म्यूजियम बना रहे हैं बारूदी सुरंग बिछाने वाले

Image caption एक्की रॉ पांच साल की उम्र में अनाथ हो गए और दस साल की उम्र में उन्होंने लैंडमाइंस बिछाया

एक्की रॉ कंबोडिया के उन हजारों बच्चों में शामिल हैं, जिन्हें सत्तर के दशक में जबरदस्ती युद्ध में उस वक्त धकेल दिया गया जब उनकी उम्र बमुश्किल पांच साल थी. तब तक उनके माता-पिता की हत्या हो गई थी.

एक्की रॉ ने बीबीसी को बताया कि पांच साल की उम्र में उन्होंने देखा कि वियतनाम की सेना ने कंबोडिया पर हमला कर दिया है.

उस समय एक्की रॉ भी अन्य बच्चों की तरह खाना खाने के लिए मछली पकड़ते था और उसे चावल के साथ खाते थे.

उन्हें बचपन में सेना के जवानों के कपड़े धोने पड़ते थे.

गोली चलाते थे

जब वे बच्चे थे, तो उन्हें अन्य अबोध बच्चों के साथ कंबोडिया की सेना से लड़ने के लिए इकठ्ठा किया जाता था. चूंकि वे सारे बच्चे थे इसलिए उन्हें गोली चलाने नहीं आती थी.

फिर भी, उन्हें बार-बार निशाना साधने के लिए कहा जाता था और निशाना चूकने के बाद फिर से उन्हें निशाना साधने की इजाजत दी जाती थी.

एक्की रॉ ने पहली बार 1983 में मात्र 10 साल की उम्र में बारूदी सुरंग बिछाई थी. उन्हें बंदूक पकड़ा दिया गया था, लेकिन उन्हें याद नहीं है कि उन्होंने कितने लोगों की हत्या की है.

वैसे एक्की का कहना है, “मुझे हमेशा लड़ाई के मोर्चे पर नहीं भेजा जाता था लेकिन मेरा अनुमान है कि मैंने गोली चलाकर कम से कम 10 लोगों की जरूर हत्या की है. ”

मौत से बेखबर

एक्की के अनुसार मारे गए 10 लोगों में वो लोग शामिल नहीं हैं, जो उनके बिछाए बारूदी सुरंग से मरे हैं.

एक्की रॉ का कहना है कि उनके लिए सबसे मुश्किल समय वह था जब वियतनामी सेना ने उन्हें पकड़ लिया और उन्हें वियतनामी सेना के पक्ष में अपने ही देश और समाज के लोगों से लड़ने के लिए बाध्य कर दिया.

एक्की रॉ को बदले हुए सैनिक के रूप में अपने ही नाते-रिश्तेदारों पर गोली चलानी पड़ी.

हालांकि एक्की को याद नहीं है कि उन्होंने कितनी बारूदी सुरंगें बिछाई हैं.

बदल गया काम

वर्ष 1990 के दशक में संयुक्त राष्ट्र का पहला शांति दल कंबोडिया आया. संयुक्त राष्ट्र के आने से पहले, यानी वर्ष 1992-93 से पहले उनके पास कोई विकल्प नहीं था. वो बारूदी सुरंग बिछाते थे जिसमें सभी तरह के लोग मारे जाते थे.

लेकिन 1992-93 में संयुक्त राष्ट्र के कंबोडिया जाने के बाद एक्की की भूमिका बदल गई. पहले बिछाई गए बारूदी सुरंगों को अब वो संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से हटाने लगे.

ये वही बारूदी सुरंगें थी, जिनसे पता नहीं कितने लोगों की जाने गईं थीं.

बंद हुआ म्यूजियम

एक्की रॉ ने 1997 में लैंडमाइन म्यूजियम बनाया. एक्की के अनुसार, “लैंडमाइन म्यूजियम इसलिए बनाया जिससे युवा पीढ़ी और लोगों को पता चल सके कि कंबोडिया के साथ क्या हुआ था.”

उन्होंने वहां बिछाई गई बारूदी सुरंगों में से 70 से 80 फीसदी को नष्ट कर दिया जबकि मात्र 20 से 30 फीसदी बारूदी सुरंगों को म्यूजियम में रखा गया है.

बाद में सरकार ने उस म्यूजियम को यह कहते हुए बंद कर दिया कि इससे लोगों के मन में कंबोडिया की इज्जत घटेगी, जिसकी कोई जरूरत नहीं है. लेकिन फिर से 2008 में सरकार ने इसे खोलने की अनुमति दे दी.

एक्की रॉ बारूदी सुरंगों को हटाते समय कभी-कभी अपनी पत्नी और तीनों बच्चों को भी साथ ले जाते हैं.

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