सोमालिया: अल-शबाब का घटता प्रभाव

  • 21 जून 2012
अल-शबाब के लड़ाके इमेज कॉपीरइट AP
Image caption अल-शबाब की सैन्य शक्ति में पिछले दिनों में काफी कमी आई है.

दक्षिणी सोमालिया के एक बड़े इलाक़े पर इस्लामी संगठन अल-शबाब का नियंत्रण है लेकिन हाल के दिनों में अल-शबाब को काफ़ी नुक़सान हुआ है.

अफ़्रीक़ी संघ की सेना के अनुसार पिछले कुछ महीनों में अल-शबाब के सैंकड़ों लड़ाके संगठन छोड़ कर भाग गए हैं.

अफ़्रीक़ी संघ की सेना सोमालिया की राजधानी मोगादिशू के आस-पास अल-शबाब से लड़ाई कर रही है. अल-शबाब को अल-कायदा का समर्थन हासिल है.

मोगादिशू में मौजूद बीबीसी संवाददाता गैब्रियल गेटहाउस ने अफ़्रीकी संघ की सेना के साथ वहां के हालात का जायजा लिया.

हिंसा के शिकार इस शहर में जिदगी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है. लगभग दो दशकों तक चलने वाले युद्ध के कारण पूरे शहर पर बहुत बुरा असर पड़ा है.

लेकिन पिछले साल यानी 2011 अगस्त में अफ़्री़की संघ की सेना ने अल-शबाब को मोगादिशू से खदेड़ दिया था और उसके बाद से अफ़्रीक़ी सेना का पलड़ा भारी है.

अफ़्रीक़ी सेना अल-शबाब पर जोरदार हमले कर रही है. सोमालिया की राष्ट्रीय सेना और अफ़्रीक़ी सेना ने पिछले महीने एक संयुक्त अभियान में अल-शबाब का एक महत्वपूर्ण गढ़ समझे जाने वाले शहर अफगोए पर क़ब्ज़ा कर लिया था.

खबरों के अनुसार अल-शबाब के कार्यकर्ता यहां पर बम बनाया करते थे.

अल-शबाब को छोड़ते लड़ाके

अफ़्रीक़ी संघ की सेना में शामिल कर्नल कयांजा मुहंगा के अनुसार अल-शबाब के बहुत सारे लड़ाके अब संगठन छोड़ रहे हैं.

24 साल के अबु खालिद ने पिछले ही सप्ताह अल-शबाब छोड़ा है.

अबु खालिद कहते हैं, ''मुझे एहसास होने लगा कि अल-शबाब से लोगों को आजादी नहीं मिलने वाली है. मुझे ये भी लगने लगा कि इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. ये लोग (अल-शबाब) केवल लड़ाई करना चाहते हैं. हमारा असल दुश्मन अल-क़ायदा है.''

कर्नल मुहंगा भी कहते हैं कि अल-शबाब पिछले दिनों कमज़ोर हुए हैं और उनके मनोबल में भी काफी कमी आई है.

कर्नल मुहंगा कहते हैं, ''पिछले 20 वर्षों से सोमालिया में शांति बहाली के प्रयास किए जा रहे हैं. इस कोशिश में अमरीकी और संयुक्त राष्ट्र दोनों ही असफल रहें हैं लेकिन इस बार बात अलग है.''

अल-शबाब समर्थक

लेकिन बावजूद इसके अल-शबाब के अभी भी ढेर सारे समर्थक हैं और इसका कारण धार्मिक नहीं है. मोगादिशू बंदरगाह पर काम कर रहे कुछ मज़दूर अभी भी अल-शबाब को पसंद करते हैं.

उनका कहना है, ''अल-शबाब के जमाने में जिंदगी ज्यादा बेहतर थी. भ्रष्टाचार कम था और लोग सुरक्षित महसुस करते थे. अगर आप राजनीति से दूर हैं तो फिर आपको कोई दिक्कत नहीं थी.''

अल-शबाब के एक समर्थक ट्रक चालक महमूद अब्दुललाही कहते हैं, ''अल-शबाब के नियंत्रण वाले इलाक़े में हर जगह बंदूकें लिए लोग नहीं दिखते हैं. अगर सरकार चरमपंथियों से हथियार छीनकर उन चौकियों को खत्म करदें जहां हमे पैसे देने पड़ते हैं तो हम भी सरकार का समर्थन करेंगे.''

अफ़्रीकी सेना को ये पता है कि सोमालिया में केवल सैन्य जीत से समस्या का समाधान नहीं होगा. बंदूक तो जैसे यहां जिंदगी का एक हिस्सा बन गई है.

अफ़्रीक़ा की समस्या अफ़्रीक़ी देश मिलकर सुलझाएं, ये नीति लाभदायक साबित हो रही है. लेकिन आखिरकार सोमालिया में सक्रिय कई निजी सेनाओं को मिलाकर एक राष्ट्रीय सेना का निर्माण करना होगा. वही राष्ट्रीय सेना किसी एक गुट का हित नहीं बल्कि पूरे सोमालिया की जनता की रक्षा कर सकेगी.

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