मिस्र में राजनीतिक अस्थिरता

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Image caption मोहम्मद मुर्सी के समर्थक तहरीर चौक पर भारी तादाद में जमा हैं

मिस्र में राष्ट्रपति पद के लिए हुए पहले स्वतंत्र चुनाव के नतीजे अभी तक घोषित नहीं किए गए हैं. गुरूवार को इसके नतीजे की घोषणा होनी थी लेकिन फिलहाल इसे टाल दिया गया है.

मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थक दावा कर रहे हैं कि उनके उम्मीदवार मोहम्मद मुर्सी राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत गए हैं.

दूसरे उम्मीदवार अहमद शफ़ीक़ ने भी अपनी हार नहीं मानी है. अहमद शफ़ीक़ पूर्व वायु सेना प्रमुख हैं और पूर्व राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के समय में वो प्रधानमंत्री के पद पर रह चुके हैं.

इस दौरान मिस्र में सत्ताधारी सैन्य परिषद द्वारा शक्तियां अपने हाथ में लेने के विरोध में काहिरा के तहरीर चौक समेत कई शहरों में विशाल प्रदर्शन जारी है.

काहिरा के तहरीर चौक पर मौजूद बीबीसी संवाददाता केविन कौनोली वहां के दृश्य को बयान करते हुए कहते हैं कि मुस्लिम ब्रदरहुड के युवा समर्थक अपने उम्मीदवार मोहम्मद मुर्सी की जीत का दावा करते हुए नारा लगा रहे हैं.

उन समर्थकों में से एक अहमद अदुल कहते हैं, ''आप जानते हैं कि सेना ने अब तक मोहम्मद मुर्सी को कोई काम करने नहीं दिया है. इसलिए हम लोग तहरीर चौक पर दोबारा जमा हुए हैं विरोध प्रदर्शन के लिए. सेना अब तक हमारे साथ खेल रही है और उसने हमें कुछ नहीं दिया है.''

सेना का रोल

लोगों का कहना है कि आने वाले दिनों में काहिरा की सड़कों पर और ज्यादा तादाद में लोग उतरेंगे और विरोध प्रदर्शन करेंगे.

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं ले रहे और सेना के काम-काज से भी संतुष्ट हैं.

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Image caption मुहम्मद मुर्सी और अहमद शफीक के बीच कांटे की टक्कर बताई जा रही है.

उन्हीं में से एक हैं वरिष्ठ राजनयिक महमूद अल-सईद.

महमूद अल-सईद का कहना है कि मिस्र में सेना का रोल धीरे-धीरे बदल रहा है.

अल-सईद कहते हैं, ''मिस्र में सेना का रोल एक ही रात में समाप्त नहीं होगा लेकिन इतना जरूर है कि पिछले 60 वर्षों में सेना का दख्ल जितना मजबूत था अब उतना नहीं होगा. नासिर, सादात और मुबारक दरअसल सैनिक शासक थे, उन्होंने केवल अपनी वर्दी उतारी थी. लेकिन अभी भी मिस्र में बहुत सारे लोगों को विश्वास है कि मिस्र की सेना एक ऐसी संस्था है जो संतुलन बनाए रखती है और मिस्र की पहचान में किसी बड़े बदलाव को रोकती है.''

मिस्र में हाल के इतिहास पर टीवी चैनलों के लिए बन रहे एक नाटक के निर्देशक खालिद अल-हाजर उम्मीद करतें हैं कि अब देश में सुरक्षा और स्थायित्व बहाल होगी लेकिन बहुत सारे दूसरे मिस्र के नागरिकों की तरह वो भी सोचने लगें हैं कि मुस्लिम ब्रदरहुड के राष्ट्रपति होने से क्या असर पड़ेगा.

ख़ालिद कहते हैं, ''मेरा ख्याल है कि वे लोग समाज को बदलने की कोशिश करेंगे. उनका केवल एक ही एजेंडा है पूरे देश को अतिवादी बनाना. उन्होंनें ये दिखा दिया है कि वो कितना रूढ़िवादी हैं. ऐसा लगता है कि वो केवल शादी या यौन क्रिया के बारे में ही सोचते रहते हैं. लोगों की आजादी पर प्रतिबंध लगाने के बदले अगर वो सही अर्थों में इस्लाम धर्म को फैलाते तो लोग उनकी ज्यादा इज्जत करते.''

हो सकता है इस सप्ताह मिस्र को एक नया राष्ट्रपति मिल जाए लेकिन अभी संसद को दोबारा बहाल करना है, संविधान लिखना है.

मिस्र में प्रजातंत्र का रास्ता अभी भी तहरीर चौक से होकर जाता है लेकिन ये रास्ता जितना किसी ने सोचा था उससे लंबा और कठिन है.

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