हीरो से विलेन क्यों हो गए सार्कोजी

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फ़्रांस में ऐसी भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं कि राष्ट्रपति निकोला सार्कोजी दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव नहीं जीत पाएँगे. फ़्रांस में राष्ट्रपति चुनाव के पहले चरण के लिए रविवार को मतदान होना है और इन भविष्यवाणियों के पीछे सार्कोजी को लेकर लोगों की व्यक्तिगत नफ़रत बताई जा रही है.

मगर इसके पीछे वजह क्या है?

उन्होंने 2007 में कार्यभार सँभाला था और आधुनिक समय में किसी भी फ़्रांसीसी राष्ट्रपति को लोगों की इतनी नफ़रत का सामना नहीं करना पड़ा है. मगर ये नफ़रत उनकी नीतियों के विरोध के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है.

वैसे तो सभी नेता जो भी फ़ैसले करते हैं उसके प्रति कुछ विरोध स्वाभाविक रूप से होता है मगर कुछ ही नेताओं का विरोध इतना ज़्यादा होता है जितना सार्कोज़ी का हो रहा है.

समाचार वेबसाइट एटलांटिको के संपादक ज्याँ सेबेस्टियन फ़र्जू कहते हैं, "अधिकतर लोगों के बीच निकोला सार्कोज़ी को लेकर नफ़रत काफ़ी अतार्किक सी लगती है क्योंकि सर्वेक्षणों के अनुसार अगर आप सार्कोज़ी का नाम लिए बिना लोगों से उनकी नीतियों के बारे में पूछें तो वे उसका समर्थन करेंगे पर जैसे ही सार्कोज़ी का नाम लें वो विरोध में बदल जाता है."

'सार्कोफ़ोबिया' यानी सार्कोज़ी को लेकर लोगों का डर पेरिस के बुर्जुआ वर्ग के कैफ़े और सांस्कृतिक केंद्रों में बसा है, जहाँ राष्ट्रपति सार्कोज़ी को लगातार पैसे के लालची, थोड़े से नस्लवादी और ख़तरनाक व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है.

लोगों का मनोरंजन करने वाले क्रिस्टॉफ़ एलेवेक ने एक इंटरव्यू में सार्कोज़ी को 'ख़तरनाक, दूसरे ग्रह से आया हुआ... अपने ही झूठ पर भरोसा करने वाला बेवकूफ़ और मानसिक रूप से असामान्य' बताया था.

उन्होंने कहा, "अगर उन्हें पैसा इतना ही पसंद है तो वो ठीक है मगर ये उनकी परेशानी है, मेरा तो सुझाव होगा कि वो किसी बैंक में नौकरी कर लें.. और हमें अकेला छोड़ दें."

संपन्न जीवन शैली

पाँच साल पहले जब उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की थी तो उसके बाद काफ़ी महँगे शॉन्ज़ एलीज़े इलाके़ के ल फ़ुकेत रेस्तराँ में उन्होंने उसका जश्न मनाया था. आज भी उसे उनकी संपन्न जीवन शैली का प्रतीक माना जाता है.

वैसे दक्षिणपंथी वकील और लेखक जाइल्स विलियम गोल्डानेल के अनुसार सार्कोज़ी के विरोध की जड़ें सार्वजनिक संस्कृति से जुड़ी हैं.

वह कहते हैं, "ये वो पुरानी क्रांतिकारी और रोमांटिक परंपरा है जहाँ पैसे या संपदा का प्रदर्शन करने वाली किसी भी चीज़ पर हमला किया जाएगा. इसके अलावा ये पत्रकारों के पेशे के भी अनुकूल है जहाँ वामपंथियों की अच्छी खासी पकड़ है."

गोल्डानेल के अनुसार, "सर्वेक्षण दिखाते हैं कि 80 से 95 प्रतिशत पत्रकार वामपंथी या धुर वामपंथी हैं, ऐसे में वे सार्कोज़ी की बुराइयों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं और वही एजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं."

उनके प्रति नफ़रत का एक और तर्क एक लेखक आंद्रे बर्काफ़ देते हैं. वह कहते हैं, "अधिकतर लोग राष्ट्रपति को उनकी चमक-दमक वाली जीवन शैली के लिए नापसंद नहीं करते दरअसल उन्होंने बतौर राष्ट्रपति कैसे बर्ताव करें- उसके नियम तोड़ दिए."

राजशाही शैली

बर्कॉफ़ के अनुसार, "जब डि गॉल राष्ट्रपति बने वो उन्होंने उसे राजशाही की तरह चलाया और उसके बाद से दक्षिणपंथी हो या वामपंथी उसने उसी परंपरा का पालन किया.. मगर जब सार्कोज़ी आए तो उन्होंने कहा कि मैं नरेश बनकर नहीं रहना चाहता- मैं राजनीतिज्ञ बनना चाहता हूँ. लोगों को वही पसंद नहीं आया."

इसके अलावा बर्कॉफ़ सार्कोज़ी के प्रति लोगों के नफ़रत की एक और वजह ये भी मानते हैं कि उन्होंने फ़्रांसीसियों को कुछ असहज करने वाले सच बता दिए.

वह कहते हैं, "जब तक मितराँ और शिराक़ जैसे नेता क्रांति के बाद की उस सोच को सींचते रहे कि फ़्रांसीसी लोग दुनिया के चुनिंदा लोगों में से हैं जिनके लिए आम नियम नहीं लागू होते तब तक फ़्रांसीसी लोग ख़ुश थे."

उनके अनुसार, "फ़्रांस में ये व्यापक भावना है कि हम लोगों को एक नई राह चलानी चाहिए.. दक्षिणपंथी उम्मीदवार ज्याँ लुक मेलेन्शॉ की सफलता देखिए. सार्कोज़ी ने इस सोच की हवा निकाल दी- बस लोग इसीलिए उनसे नफ़रत करते हैं."

दूसरा पक्ष

सार्कोज़ी के विरोधी मानकर चल रहे हैं कि सार्कोज़ी चुनाव हार चुके हैं मगर सॉरबॉन विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर मिचल मैफ़ेसोली इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं.

वह ये तो मानते हैं कि सार्कोज़ी लोगों की नफ़रत के केंद्र में हैं मगर साथ ही वह बताते हैं कि बुद्धिजीवियों और लोगों की सोच में अंतर है. इसके अलावा लोगों के बीच राष्ट्रपति की पकड़ उससे कहीं ज़्यादा है जितना लोग समझते हैं.

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Image caption सार्कोज़ी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें आम लोगों के बीच मौन समर्थन भी बड़े पैमाने पर हासिल है

मैफ़ेसोली कहते हैं, "अब लोग आधुनिकता से भी आगे के काल में हैं जहाँ तर्क या बौद्धिकता पर भावुकता को प्राथमिकता दी जा रही है और सार्कोज़ी ने तुरंत इसको समझ लिया है. वह आम लोगों से तारतम्य बेहतर ढंग से बना पाए हैं."

वह जनमत सर्वेक्षणों को भी ज़्यादा अहमियत नहीं दे रहे हैं क्योंकि लोग जानते हैं कि उन्हें सार्वजनिक तौर पर क्या कहना चाहिए, इसलिए वह सार्कोज़ी के लिए अपना समर्थन कम करके दिखाते हैं.

उनके अनुसार, "मगर मतकेंद्रों में बात अलग होती है. मतकेंद्र बिल्कुल गर्भ की तरह होता है जहाँ व्यक्ति अपनी भावनाओं से फिर से जुड़ता है और दिमाग़ के मुक़ाबले अंतरात्मा की आवाज़ सुनता है. इसीलिए मैं सोचता हूँ कि सार्कोज़ी अब भी जीत सकते हैं."

ये बात वैसे तो काफ़ी दूर की कौड़ी लगती है और मैफ़ेसोली जो भी सोचें मगर जनमत सर्वेक्षण तो साफ़ साफ़ दूसरी बात कह रहे हैं.

ऐसे में एटलांटिको के संपादक ज्याँ सेबेस्टियन फ़र्जू कहते हैं कि, "जो लोग समाजवादी प्रत्याशी फ़्रासुआ उलांड का समर्थन करने की बात कह रहे हैं उनमें से 60 फ़ीसदी लोगों का कहना है कि वे ऐसा सिर्फ़ सार्कोज़ी को हटाने के लिए करेंगे."

ऐसे में नया राजनीतिक अध्याय शुरू करने की ये नींव काफ़ी सकारात्मक नहीं होगी.

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