कटी ऊंगली लेकिन हौसला बरकरार

Image caption डॉक्टरों के अथक प्रयास से अख्तर अब दोबारा लिख सकती हैं

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में जब हवा अख्तर जुई को डॉक्टरों ने बताया कि वो अपने विकलांग दाहिने हाथ से दोबारा लिख सकती हैं, तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा.

21 वर्षीया अख्तर ने अपने दाहिने हाथ की अँगुलियों के कट जाने के बाद लिखने की उम्मीदें हमेशा के लिए छोड़ दी थीं.

दरअसल अख्तर के पति ने उनकी अँगुलियां महज इसलिए काट दी थीं क्योंकि उन्होंने बिना पति की अनुमति लिए कॉलेज में दाखिला ले लिया था.

ढाका स्थित पुनर्वास केंद्र के डॉक्टरों ने अख्तर के हाथ का कई बार ऑपरेशन किया जिसके तहत उनकी अँगुलियों और अँगूठे में इस प्रकार से खपच्ची लगा दी, ताकि वो पेंसिल या पेन पकड़ सकें.

नरसिंगदी कस्बे में अपने माँ-बाप के एक बेडरूम के मकान में में बैठी अख्तर जुई ने बताया, “यह जानकर कि अब मैं लिख सकती हूं, इससे मैं बेहद उत्साहित हूं. मैंने धीरे-धीरे अभ्यास करना भी शुरू कर दिया है. मैं अपनी पढ़ाई जारी रखूंगी और वकील बनने के अपने लक्ष्य को हासिल करूंगी.”

हाल ही में अख्तर इम्तहान देकर खाली हुई हैं. चूंकि अभी वो लिख नहीं सकती थीं, इसलिए वो बोलती थीं और उनकी बहन उसे लिखती थी. अख्तर के कॉलेज ने इसके लिए उन्हें बीस मिनट का अतिरिक्त समय दिया था.

क्रूरता

अख्तर ने बताया कि उनके पति रफीकुल इस्लाम संयुक्त अरब अमीरात में नौकरी करते थे और दिसंबर में अचानक वो भारत आए.

उन्होंने बताया कि जब वो एक रिश्तेदार के घर अपने पति से मिलीं तो उन्होंने उसकी आँखों और मुँह पर पट्टी बाँध दी और मांस काटने वाले एक औजार से उसकी अँगुलियांकाट दीं.

अँगुलयां दोबारा नहीं जोड़ी जा सकीं क्योंकि जब तक उन्हें कूड़ेदान में से ढ़ूँढ़ा गया तब तक काफी देर हो चुकी थी.

अख्तर के मुताबिक, उनके पति कम पढ़े हुए थे और इसीलिए उनका उच्च अध्ययन के लिए कॉलेज में नाम लिखाना उन्हें अच्छा नहीं लगा.

अख्तर के पति इस्लाम फिलहाल हिरासत में हैं.

हालांकि बांग्लादेश में घरेलू हिंसा काफी प्रचलित है, लेकिन खासकर इस घटना की क्रूरता ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया और देश भर में अख्तर के प्रति लोगों में सहानुभूति जग गई.

Image caption अख्तर के परिवार ने उन्हें काफी सम्बल दिया

लेकिन अख्तर ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने बाँए हाथ से लिखने का अभ्यास शुरू कर दिया.

कुछ महीनों के बाद वो बाँए हाथ से ही लिखने में काफी अभ्य़स्त हो गईं.

उनके हाथ के घाव तो ठीक हो गए, लेकिन उनकी अँगुलयां नहीं ठीक हो सकीं.

सीख

निश्चित रूप से उनकी ये विकलांगता उनकी पढ़ाई में आड़े नहीं आई और उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी.

इसे वो पेंसिल से कुछ लिखकर साबित भी करती हैं. उनके इस अभियान में कोई रुकावट बाधा नहीं बनने पाई.

अख्तर कहती हैं, “मेरी अँगुलियों के कटने के तीन दिन बाद ही मुझे इम्तहान की फीस भरनी थी. इसलिए मेरे माता-पिता ने मुझसे इस बार परीक्षा मे न बैठने के लिए कहा. पर मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी.”

उन्होंने कहा कि अब वो वापस अपने पति के पास नहीं जाना चाहतीं और सब कुछ ठीक हो जाने के बाद उनसे तलाक ले लेंगी.

इस घटना से अख्तर का परिवार काफी परेशानी में पड़ गया है. उनकी माँ मुसम्मत परवीन कहती हैं कि हमारी मदद के लिए तमाम आश्वासनों के बावजूद हमें अभी तक कुछ नहीं मिला, “हम चाहते हैं कि हमारी बेटी पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो. हम उसके सपनों को पूरा करने के लिए जितना कर सकते हैं, करेंगे. मुझे लगता है कि दुनिया के सामने हमारी बेटी एक नजीर होगी.”

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों और लोगों का कहना है कि अख्तर के साथ हुई क्रूरता से ये बात साबित हो जाती है कि बांग्लादेश में किस तरह से महिलाएं घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं.

पिछले साल जून में एक कॉलेज लेक्चरर को ऐसी ही एक हिंसा में अपनी आँख गँवानी पड़ी थी.

ओधिकार समूह की रिपोर्ट बताती है कि साल 2011 में देश में महिलाओं के प्रति हिंसा में काफी बढ़ोत्तरी हुई है.

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक साल में करीब तीन सौ महिलाएं दहेज की बलि चढ़ गईं.

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