मिस्र चुनावों में महिलाओं की भूमिका

  • 24 मई 2012
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मिस्र में होस्नी मुबारक को सत्ता से हटाए जाने के 15 महीने बाद पहला निष्पक्ष राष्ट्रपति चुनाव हो रहा है.

वास्तविकता में देखा जाए तो ये मिस्र के इतिहास का पहला ऐसा चुनाव है जिसमें जो सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक है.

लेकिन इन चुनावों में भी एक बात तय है कि अगला राष्ट्रपति चाहे जो भी बने, पर वो महिला नही होगी.

क्योंकि मत पत्र में किसी भी महिला का नाम नही है.

इसका मतलब ये भी है कि इन राष्ट्रपति चुनावों में महिलाएं कहीं पीछे छूट गई है.

पर इन महिलाओं ने मिस्र की क्रांति में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था. लेकिन देखने वाली बात ये है कि इन महिलाओं का वोट किस उम्मीदवार को पड़ता है.

ये वो आवाजें हैं जो कि चुनावों के दौरान सुनाई नही पड़ीं.

महिलाएं अपनी बातों को,अपने मुद्दों को बेहद मजबूती से उठा रही हैं

महिला वोटरों को खींचने की कोशिश

राष्ट्रपति पद की दौड़ में अब्दुल मोनिम अब्दुल फोतुह भी शामिल हैं . वो उदारवादी इस्लामी उम्मीदवार के तौर पर जाने जाते हैं. अपने चुनाव प्रचार के दौरान वो विशेष रुप से महिलाओं को अपने पक्ष मे रिझाने की कोशिश करते हैं.

अब्दुल मोनिम अब्दुल फोतुह की वरिष्ठ राजनीतिक सलाहकार भी एक महिला रबब अल-माहिदी हैं.

रबब अल-माहिदी का कहना है कि वो अब्दुल मोनिम अब्दुल फोतुह को अच्छी तरह से जानती हैं. वो ऐसा कुछ भी नही होंने देंगे जिससे मिस्र में महिलाओं की स्थिति खराब हो. उनके विचार क्रांतिकारी हैं वो उदारवादी हैं.

लेकिन, अब्दुल मोनिम अब्दुल फोतुह ही एक मात्र उम्मीदवार नही हैं जो महिला मतदाताओं के पीछे हैं, पूर्व प्रधानमंत्री अहमद शफीक ने भी वादा किया है कि वो उपराष्ट्रपति किसी महिला को ही बनाएंगे.

चुनाव समीक्षक मैग्यूड ओस्मान का कहना है कि इन चुनावों में महिला वोटरों की भूमिका बडी़ महत्वपूर्ण हो सकती है.

ओस्मान कहते हैं कि चुनावों में हमने देखा है कि ऐसी महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से कहीं ज्यादा है जिन्होंने अब तक ये फैसला नही किया है कि वो अपना वोट किसे देंगी. ये एक महत्वपूर्ण पहलू है.

महिलाओं के नजरिए से अगर देखा जाए तो क्रांति के बाद पहली संसद उनके लिए बेहद निराशा जनक रही.

सिर्फ नौं महिलाएं ही चुनी गईं और दो महिलाओं को नामांकित किया गया.

उसी समय से, सदन की शोर भरी बहसों में तमाम पुरुष सांसदों की कोशिश होती रही कि महिलाओं और ज्यादा अधिकार न दिए जाएं.

नेताओं की मानसिकता

महिला अधिकारों के लिए अभियान चलाने वाली नेहाद अबुल कोमसम का कहना है कि लोग तो बदल रहे हैं, लेकिन नेताओं की मानसिकता नही.

वो कहती हैं कि राजनेता और नीति निर्माता अभी भी पहले की तरह ही महिलाओं के बारे में सोचते हैं और वैसा ही बर्ताव करते हैं जैसा क्रांति से पहले वो किया करते थे. हमें उनकी मानसिकता बदलनी होगी, वो महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वो नागरिक ही न हों.

सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या ये महिलाएं उसी परंपरागत तरीके से अपने पति के साथ वोट देती रहेंगी या फिर वो इस दायरे को तोड़कर अपनी इच्छा से वोट दे पाएंगी.

मुबारक के जाने के बाद फरवरी 2011 में सुप्रीम काउंसिल ऑफ आर्मिल फोर्सिस यानी सैन्य परिषद ने सत्ता अपने हाथ में ले ली थी. परिषद ने कहा है कि निष्पक्ष चुनाव होगा जिसके बाद सेना हट जाएगी.

अगर इस चुनाव में कोई विजेता बन कर नहीं उभरता है तो 16 और 17 जून को दूसरे चरण का चुनाव होगा और इसमें महिला की भूमिका महत्वपूर्ण होगी.

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