कराकोरम में पिघलने की बजाय बढ़े ग्लेशियर

कराकोरम ग्लेशियर इमेज कॉपीरइट AP

वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया के सबसे बड़े ग्लेशियर क्षेत्रों में से एक कराकोरम रेंज के ग्लेशियर पिघल नहीं बल्कि फैल रहे हैं.

फ्रांस की एक टीम ने उपग्रह से प्राप्त चित्रों की सहायता से ये पता लगाया है कि इन ग्लेशियर्स ने ना सिर्फ वैश्विक गर्मी का सफलता पूर्वक सामना किया है बल्कि अब बढ़ रहे हैं.

बढ़ते तापमान की वजह से दुनिया के दूसरे इलाकों में पहाड़ों पर बर्फ पिघली है लेकिन कराकोरम क्षेत्र इसका अपवाद है. लेकिन इसकी वजहें अभी स्पष्ट नहीं हैं.

'और भी काम करना होगा'

पर्वतों के विकास पर काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था आइसीमोड में रिमोट सेंसिंग विशेषज्ञ प्रदीप मूल ने बीसीसी से बातचीत में कहा, "कराकोरम इलाके में कुछ ग्लेशियर बढ़ रहे हैं, लेकिन हम यह नहीं जानते कि समूचे इलाके में ऐसा हो रहा है या नहीं. इसके लिए हमें जमीन स्तर पर उन्हें मापना होगा. ग्लेशियर के इलाकों में जमीन पर उन्हें मापने का काम या हुआ ही नहीं है या बहुत कम हुआ है. ग्लेशियर का क्षेत्रफल बढ़ रहा है लेकिन उसके आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि वाकई ग्लेशियर बढ रहे हैं. अभी और काम करना होगा."

सालों से विशेषज्ञ पश्चिम हिमालय में कराकोरम रेंज में 20000 वर्ग किलोमीटर में फैले ग्लेशियरों पर चर्चा करते आए हैं. यह इलाका चीन पाकिस्तान और भारत में फैला हुआ है. इसी इलाके में दुनिया की दूसरी सबसे ऊँची चोटी के-2 भी है.

इन ग्लेशियरों में दुनिया की तीन फीसदी बर्फ फैली हुई है. विश्व के कई इलाकों में बढ़ते तापमान के कारण पहाड़ी ग्लेशियर पिघल रहे हैं जिससे समुद्र के जल स्तर में वृद्धि हो रही है.

लेकिन अभी तक कराकोरम में स्थिति अस्पष्ट ही रही है. वैज्ञानिकों के लिए यहाँ के ग्लेशियरों का अध्ययन कर पाना करीब करीब असंभव हो चला है, क्योंकि यह क्षेत्र काफी ऊँचाई और सीमा क्षेत्रों में फैले हुए हैं और बर्फीले तूफानों के कारण वहाँ पहुँच पाना भी काफी दुर्गम हो चला है.

कम गर्मी, ज्यादा बर्फ

लेकिन फ्राँस के वैज्ञानिक 3-डी उपग्रह तस्वीरों के जरिए 2000 और 2008 के नक्शों की तुलना करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस दौरान ग्लेशियर की बर्फ में कोई कमी नहीं आई है बल्कि वहाँ 0.11 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से बर्फ बढ़ी ही है.

दक्षिण पूर्वी फ्राँस के ग्रेनोबिल विश्व विद्यालय की जूली गारगेले ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि कराकोरम में हालात थोड़े भिन्न हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि फिलहाल यहाँ के ग्लेशियर स्थाई हैं.

लेकिन उन्होंने आगाह भी किया कि इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि पूरे विश्व में बढ़ते तापमान की समस्या कम हो रही है.

यह अध्ययन चीन की सीमा में यारकांत नदी और पाकिस्तान के अंदर सिंधु नदी के बीच 5615 वर्ग किलोमीटर के कराकोरम इलाके की उपग्रह जाँच पर आधारित है.

"ज्यादा प्रभाव नहीं होगा"

प्रदीप मूल कहते हैं, "कराकोरम में ग्लेशियर की जो वृद्धि हुई है, वह बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण नहीं है. ऐसा नहीं है कि सारा ग्लेशियर बढ़ रहा है. एक छोटे से इलाके में विस्तार देखने को मिला है. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इससे वहां के पर्यावण पर कोई बड़ा असर होगा."

यह इलाका सियाचिन ग्लेशियर के बाहर पड़ता है जहाँ भारत और पाकिस्तान की सेनाएं एक दूसरे से भिड़ती रही हैं. इस्लामाबाद के सस्टेनेबिल डेवेलपमेंट पॉलिसी इंस्टीट्यूट के अनुसार पिछले 35 वर्षों में सियाचिन ग्लेशियर 10 किलोमीटर तक सिकुड़ चुका है.

इसी अध्ययन में कनाडा के ओनटोरियो विश्वविद्यालय के ग्राहम कोगली ने लिखा है कि यह याफ नहीं हो पाया है कि कराकोरम में अभी तक ग्लोबल वार्मिंग का असर क्यों नहीं पड़ा है.

कोगली कहते हैं, "ऐसा लगता है कि वर्तमान में इन पहाड़ों में कम गर्मी और ज्यादा बर्फ पहुँच रही है." हिमालय के ग्लोशियरों के स्वास्थ्य पर बारीक नजर रखी जा रही है कयोंकि इनके द्वारा ही दक्षिण एशिया और चीन के एक अरब से ज्यादा लोगों के पानी की आपू्र्ति होती है.

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