बर्मा में आपातकाल के बाद भी तनाव जारी

बर्मा
Image caption राष्ट्रपति थेन सेन ने चेताया है कि सांप्रदायिक हिंसा से लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होगी.

बर्मा के पश्चिमी रखाइन राज्य में आपातकाल लागू होने के बाद भी सांप्रदायिक तनाव बना हुआ है.

इस राज्य में पिछले एक हफ्ते से बौद्ध और मुस्लिम समुदाय के बीच हिंसक झड़पों में सात लोग मारे गए और बड़े पैमाने पर संपत्ति का नुकसान हुआ है.

हिंसा की शुरुआत पिछले महीने हुई जब एक बौद्ध महिला की हत्या कर दी गई. इसके बाद एक बस पर हमला किया गया जिसमें मुसलमान यात्री सफर कर रहे थे.

इस बीच ब्रिटेन ने बर्मा के अधिकारियों और सामुदायिक नेताओं से हिंसा खत्म करने और बातचीत का रास्ता अपनाने का आग्रह किया है.

इलाके में आपातकाल

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की खबर के मुताबिक बीते शुक्रवार को रखाइन के मौंगदाउ शहर में हिंसा शुरू हुई जो बाद में राज्य की राजधानी सित्तवे और पड़ोसी गांवों तक फैल गई.

रिपोर्ट में परस्पर विरोधी बौद्ध और मुस्लिम गुटों के हवाले कहा गया है कि उन्होंने घरों को जलते हुए देखा है.

राष्ट्रपति कार्यालय के निदेशक जा ह्ताय ने कहा है, “हमने सैनिकों को आदेश दिया है कि वे सित्तवे के हमलों में निशाना बनाए गए हवाई अड्डे और रखाइन के गावों की सुरक्षा करें.”

बर्मा के राष्ट्रपति थेन सेन ने रविवार को रखाइन में आपातकाल घोषित कर दिया.

कानून-व्यवस्था के हालात पर चिंता प्रकट करते हुए अधिकारियों ने पिछले दिनों चार शहरों में कर्फ्यू लागू कर दिया था.

'लोकतंत्र को खतरा'

टीवी पर प्रसारित भाषण में राष्ट्रपति थेन सेन ने कहा कि ये हिंसा देश में जारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खतरे में डाल सकती है.

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Image caption राष्ट्रपति थेन सेन ने सांप्रदायिक हिंसा को देश के लिए खतरनाक बताया है.

उन्होंने कहा, “अगर हम नस्ल और धर्म से जुड़े मुद्दों को आगे रखेंगे और अगर हम कभी नफरत को खत्म नहीं करेंगे और बदला लेने और तोड़फोड़ करने पर आमादा रहेंगे और अगर हम पलटवार करना और एक दूसरे को डराने धमकाना जारी रखेंगे तो इस बात का खतरा है कि ये दिक्कतें रखाइन से परे भी जा सकती हैं.”

आगे उन्होंने कहा, “अगर ऐसा होता है, तो आम लोगों को यह बात ध्यान रखनी होगी कि देश की स्थिरता और शांति, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और विकास बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं और हम बहुत कुछ गंवा सकते हैं.”

बर्मा में 2010 में सेना के समर्थन वाली असैन्य सरकार ने सत्ता संभाली और इस साल अप्रैल में हुए उपचुनावों में विपक्षी नेता आंग सान सू ची भी संसद का हिस्सा बन गईं.

हालांकि सरकार में अब भी सेना का दबादबा है और राजनीतिक दमन और मानवाधिकारों के हनन की खबरें लगातार आती रहती हैं.

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