सरबजीत को सर्वश्रेष्ठ इलाज: पाकिस्तान

  • 2 मई 2013
सरबजीत सिंह की मौत
Image caption जेल में कैदियों के हमले में बुरी तरह जख्मी होने के बाद पिछले छह दिन से वो कोमा में थे

पाकिस्तान सरकार ने कहा है कि मृत भारतीय कैदी सरबजीत सिंह के इलाज में कोई लापरवाही नही हुई और उन्हें सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं. साथ ही पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने इस मामले की न्यायिक जांच के भी आदेश दे दिए हैं.

सरबजीत लाहौर की कोट लखपत जेल में कैदियों के हमले में बुरी तरह जख्मी होने के बाद जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे.

भारतीय समयानुसार रात डेढ़ बजे उन्होंने लाहौर के जिन्ना अस्पताल में दम तोड़ दिया.

सरबजीत सिंह का पोस्टमार्टम गुरूवार को होगा जिसके बाद उनका शव भारत सरकार के हवाले कर दिया जाएगा.

( सरबजीत सिंह की लाहौर के अस्पताल में मौत)

लाहौर में बीबीसी संवाददाता शुमैला जाफ़री के मुताबिक पंजाब प्रांत के कार्यवाहक मुख्यमंत्री ने इस मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि सरबजीत को सर्वश्रेष्ठ इलाज मुहैया कराया गया था और अस्पताल के कर्मचारी उनकी जान बचाने के लिए दिनरात काम कर रहे थे.

मदद

लेकिन सरबजीत को बचाया नहीं जा सका और दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई.

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि सरबजीत सिंह के साथ हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद से ही पाकिस्तान सरकार उनके परिवार और भारत सरकार को हरसंभव सहायता दे रही थी.

मंत्रालय ने कहा कि सरबजीत के शव को जल्द से जल्द भारतीय उच्चायोग को सौंपने के लिए सभी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं.

इस बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरबजीत के निधन पर गहरा दुःख व्‍यक्‍त किया है। उन्‍होंने कहा कि जिन अपराधियों ने उन पर कातिलाना हमला किया है, उन्‍हें सज़ा दी जानी चाहिए.

गिरफ़्तारी

सरबजीत सिंह को 1990 में पाकिस्तान के लाहौर और फ़ैसलाबाद में हुए चार बम धमाकों के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया था.

इन धमाकों में कम से कम 10 लोग मारे गए थे.

पाकिस्तान में सरबजीत सिंह को मनजीत सिंह के नाम से गिरफ़्तार किया गया. अपने बचाव में सरबजीत ने तर्क दिया कि वो निर्दोष हैं और भारत के तरन तारन के किसान हैं. गलती से उन्होंने सीमा पार की और पाकिस्तान पहुंच गए.

सरबजीत पर जासूसी के आरोप लगे. इसके बाद उन पर लाहौर की एक अदालत में मुक़दमा चला और पहली बार 1991 में न्यायाधीश ने उनको मौत की सज़ा सुना दी.

निचली अदालत की ये सज़ा हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बहाल रखी.

निर्दोष

सरबजीत के परिवारवाले भी कहते रहे कि वो एक निर्दोष किसान हैं और उनको भूल से कोई और समझकर पकड़ लिया गया था.

इसके बाद सरबजीत पाकिस्तान की अलग-अलग अदालतों के दरवाजे खटखटाते रहे, लेकिन निचली अदालत की ये सजा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बहाल रखी.

सरबजीत ने सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी जिसे 2006 में खारिज कर दिया गया.

मार्च 2008 को पाकिस्तान की समाचार एजेंसियों के हवाले से ख़बर आई कि सरबजीत की फांसी की तारीख़ तय हो गई है और उसे 1 अप्रैल को फांसी दे दी जाएगी. पर 19 मार्च को ये खबर आई कि 30 अप्रैल तक के लिए सरबजीत की फांसी पर रोक लगा दी गई है.

भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में ये बयान दिया कि पाकिस्तान में क़ैद भारतीय बंदी सरबजीत सिंह की फांसी 30 अप्रैल तक टाल दी गई है.

इसके बाद इसी साल पाकिस्तान में मानवाधिकार मामलों के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के पास एक दया याचिका भेजी. इस याचिका में अंसार बर्नी ने अपील की कि सरबजीत की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाए या उन्हें रिहा कर दिया जाए.

पहचान

पिछले साल 2011 में पाक में कैद सरबजीत सिंह का मामला एक बार फिर पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट में जा पहुंचा.

सरबजीत के पाकिस्तानी वकील ओवैस शेख़ ने असली आरोपी मनजीत सिंह के खिलाफ जुटाए तमाम सबूत पेश कर मामला फिर से खोलने की अपील की.

वकील ओवैस शेख़ ने कोर्ट में दावा किया कि उनका मुवक्किल सरबजीत बेगुनाह है और वो मनजीत सिंह के किए की सजा काट रहा है.

Image caption सरबजीत सिंह की रिहाई के लिए कई बार प्रदर्शन हुए थे

ओवैस शेख़ का कहना था सरबजीत को 1990 में मई-जून में कराची बम धमाकों का अभियुक्त बनाया गया है, जबकि वास्तविकता में 27 जुलाई 1990 को दर्ज एफआईआर में मनजीत सिंह को इन धमाकों का अभियुक्त बताया गया है.

पाकिस्तान का कहना था कि सरबजीत ही मनजीत सिंह है जिसने बम धमाकों को अंजाम दिया था.

गुहार

इसके बाद से पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी उनकी बहन दलबीर कौर सरबजीत सिंह की रिहाई के लिए लगातार प्रयास करते रहे.

इस दौरान दलबीर कौर अपने भाई से मिलने पाकिस्तान की कोटलखपत जेल भी गईं और सरबजीत की रिहाई के लिए भारत में मुहिम चलाती रहीं और पाकिस्तान सरकार से दया की गुहार लगाती रहीं.

मई 2012 में भारत में पाकिस्तानी बंदी खलील चिश्ती को पाकिस्तान यात्रा की उच्चतम न्यायालय से इजाजत मिलने के बाद प्रेस परिषद अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से सरबजीत सिंह को रिहा करने की अपील की.

अपने पत्र में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश काटजू ने कहा कि इस मामले में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य सरबजीत का कथित इकबालिया बयान था, जिसमें उन्होंने हमलों की जिम्मेदारी ली थी लेकिन सभी जानते हैं कि हमारे देशों में कैसे (यातना से) इकबालिया बयान हासिल किया जाता है.

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