गैर मुसलमानों के लिए खाड़ी में पहला शमशान-क्रबिस्तान

भारत समेत एशिया और यूरोप के लोग बरसों से मुस्लिम बहुल खाड़ी देशों में रह रहे हैं. इनमें से अनेक गैर मुसलमान है.

ये लोग न केवल अपना कामकाजी जीवन खाड़ी के देशों में बिताते हैं बल्कि इनमें से बहुत से प्रवासी तो अपनी अंतिम साँस भी यहीं लेते हैं.

अब संयुक्त अरब अमीरात में एक नया शवदाहगृह बना है जहाँ गैर मुसलमानों का भी अपने रस्मो रिवाज के अनुरुप अंतिम संस्कार किया जा सकता है. खाड़ी में गैर मुसलमानों के लिए ये पहली ऐसी सुविधा है. हिंदू, सिख, ईसाई सब धर्म के लोग यहाँ आते हैं.

संयुक्त अरब अमीरात का राष्ट्र धर्म इस्लाम है. इस्लाम के तहत किसी की मौत के बाद उसे केवल दफनाया जा सकता है. जबकि बाकी धर्मों की परपंरा अलग है.

जनवरी में खुला नया क्रीमेटोरीअम गैर मुसलमानों के लिए है. संयुक्त अरब अमीरात में 82 लाख लोगों में से करीब 85 फीसदी लोग दुनिया के अन्य हिस्सों से आकर बसे हैं और कुछ की मौत भी इधर ही हो जाती है. इनमें से बड़ी संख्या भारतीय उपमहाद्वीप से आए कामगरों की है.

गैर मुसलमानों के लिए ये सेवा अल फोहा फ्यूनरल सर्विसिस चलाती है.

दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान

अल फोहा फ्यूनरल सर्विसिस के मुख्य कार्यकारी डॉन फॉक्स कहते हैं, “विश्व भर से लोग यहाँ आकर रहते हैं, काम करते हैं, उनका परिवार भी यहीं होता है, बच्चों की परवरिश भी यहीं होती है, कुछ की मौत भी इधर ही हो जाती है. हम ऐसे ही लोगों की मदद करते हैं. बहुत से लोग खाड़ी को ही अपना घर मानने लगते हैं. वे नहीं चाहते कि मौत के बाद अंतिम क्रिया के लिए शव को वापस उनके देश ले जाया जाए.”

डॉन फॉक्स कहते हैं कि अपने मूल वतन के बजाय खाड़ी के देशों में ही अंतिम क्रिया करने के पीछे खर्चा भी एक कारण है.

वे बताते हैं, “मसलन किसी यूरोपीय देश में शव वापस भेजने के लिए कम से कम दस हजार डॉलर लगते हैं. जबकि हमारे यहाँ एक चौथाई में ही हो जाएगा.”

अबू धाबी और दुबई में 2010 में ही विदेशों से आकर बसने वाले करीब 4300 लोगों की मौत हुई.

गैर मुसलमानों के लिए बने कब्रिस्तान या शमशानघाट के लिए अबू धाबी सरकार ने जमीन दान में दी है. इस पर एक करोड़ डॉलर का खर्च आया है. अंतिम संस्कार के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीन पर अतिरिक्त 20 लाख डॉलर खर्च किए गए हैं.

डॉन फॉक्स कहते हैं कि ये दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान दिखाने का सरकार का तरीका है.

पहले चार महीनों में ऑस्ट्रिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक के लोगों का अंतिम संस्कार किया गया है.

यहाँ ऐसे लोगों को भी सुविधा दी जाती है जो चाहते हैं कि उनके परिजनों के शव को उनके वतन भेज दिया जाए. अल फोहा ने अबू धाबी के राष्ट्रीय एयरलाइन की कार्गो डिविजन से एक करार किया है जो मृतकों के अवशेषों को भेजता है.

पैसे भी बचते हैं

खाड़ी में आकर काम करने वाले कई मजदूरों की नौकरी के दौरान ही मौत हो जाती है. खाड़ी में रोजगार देने वालों की ये जिम्मेदारी होती है कि अगर काम के दौरान मौत हो जाए तो उन्हें अंतिम संस्कार या शव वापस भेजने में आर्थिक मदद करनी पड़ती है.

अल फोहा ने उन कॉलोनियों को चिन्हित किया है जहाँ ये मजदूर आमतौर पर रहते हैं. डॉन फॉक्स कहते हैं कि अगर परिवार और कंपनी सहमत हों तो स्थानीय स्तर पर ही अंतिम क्रिया की जा सकती हैं जिससे परिवार और कंपनी दोनों का पैसा बचता है.

वे बताते हैं कि इस पूरे काम में स्थानीय लोग का समर्थन उन्हें मिलता है हालांकि खाड़ी के लोगों को ताबूत बनाना, उसे पैसा खर्च करके सजाने आदि की अवधारणा थोड़ी हैरानी वाली लगती है.

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