ज्यादा समय तक बेरोजगार रहते हैं अमरीकी एशियाई

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Image caption अमरीका में बेरोजगारी आने वाले राष्ट्रपति चुनावों में एक बड़ा मुद्दा है.

अमरीका में लंबे समय तक बेरोजगार रहने वालों में एशियाई मूल के लोगों का पहला नंबर है.

एक नए अधय्यन के मुताबिक सबसे अधिक शिक्षित समुदाय माने जाने वाले एशियाई मूल के लोगों में लंबे समय तक बेरोजगार रहने की दर भी अधिक है.

वैसे एशियाई मूल के अमरीकियों में बेरोजगारी की दर 7.1 प्रतिशत है, जो अमरीका में बेरोजगारी की दर 8.2 प्रतिशत की दर से कम है, लेकिन अन्य अमरीकियों के मुकाबले एशियाई मूल के लोगों में लंबे समय तक बेरोजगारी रहती है.

वॉशिंगटन के इकॉनमिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के अध्ययन के अनुसार 2011 में एशियाई मूल के बेरोजगार लोगों में से 50 प्रतिशत से अधिक लोग 6 महीने या उससे अधिक समय तक बेरोजगार रहे.

वहीं श्वेत अमरीकियों में लंबे समय तक बेरोजगार रहने वालों की दर 42.4 प्रतिशत रही. अश्वेत लोगों में बेरोजगारी दर 49.9 प्रतिशत और लातिनी लोगों में 39.8 प्रतिशत रही.

बेरोजगारी के कारण

मैसाच्युसेट्स विश्विद्यालय की प्रोफेसर मार्लीन किम के इस अध्ययन के अनुसार 2011 में एशियाई मूल के लोगों में स्नातक या उससे उच्च डिग्री रखने वाले 6.4 प्रतिशत लोगों के पास नौकरी नहीं थी जबकि ऐसे श्वेत अमरीकियों में बेरोजगारी की दर 4.3 प्रतिशत थी.

इन एशियाई लोगों में भारतीय मूल के लोगों के अलावा चीनी, जापानी और कोरियाई लोग भी शामिल हैं.

प्रोफेसर मार्लीन किम कहती हैं कि एशियाई मूल के लोगों में अधिक समय तक बेरोजगार रहने के कई कारण हो सकते हैं.

इन लोगों में से एक तिहाई कैलिफोर्निया में रहते हैं जहां 10.9 प्रतिशत बेरोज़गारी है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है.

प्रोफेसर किम कहती हैं कि अमरीका में पैदा न होने वाले कुछ एशियाई लोगों की अच्छी अंग्रेजी नहीं आती. इसलिए उन्हें नौकरी मिलने में मुश्किल हो सकती है या फिर नस्लीय भेदभाव भी बेरोजगारी का एक कारण हो सकता है.

प्रोफेसर किम कहती हैं, “एशियाई मूल के शिक्षित लोगों के साथ नस्लीय आधार पर भेदभाव के भी सबूत मिले हैं. उनके खिलाफ भेदभाव इसलिए होता है क्योंकि वो अमरीका में नहीं पैदा हुए और उन्हें अच्छी अंग्रेजी नहीं आती, जबकि कंपनियों को अमरीका में पैदा होने वाले और अच्छी अंग्रेजी जानने वाले लोग आसानी से मिल जाते हैं.”

पसंद की नौकरी की ख्वाहिश

इससे पहले 2010 में 48.7 प्रतिशत एशियाई मूल के लोग लंबे समय तक बेरोजगार थे.

अन्य अमरीकियों के मुकाबले अधिक शिक्षित एशियाई मूल के लोगों में आमतौर पर उनकी उच्च शिक्षा के कारण ही लंबे समय तक बेरोजगार रहने की दर भी अधिक होती है.

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Image caption कई बार नस्लीय आधार पर भेदभाव भी बेरोजगारी का कारण बनता है.

पार्था देब न्यूयॉर्क के हंटर कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं. वो कहते हैं कि बहुत से भारतीय मूल के पेशेवर लोग भी लंबे समय तक बेरोजगारों में शामिल किए जाते हैं क्योंकि वे अच्छी नौकरी ही करना चाहते हैं, और अच्छी नौकरी मिलने में समय भी लग सकता है.

पार्था देब कहते हैं, “अमरीका के वित्तीय और सॉफ्टवेयर तकनीकी क्षेत्र में बहुत से भारतीय मूल के लोग भी काम करते हैं और वे आम तौर पर अन्य अमरीकियों से अधिक शिक्षित होते हैं. इसलिए जब उनकी नौकरियां चली जाती हैं, तो वे जल्दबाजी में कोई भी नौकरी करने के लिए तैयार नहीं होते और अधिक समय तक रूक कर पहले जैसी ही नौकरी खोजते हैं.”

पार्था देब कहते हैं कि भारतीय मूल के लोग और उनकी तरह अन्य शिक्षित एशियाई मूल के अमरीकी लोग भी इसलिए अच्छी नौकरी फिर से हासिल करने के लिए इंतजार कर पाते हैं क्योंकि उनके घर में दूसरा कमाने वाला भी होता है और उनके पास कुछ जमा पूंजी भी होती है.

लेकिन कुछ ऐसे भी भारतीय मूल के लोग हैं जो अपने चुने हुए क्षेत्र में नौकरी नहीं ढूंढ पाए हैं.

आउटसोर्सिंग की मार

भारतीय मूल की अमरीकी सोना शाह एक मेकेनिकल इंजीनियर हैं जिन्हें तीन साल से अधिक समय से अपनी पसंद की नौकरी नहीं मिली है.

सोना शाह कहती हैं, “मेरी कंपनी बंद हो गई और सारी नौकरियां फ्रांस और भारत भेज दी गईं. फिर मैंने अपने पसंद की नौकरी ही ढूंढने का फैसला किया और अब भी ढूंढ रही हूं, लेकिन मुझे कामयाबी नहीं मिली है. मैं अपने काम को पसंद करती हूं और मैं अपने काम में अच्छी भी हूं, लेकिन पसंद की नौकरी नहीं मिल रही है.”

सोना शाह कहती हैं कि उन्हें कई नौकरियों की पेशकश हुई लेकिन वो उनकी ट्रेनिंग और उनकी पढ़ाई से मेल नहीं खातीं इसलिए उन्होंने कई सालों से बेरोजगार रहना गवारा समझा.

सोना के पति श्वेत अमरीकी हैं और उन्हीं की तरह इंजीनियर हैं और उनको बेरोजगारी के बाद जल्दी नौकरी मिल गई.

सोना कहती हैं कि उनके पति की तो नौकरी है इसलिए उन पर अपनी पसंद के क्षेत्र में नौकरी ढ़ूंढने के लिए दबाव नहीं पड़ा, लेकिन फिर भी वो कहती हैं कि उनके लिए ये आसान नहीं है.

और अब वो अन्य क्षेत्रों में हाथ आजमाने की भी सोच रही हैं.

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