दफन हो गई स्टालिन की महत्वाकांक्षी परियोजना

  • 8 जून 2012
ल्युदमिला लीपातोवा
Image caption ल्युदमिला लीपातोवा ने इस परियोजना के बारे में काफी अध्ययन किया है.

बर्फ हमारी कमर तक आ पहुंची थी और बर्फीली हवा हमारे चेहरे को डस रही थी, लेकिन 70 साल की उम्र को पार कर चुकी एक महिला ल्युदमिला लीपातोवा इस सब से बेहपरवाह थी और उन्होंने मुझे भी एक बेचला थमा दिया.

उन्होंने कहा, “यही जगह है. यहां हमें खुदाई करनी है.”

कुछ देर के बाद मेरा बेचला किसी धातु से टकराया. हमने वहां से बर्फ को हटाया और जंग लगी रेल की पटरियों की जांच पड़ताल करने लगे. पटरी के एक हिस्से की तरफ मैने कुछ लिखा देखा: जेडआईएस और उसके बाद लिखा था जावोद इमेनी स्तालिना, फैक्ट्री, जिसका नाम जोसेफ स्टालिन के नाम पर रखा गया.

उत्तरी ध्रुव पर आर्कटिक के रूसी क्षेत्र में बर्फ के नीचे एक अधूरी रेलवे लाइन दफन है जिसे रूसी कम्युनिस्ट शासक स्टालिन के दौर में हजारों कैदियों ने बनाया था. बेकार पड़ी इस रेलवे लाइन के अब पुनरुद्धार की भी बात हो रही है.

हम लोग सालेखार्द के बाहरी इलाके में थे जो यमल नेनेत्स स्वायत्त क्षेत्र की राजधानी है.1595 में बसाया गया ये शहर फिनलैंड के रोवानिएमी के बाद आर्कटिक वृत्त के आसपास स्थित दुनिया का इकलौता शहर है.

इस शहर के संग्रहालय में 10 हजार साल पुरानी एक शिशु हथनी का शव भी है जिसे ल्युबा कहा जाता है. 2007 में जब वो मिली तो दुनिया भर के मीडिया में उसने सुर्खियां बटोरीं.

महत्वाकांक्षी योजना

लेकिन सालेखार्द एक अन्य कारण के लिए बदनाम है. ये कारण है उसका गुलाग अतीत. गुलाग सोवियत दौर में जबरन श्रम शिविरों की निगरानी करने वाली एजेंसी थी.

ल्युदमिला और मैंने स्टालिन की सबसे क्रूर और सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक ट्रांस-पोलर मैनलाइन को खोज निकाला.

यह आर्कटिक को जीतने की उनकी कोशिश थी जिसके तहत 1,609 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन के जरिए साइबेरिया के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ना था.

Image caption इस रेल मार्ग को बनाने में हजारों राजनीतिक कैदियों को लगाया गया था.

पश्चिमी हिस्से में इस परियोजना का काम 1940 के दशक के शुरुआत में शुरू हो गया लेकिन सालेखार्द में निर्माण कार्य दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ही आरंभ हुआ.

इस परियोजना के लिए काम पर लगाए लगभग सभी मजदूर 'लोगों के दुश्मन' थे यानी वे कैदी जिन्हें राजनीतिक 'अपराधों' का दोषी करार दिया गया था.

गुलाग 501 और 503 को विशेष तौर पर इस रेलवे परियोजना के लिए तैयार किया गया और रेलवे पटरी के हर 6 से 8 मील पर उसके शिविर थे.

बर्बर उत्पीड़न

ल्युदमिला ने कहा, “आपको लगता है कि ये सर्दी का मौसम है जबकि ये तो बसंत है. सर्दियों में यहां तापमान शून्य से 50 डिग्री नीचे तक जा सकता है. जरा सोचिए उस हालात में कोई कैसे काम करता होगा और गर्मियों में अत्यधिक गर्मी और मच्छर.”

कई सुरक्षाकर्मी कीटों के जरिए लोगों के सजा दिया करते थे.वे कैदियों को नंगा करके मच्छरों के लिए छोड़ देते थे और ये किसी भी तरह के उत्पीड़न से बुरा होता था.

ल्युदमिला बताती हैं कि एक युवक को राजनीतिक रूप से गलत कविता लिखने के लिए इस रेल परियोजना के काम में लगा दिया गया और जब उसने जेल से भागने वाले कुछ राजनीतिक कैदियों के नाम बताने से इनकार कर दिया तो उसे नंगा करके इसी तरह मच्छरों के लिए छोड़ दिया गया.

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Image caption स्टालिन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को 1953 में उनकी मौत के बाद बंद कर दिया गया.

नादेजदा कुकुशिना यूक्रेन में सरकारी कार्यालय में किताबों की देखरेख करती थीं. जब चूहों ने कुछ नोटों को कुतर दिया तो उन्हें गबन का आरोपी ठहरा कर रेलवे परियोजना के काम में लगा दिया.

कुछ अनुमानों के मुताबिक तीन लाख कैदियों को गुलामों की तरह इस परियोजना पर लगाया गया था जिनमें से एक तिहाई की मौत हो गई.

लेकिन ल्युदमिला का कहना है कि शिविरों में मारे गए लोगों और कैदियों की असल संख्या के बारे में कोई जानकारी नहीं है क्योंकि कोई स्पष्ट रिकॉर्ड दर्ज नहीं किए गए.

क्या परियोजना का पुनरुद्धार होगा

1953 में स्टालिन के मरने तक लगभग 600 किलोमीटर लंबी ही रेलवे लाइन बन पाई लेकिन बाद में इस परियोजना को कभी पूरी नहीं किया गया. शीत युद्ध के दौरान सोवियत नेता निकिता ख्रुशेव ने इस परियोजा को को गृह मंत्रालय से परिवहन मंत्रालय को सौंप दिया जिसके पास इस परियोजना के लिए धन और मजदूरों की कमी रही.

इतने सारे लोगों की मौत और भारी धन खर्चने के बावजूद ये रेलवे लाइन ठप हो गई. लोगों ने इसके बारे में बात करना भी बंद कर दिया.

लेकिन ल्युदमिला ने हाल में इसके कुछ हिस्सों को खोदना शुरू किया. वो कहती हैं, “बेशक गुलाम बनाए गए मजदूरों के जरिए रेलवे परियोजना का निर्माण सही नहीं था. लेकिन एक बार ये शुरू हो गई और इसके कारण इतने सारे लोगों की मौतें भी हुई, तो इस परियोजना को छोड़ देना भी एक अपराध है.”

लेकिन अब रूस के उत्तरी हिस्से में ऊर्जा के भंडार मिल रहे हैं और इसीलिए आर्कटिक का विस्तार रूसी सरकार की प्राथमिकताओं मे शामिल है. सालेखार्द को सड़क के जरिए नोवी उरेंगोई और बाकी रूस से जोड़ने की परियोजनाओं पर पहले ही काम शुरू हो गया है. जिस रेलवे परियोजना को 60 साल पहले बंद कर दिया गया, अब उसे भी नया जीवन मिल सकता है.

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