मूल निवासियों के लुप्त होने का खतरा

संयुक्त राष्ट्र की एक उच्च अधिकारी ने विश्व भर के मूल निवासियों के खिलाफ़ भेदभाव की कड़ी निंदा की है और उनके लुप्त होने के खतरे पर गहरी चिंता जताई है.

मूल निवासियों के हालात पर एक वार्षिक सम्मेलन चल रहा है. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव आशा रोज़ मिगिरो ने कहा कि कई वर्षों से मूल निवासियों के अधिकारों पर काम हो रहा है लेकिन उनकी स्थिति दयनीय बनी हुई है.

उनका कहना था,“मूल निवासियों के खिलाफ़ भेदभाव, उनको सताया जाना, उन्हें विस्थापित करना औऱ उनके लुप्त होने के बारे में जानने के लिए हमें खोजना नहीं पड़ता है. बहुत से ऐसे मूल निवासी समुदाय हैं जिन्हें साफ़ पीने का पानी तक नहीं मिलता, जिनके बच्चे भूखे रह जाते हैं, जिनकी महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है और उनके गुनहगारों को सज़ा तक नहीं मिलती.”

पर्मानेंट फ़ोरम ऑफ़ इंडीजिनस पीपल्स नामक इस सम्मेलन के 11वें सत्र में विश्व भर के विभिन्न देशों से करीब 2000 मूल निवासी लोग शामिल हुए हैं.

संयुक्त राष्ट्र में 2007 में मूल निवासियों के अधिकारों संबंधित प्रस्ताव के पारित होने के बाद भी आजतक बहुत से देशों की सरकारों ने अधिकतर अहम प्रस्तावों को लागू ही नहीं किया है.

इन प्रस्तावों में मूल निवासियों की ज़मीन और उनकी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षण देने के साथ साथ उनके अधिकारों की सुरक्षा करने के प्रस्ताव शामिल हैं.

इसी महीने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद के विशेष जांचकर्ता जेम्स अनाया ने कहा था कि अमरीका के मूल निवासियों या 'नेटिव अमेरिकन्स' के खिलाफ़ व्यवस्थित भेदभाव किए जाने के सुबूत मिले हैं.

वे दुनिया भर में कबाईली और मूल निवासी लोगों के अधिकारों के बारे में जांच करने का काम करते हैं.

अमरीका ने भी 2010 में संयुक्त राष्ट्र में मूल निवासी लोगों के अधिकारों संबंधी प्रस्तावों वाले दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे.

इस साल भी अमरीका से कई कबीले के लोग इस सम्मेलन में शामिल हैं. बहुत से मूल निवासी सरकार से बेहद नाराज़ हैं. उनका कहना है कि बरसों पहले जो समझौते और वादे किए गए थे, उन पर आज तक अमल नहीं हुआ.

वादे नही हुए पूरे

सम्मेलन में न्यूयॉर्क इलाक के ओनोंडागा कबीले के सोनी मानोस ने कहा कि अमरीकी सरकार उनकी सुरक्षा नहीं करती है.

मानोस कहते हैं, “अमरीका ने जब हमारे साथ संधि पर हस्ताक्षर किए थे तब उसने हमारी और हमारे अधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया था. लेकिन अमरीकी सरकार ने राज्यों को उन संधियों का उल्लंघन करने की छूट दे दी जिससे हमारा शोषण हो रहा है.”

वह कहते हैं कि अब उनके कबीले में भी अमरीकी सरकार द्वारा छांटे गए लोगों को ही नेता बनाया जाता है.

कैलीफ़ोर्निया से आई एक मूल निवासी विनिमम विंटू कबीले की मुखिया कैलीन सिस्क कहती हैं कि कई वर्षों तक उनके कबीले के लोगों का नरसंहार हुआ और उनकी अधिकतर ज़मीन उनसे छीन ली गई है. अब भी उनका कबीला लुप्त होने से बचने की जद्दोजेहद में लगा है.

कैलीन सिस्क कहती हैं, “ज़मीन हमारे लिए बहुत अहमियत रखती है. हमारा अस्तित्व ही उससे जुड़ा होता है. हमारी ज़मीने अमरीकी सरकार ने हथिया ली हैं जिससे हमें अपने कबाईली परंपरा के अनुसार सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों को करने में भी रूकावट आती है. और अगली नस्ल को अपनी परंपराओं के बारे में सीखाने में भी मुश्किल होती है.”

सिस्क बताती हैं कि कुछ कबीलों को तो अमरीकी सरकार ने कबाईली होने की मान्यता देने से ही इंकार कर दिया है.

दो हफ़्ते चलने वाले इस सम्मेलन में उत्तरी अमरीका, अफ़्रीका, एशिया के देशों के अलावा न्यू ज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया समेत लातीनी अमरीका के भी कई देशों से मूल निवासी लोग शामिल हुए हैं.