भारतीय रेस्तराँ में ब्रितानी शेफ रखने की मजबूरी

  • 12 मई 2012
ब्रिटेन में भारतीय रेस्तराँ इमेज कॉपीरइट Getty
Image caption ब्रिटेन में भारतीय रेस्तराँओं में आम तौर पर भारतीय शेफ़ ही खाना पकाते हैं

ब्रिटेन में कड़े इमिग्रेशन यानी आव्रजन नियमों के चलते भारतीय रेस्तराँओं को भारतीय खाना बनाने वालों की कमी का सामना करना पड़ रहा है.

इससे निबटने का सरकारी सुझाव है एशियाई खानपान में ब्रितानी लोगों को प्रशिक्षित करने वाले 'करी कॉलेजों' से पास होकर निकले लोगों को इन रेस्तराँओं के किचन में जगह देने का.

मध्य लंदन का एक जाना-माना भारतीय रेस्तराँ है इमली. वहाँ तंदूर में नान लगाते दिख रहे हैं 18 साल के फ्लॉयड प्राइस. उनकी उंगलियाँ उतनी कुशलता से तो नहीं चल रहीं जैसी उनके भारतीय साथियों की चलती हैं मगर फ्लॉयड उस रास्ते पर बढ़ जरूर रहे हैं.

और ब्रितानी सरकार के लिए फ्लॉयड भविष्य के लिए एक आदर्श की तरह हैं- एशियाई किचन में ब्रितानी शेफ़.

फ्लॉयड कहते हैं, "पहले मैं दूसरी तरह का खाना बनाना सीखना चाहता था मगर जब मैं भारतीय किचन में पहुँचा तो मुझे लगा कि मुझे ये खाना और उसे बनाने का तरीका ज्यादा पसंद है. अब जबकि लोगों को भारतीय खाना इतना पसंद आ रहा है मेरे विचार से ये सही समय है कि हम खुद ही ये खाना बनाना सीखें."

वैसे अब फ्लॉयड को काम की कोई कमी होना मुश्किल ही है. ब्रिटेन के हर पाँच में से एक रेस्तराँ एशियाई या ओरियंटल खाना परोसता है. नवंबर 2011 के बाद से इन रेस्तराँ तो कड़े आव्रजन नियमों के चलते मुश्किलों का सामना करना पड़ा है और बाहर से वे शेफ़ नहीं ला पा रहे हैं.

हुनर

इन नियमों के अनुसार ऐसे पद ही विदेशों से भरे जा सकेंगे जिनका हर साल 28 हज़ार पाउंड या उससे ज्यादा का वेतन हो. साथ ही उन्हें पाँच साल का अनुभव भी होना चाहिए.

रेस्तराँ मैनेजर गुलु आनंद के लिए इस नियम के मायने ये हैं कि वे उस तरह के लोग नहीं नियुक्त कर सकते जिनकी उन्हें ज्यादा जरूरत है. वह कहते हैं, "हमें एक्जेक्यूटिव हेड शेफ नहीं चाहिए, हमें ऐसे शेफ चाहिए जो किचन में खाना बनाए. हमारे पास मैनेजर तो पहले से हैं मगर हमें ऐसे लोग चाहिए जिनके पास खाना पकाने का हुनर है."

टैमेरिंड ग्रुप के प्रमुख राजेश सूरी भी मानते हैं कि इमिग्रेशन नियमों से उनके उद्योग को काफी गहरी चोट लगी है, "आपके आस-पास के छोटे रेस्तराँ को सबसे ज्यादा झटका लगेगा. वे बंद हो रहे हैं क्योंकि उन्हें मन मुताबिक लोग नहीं मिल पा रहे हैं."

बेरोजगार लोगों को एशियाई खान पान सिखाने के लिए इंग्लैंड में पाँच केंद्र खोले जा रहे हैं और हॉस्पिटैलिटी गिल्ड की कार्यकारी निदेशक सूजी जैकसन मानती हैं कि रेस्तराँओं के पास इसके बाद इन कॉलेजों से लोगों को लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा.

वेस्ट लंदन विश्वविद्यालय ने हाल ही में एक नियुक्ति कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें लंदन के एशियाई रेस्तराँ के स्टॉल लगे थे. उसमें लेक्चर दिया शेफ़ दीपा आनंद ने.

चुनौती

वह कहती हैं, "जिन लोगों की भारतीय खान-पान की पृष्ठभूमि नहीं है उन्हें ये सिखाना एक चुनौती होगी. हमें बिल्कुल शुरुआत से हर चीज बतानी होगी. ऐसा नहीं है कि ये हो नहीं सकता मगर हाँ इसमें समय लगेगा."

आनंद के अनुसार, "जब हम विदेश से शेफ़ ला पाते थे तो वे आते थे और काम शुरू कर देते थे. उन्हें मसालों के बारे में या खाना पकाने के तरीकों के बारे में पता होता था क्योंकि वे या उनके माँ-बाप भारतीय होते थे."

राजेश सूरी कहते हैं कि उनके टैमेरिंड ग्रुप को अच्छे शेफ़ नहीं मिल पा रहे हैं, "आप रातों-रात ये पद नहीं भर सकते- प्रशिक्षण में तीन से चार साल तक लग जाते हैं."

वह कहते हैं कि ब्रितानी सरकार की नीतियों के तहत जो लोग आ रहे हैं उनके काम की गुणवत्ता से भी वह संतुष्ट नहीं हैं. मगर इन सबके बावजूद उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है और उन्हें फ्लॉयड प्रिंस जैसे ऐसे प्रशिक्षुओं का भरोसा है जो कड़ी मेहनत से ये कला सीखना चाहते हैं.

प्रिंस को वैसे 18 महीने हो चुके हैं मगर अब भी उन्हें करी यानी तरी वाला खाना बनाने की इजाजत नहीं है. वह कहते हैं, "मैं जल्दी ही करी सेक्शन में जाउँगा. यहाँ ज्यादा घंटे काम करना पड़ता है, मेरे दोस्त और मेरा परिवार इस बात से कोई खुश नहीं है कि मुझे इतना काम करना पड़ रहा है मगर वे इस बात से खुश हैं कि मुझे इतना कुछ सीखने को मिल रहा है."

प्रिंस कहते हैं कि ये मेहनत और इतना समय लगाने का उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है और साथ ही इस जगह पर उन्हें बाहरी की तरह भी नहीं देखा जाता.

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