवा का पता चला तो मैं खुशी से उछल पड़ा. मैनें मानचित्र में ही सबकुछ ढूंढ लिया यहां तक कि उस झरने को भी जिसके नीचे में खेला करता था.''

इसके तुरंत बाद वो खंडवा की तरफ चल निकला. वो खंडवा की गलियों में अपने बचपन की यादों के साथ घूमता रहा और जल्द ही उसे गणेश तलाई के नजदीक अपना पुराना घर मिल गया. लेकिन अफसोस कि उस घर के दरवाज़े पर ताला जढ़ा था.

सारू के पास उसके बचपन की एक तस्वीर थी और उसे अपने परिवार वालों के नाम भी याद थे. एक पड़ोसी ने बताया कि उसका परिवार वहां से जा चुका है.

मां से मुलाकात

वो जब लोगों से अपने खोए परिवार के बारे में पता कर रहा था तभी वहां एक आदमी आया और उसने उससे कहा कि चलो मैं तुम्हें तुम्हारी मां से मिलवाता हूं.

सारू ने जब ये सुना तब उसका शरीर सुन्न पड़ गया, उसे लगा कि क्या जो वो सुन रहा है वो सही है?

सारू को पास ही में रह रही उसकी मां के पास ले जाया गया, शुरु में वो उन्हें पहचान नहीं पाया.

वो कहते हैं, ''आखिरी बार जब मैं अपनी मां मिला था तब वो चौंतीस साल की सुंदर महिला थी, मैं भूल गया था कि बढ़ती उम्र उनसे उनकी सुंदरता छीन लेगी लेकिन उनके चेहरे में अभी वो हाव-भाव बाकी थे जिससे मैं उन्हें आसानी से पहचान गया और मैंने उनसे कहा कि हां, आप मेरी मां हैं.''

सारू आगे कहते हैं ''उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे अपने घर के अंदर ले गईं. वे मुझसे कुछ कह नहीं पाई शायद मेरी तरह वो भी सन्न थीं, उन्हें ये स्वीकार करने में थोड़ा वक्त लगा कि पच्चीस साल के लंबे अंतराल के बाद उनका खोया बेटा उनके सामने खड़ा है.''

''हालांकि उन्हें इस बात का डर था कि मैं मर गया हूं लेकिन एक ज्योतिष ने उन्हें बताया था कि वे एक दिन अपने बेटे से जरूर मिलेंगी. मेरे ख्याल उस भविष्यवक्ता ने उनके अंदर जीने की इच्छा बचा कर रखी थी.''

भाई की मौत

वैसे सारू के लिए बुरी खबर ये थी कि जिस भाई के साथ वो ट्रेन में घूम रहे थे, बदकिस्मती से उनके जाने के 2 महीने बाद ही उसकी मौत हो गई थी. उनका शव रेलवे ट्रैक पर दो टुकड़ों में पाया गया था.

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Image caption सारू ने गूगल अर्थ की मदद से खंडवा स्थित अपना खोया घर ढूंढ निकाला

सारु कहते हैं, ''हम दोनों काफी करीब थे इसलिए जब मैं भारत छोड़कर आने लगा तो मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की थी कि मेरे भाई की मौत हो गई है.''

सालों तक सारू ब्रायरली जब रात में सोने जाते थे, तब यही उम्मीद करते थे कि काश वे अपने बिछड़े हुए परिवार से दोबारा मिल पाएं, अब जब कि ऐसा हो गया है तो वो ईश्वर के शुक्रगुज़ार हैं.

वे कहते हैं कि अब वे चैन की नींद सो सकेंगे.

सारू की खुशकिस्मती यहीं खत्म नहीं होती, उनकी इस रोचक कहानी को खरीदने के लिए कई प्रकाशक और फिल्म प्रोड्यूसर उनसे संपर्क साध रहे हैं.

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