'रोटी नहीं तो चोरी सही'

नीदरलैंड
Image caption नीदरलैंड में लोग अपनी परेशानियों के लिए आर्थिक संकट को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं

महीनों से चल रहे आर्थिक संकट के दौरान ऐसा लगा कि नीदरलैंड की अर्थव्यवस्था पर इसका ज़्यादा असर नहीं पड़ा है. ऐसे वक्त जब पड़ोसी देशों की क्रेडिट रेटिंग गिर रही थीं, नीदरलैंड की ट्रिपल ए रेटिंग बरकरार रही, लेकिन अब शायद नीदरलैंड भी आर्थिक संकट से अछूता नहीं रहा है.

ऐसे वक्त जब नीदरलैंड की सरकार दूसरे दौर की आर्थिक कटौतियों को लागू करने वाली है, हालात और खराब होने के आसार हैं और लोगों पर इसका असर पड़ना लाज़मी है.

राजधानी एम्स्टरडम के बाहरी इलाके में स्थित एक घर में 32 वर्षीय डेनिस डल्सिच एक स्टोव पर खाना बना रही हैं.

वो बच्चों की मनोरोग विशेषज्ञ हैं, लेकिन हाल की सरकारी कटौती के बाद उन्हें काम ढूँढने में दिक्कत हो रही है.

उनके किचन से खाने की भीनी-भीनी खुशबू आ रही है. वो कहती हैं कि खाना बनाना उनका जुनून है, लेकिन वो अपने बनाए खाने से ही अपना गुज़ारा भी करती हैं.

खुद खाना खाने के बाद वो बचा हुए खाना बेच देती हैं.

वो कहती हैं, “अभी मैं अपने बनाए खाने पर निर्भर हूँ. मैं इसी से पैसा कमाने को मजबूर हूँ. मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है.”

वो अपनी परेशानियों के लिए आर्थिक संकट को जिम्मेदार ठहराती हैं.

डेनिस कहती हैं, “अगर मैं खुद को देखूँ तो चीज़ें बहुत बदल गई हैं. अच्छी पढ़ाई के बावजूद भी आपको नौकरी मिलना मुश्किल हो गया है. आर्थिक संकट के कारण लोग डरे हुए हैं. मेरे लिए हर महीने घर का किराया देना भी मुश्किल होता है क्योंकि ये इतना ज़्यादा है.”

खाद्यघर के बाहर कतारें

Image caption पेट्रा का कहना है कि उन्हें अपने खाद्य बिल के लिए धन जुटाने में संघर्ष करना पड़ता है

एम्सटरडम के सबसे व्यस्त खाद्यघर के बाहर लोगों की लंबी कतारें लगी थीं जहाँ लोग मुफ्त खाद्य सामान इकट्ठा कर रहे थे.

पेत्रा भी इन्हीं में से एक हैं.

ये पूछने पर कि अगर खाद्यघर नहीं होता तो वो क्या करतीं, पेत्रा कहती हैं, “मुझे चोरी करनी पड़ती. अगर मैं ऐसा नहीं करूँ तो मुझे खाना नहीं मिलेगा.”

वो कहती हैं कि नीदरलैंड में बहुत गरीबी है लेकिन वो छिपी हुई है और उसके बारे में किसी को पता नहीं है.

नीदरलैंड में 60,000 से ज्यादा लोगों को इन खाद्यघरों से मुफ्त आहार मिलता है क्योंकि उनकी आमदनी कम है.

ऐसे लोगों की संख्या में पिछले दिसंबर से हर महीने 10 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है.

यहाँ काम करने वाले पीट कहते हैं कि इस बढ़ोत्तरी का कारण आर्थिक संकट है.

आर्थिक संकट के कारण बेरोज़गारी दर छह प्रतिशत तक पहुँच गई है जो पिछले छह साल में सबसे ज्यादा है.

यहाँ हर छह में से एक घर में लोग आधारभूत खुराक़ का इंतज़ाम कर पाने में संघर्ष कर रहे हैं.

उधर एम्स्टरडम के आधुनिक बासिस बार में भोजन करने वालों पर आर्थिक संकट का असर नहीं दिख रहा है. यहाँ लोगों को अपना खाना लाने की इजाज़त है ताकि वो रेस्टरा के महंगे खर्चे से बच सकें.

यहाँ माइक्रोवेव में मोज़रेला और रॉकेट पिज्जा पक रहा है.

रेस्तराँ मालिक मिखिल बताते हैं कि अगर आप सस्ते में होटल का खाना खाना चाहें तो आप ये कर सकते हैं.

वो कहते हैं, “लोग अपने घरों से सस्ता सूप बनाकर लाए हैं. साथ ही अगर वो यहाँ रखे अवन का इस्तेमाल करना चाहें, तो वो कर सकते हैं. इस तरह आप बेहद कम खर्चे में दोस्तों के साथ खाना खा सकते हैं. बर्तन का इंतज़ाम हम करते हैं.”

वहीं रेस्तराँ में बैठी एक ग्राहक का कहना था, “मैं एक सुपमार्केट से सलाद लेकर आई और यहाँ खाया. मैने पाँच यूरो खर्च किए. इस तरह मैने करीब दस यूरो बचाए.”

उधर खाद्यघर में खाना खत्म हो चुका है लेकिन लोगों की भीड़ कम नहीं हुई है.

सरकार अपने खर्चों में नौ बिलियन यूरो की कमी करने की कोशिश कर रही है, इसलिए ये कतारें कम होने वाली नहीं हैं.

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