नेपालः स्थिरता अब भी दूर का सपना

  • 30 अप्रैल 2012
Image caption सभी लोगों की मांगों को पूरा करना राजीतिक नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती है

नेपाल में नया संविधान लागू होने में एक महीने का समय भी नहीं बचा है लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि संविधान किसी भी तरह का लिखा जाए, लेकिन इस बात की संभावना नहीं दिखती कि देश में राजनीतिक स्थिरता का वह दौर आएगा जिसका लंबे समय से वादा किया जा रहा है.

सोमवार को दक्षिणी तराई के जनकपुर शहर में हुए धमाके से संकेत मिलता है कि राष्ट्र के पुर्नगठन का मुद्दा किस तरह अविश्वास के माहौल को जन्म दे रहा है. इस धमाके में कम से कम चार लोगों की जानें गईं.

विस्फोट से मारे गए लोगों में वे कार्यकर्ता भी शामिल हैं जो नए संविधान में नए मिथिला प्रांत की मांग के साथ धरने पर बैठे थे.

इस तरह की मांगों से क्षेत्रीय हालात खराब हुए हैं क्योंकि उस इलाके में मधेसी कहलाने वाले लोगों की अच्छी खासी संख्या है जो भारत से लगने वाले नेपाल के दक्षिणी मैदानी इलाकों में एक मधेस प्रांत की मांग कर रहे हैं.

'टकराती' मांगें

पिछले हफ्ते देश के कई हिस्सों में आंदोलन, विरोध प्रदर्शन और यहां तक कि हड़तालें भी होती रहीं. लोग परस्पर विरोधाभासी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे.

राजधानी काठमांडू में जहां लोगों ने जातीयता के आधार पर प्रांत बनाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया, वहीं सुदूर पश्चिमी हिस्से में आम जनजीवन इसलिए ठप हो गया क्योंकि स्थानीय कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतर कर मांग की कि जब राजनीतिक नेतृत्व पुनर्गठन की प्रक्रिया के बारे में फैसला करे तो उनके इलाके न छुआ जाए.

क्षेत्रीयता, जातीयता, भाषा और यहां तक कि धार्मिक आधार पर विभिन्न समूह अपनी मांगों को सामने रख रहे हैं.

मुसलमान इस बात को लेकर आंदोलन कर रहे हैं कि नए संविधान में उनकी पहचान को सुरक्षित करने के लिए उपाय किए जाए.

यहां तक कि ब्राह्मण और छेत्री जैसी ‘दबदबा रखने वाली’ जातियां भी मैदान में उतर चुकी हैं और काफी मुखरता से अपनी इस मांग को उठा रही हैं कि नए संविधान में उन्हें ‘हाशिए पर’ न डाला जाए.

इन मांगों से पता चलता है कि नेपाल में 27 मई के बाद की स्थिति खासी चिंताजनक हो सकती है.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption राजनीतिक मतभेदों के बीच विकास की प्रक्रिया भी सुस्त पड़ी है

जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक डॉ. कृष्ण खनाल कहते हैं, “यह बात तो साफ है कि चाहे जैसा भी संविधान हो, उसे लेकर विरोध प्रदर्शन होंगे. आप उन सबको संतुष्ट नहीं कर सकते. सवाल ये है कि क्या वे (प्रदर्शनकारी) नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे, अभी मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है.”

'कोई सुराग नहीं'

पूर्व मंत्री डॉ. प्रकाश चंद्र लोहानी का कहना है कि चारों बड़ी राजनीतिक पार्टियों माओवादियों, नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी और मधेसी संयुक्त मोर्चा के बड़े नेता भी इस बारे में कुछ नहीं जानते. लोहानी अभी दक्षिण-मध्यपंथी पार्टी राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं.

डॉ. लोहानी कहते हैं, “मैंने नेताओं को 27 मई के बाद वाली स्थिति पर चर्चा करते हुए नहीं देखा है. वे इस बात पर विचार नहीं कर रहे हैं कि नए संविधान की घोषणा के बाद क्या होगा और क्या वे स्थिति को संभाल पाएंगे.”

इस वक्त सबका ध्यान दो मुख्य बातों पर केंद्रित है. पहली, शासन पद्धति किस तरह की होगी. इसमें पार्टियां एक मिश्रित व्यवस्था को लागू करने के बारे में सोच रही हैं जिसमें प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच सत्ता की साझेदारी होगी.

दूसरी बात है राष्ट्र का पुनर्गठन या देश का संघीय विभाजन, जिसे लेकर सबसे ज्यादा विवाद हैं.

अभी तक ये भी तय नहीं हो पाया है कि कितने प्रांत होंगे और उनके नाम क्या होंगे.

इस मुद्दे पर किसी भी तरह की सहमति से विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू होना तय है क्योंकि ऐसे बहुत से समूह हैं जिनकी मांगें परस्पर विरोधी हैं.

Image caption प्रचंड की पार्टी के कुछ नेता उन पर विश्वासघात का आरोप लगा रहे हैं

डॉ. लोहानी ने कहा, “हल का इकलौता तरीका यही है कि जातीय समूहों की आकांक्षाओं को स्वीकार किया जाए, लेकिन जातीयता के आधार पर संघीय प्रांतों का विभाजन जैसी उन मांगों को पर तवज्जो देने की जरूरत नहीं जिनसे दूसरे समूहों को परेशानी हो.”

यह बात कहने में आसान है, लेकिन करने में कठिन.

‘सब हो जाएगा’

दूसरी तरफ सरकार को भरोसा है कि सब कुछ आसानी से निपट जाएगा.

प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई के मुख्य राजनीतिक सलाहकार और माओवादी पार्टी के ताकतवर पोलित ब्यूरो के सदस्य देवेंद्र पदौल कहते हैं, “हम जानते हैं कि कुछ ऐसे गुट या समूह होंगे जो असंतुष्ट रहेंगे. लेकिन अगर बड़ी पार्टियां एक साथ आएं और हम अपने लोगों की मुनासिब मांगों को पूरा कर पाएं तो फिर इस तरह का असंतोष खत्म हो जाएगा.”

हालांकि सभी पार्टियों को एक साथ लाना आसान काम नहीं होगा.

खुद सत्ताधारी माओवादी पार्टी में एक प्रभावशाली धड़ा अपने रास्ते अलग करने की तरफ बढ़ रहा है और वह रास्ता उस तरफ भी जा सकता है जिसे “विद्रोह” कहा जाता है. बहुत से विश्लेषक मानते हैं कि 27 मई को लागू होने वाले संविधान से इस धड़े को अपने रास्ते जुदा करने का “बहाना” मिल सकता है.

इस धड़े का नेतृत्व पार्टी के उपाध्यक्ष मोहन बैदा किरण कर रहे हैं जो फिर से क्रांति शुरू करना चाहते हैं. उनका आरोप है कि पार्टी चेयरमैन प्रचंड ने अन्य राजनीतिक पार्टियों के साथ एक के बाद एक समझौते करके उनकी उनकी उम्मीदों से “विश्वासघात” किया है.

उनका कहना है कि इस तरह का एक विश्वासघात पूर्व माओवादी लड़ाकों को नेपाली सेना को सौंपना था.

Image caption दलित परिवार से आईं कृष्णा कुमारी परियार भी संविधान लिखने वाली सभा की सदस्य हैं, लेकिन इस काम में बेहद चुनौतियां उनके सामने हैं

देश भर में दो दर्जन शिविरों में लगभग 19 हजार पूर्व लड़ाके थे जो संयुक्त राष्ट्र की तरफ से पंजीकृत किए गए थे. शांति समझौते के तहत उनके हथियार ले लिए गए और उन्हें दो विकल्प दिए गए. या तो वे सेनानिवृत्त हो जाए या फिर नेपाली सेना में भर्ती हो जाए.

तीन हफ्ते पहले माओवादियों के नेतृत्व वाली सरकार ने सेना को आदेश दिया कि वो शिविरों और लड़ाकों को अपने नियंत्रण में ले ले.

ये कदम छह साल से जारी शांति प्रक्रिया में एक मील का पत्थर है.

आखिरी समयसीमा

लेकिन निर्वाचित संविधान सभा द्वारा संविधान लिखने का बड़ा काम अभी पूरा होना बाकी है.

नए संविधान की समयसीमा को पहले ही चार बार बढ़ाया जा चुका है. फिलहाल मौजूदा समयसीमा 27 मई को खत्म हो रही है. इसे अंतिम समयसीमा समझा जा रहा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले में कह चुका है कि अब समयसीमा को और आगे नहीं बढ़ाया जा सकता.

इसी फैसले के कारण राजनेता भी मान रहे हैं कि अब तेजी से काम करना होगा.

जैसा कि पहले होता रहा है, ऐन वक्त पर उनके बीच कुछ सहमति हो जाने की उम्मीद है.

लेकिन इससे भी ज्यादा सोचने वाली बात यह है कि उसके बाद क्या होगा.

संबंधित समाचार