अल्जीरिया:आजादी के 50 साल

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अल्जीरिया की राजधानी अल्जियर्स शहर का प्रतीक रियाद अल फ़तह नाम का एक स्मारक है. इसे शहीदों का स्मारक भी कहा जाता है और यहाँ अल्जीरिया के स्वतंत्रता संग्राम के कई प्रमुख किरदार दफ़न हैं. आप शहर में कहीं से भी इस इमारत को देख सकते हैं.

इसके ज़रा नीचे एक दूसरा संग्रहालय है जो कि देश के स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित है. इस स्मारक के भीतर उन लोगों के चित्र लगे हैं जो अल्जीरिया की स्वतंत्रता के लिए लड़ते हुए मारे गए. यह एक व्यस्त जगह है जहाँ बहुत लोग आते हैं.

कड़वी यादें

देश के संग्राम में खास भूमिका रखने वाले वरिष्ठ वकील और देश के पूर्व न्याय मंत्री अम्र बंतूमी अपने देश पर फ़्रांस के आधिपत्य के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, " हम फ़्रांसीसी लोगों से बिल्कुल अलग रहते थे. वो रंगभेद का काल था. आज अल्जियर्स के चारों तरफ़ जो झुग्गी बस्तियां हैं इनकी नीवं उन्ही दिनों में पड़ी थी. लोगों को उनके अपनी जमीनों से बेदखल कर दिया गया और वो यहाँ आ कर रहने के लिए मजबूर हो गए."

यास्मिन बिलकासिम जो 1959 में महज 14 साल की उम्र में एक पुलिस थाने के सामने बम लगाने की कोशिश के दौरान अपने दोनों पावँ खो चुकी हैं वो आजादी के पहले दिन को याद करते हुए कहती हैं, "मैं झंडे को देख कर रो रही थी. मेरे सामने मंच पर हमारे राष्ट्रपति थे. लोग ख़ुश थे. मुझे दुख होता अगर मेरे पांवों के चले जाने के बाद भी फ़्रांसीसी इस देश पर काबिज़ होते."

नीचे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के संग्रहालय में दुनिया भर के अलग अलग हिस्सों से आए अल्जीरियाई मूल के लोगों की भीड़ होती है. संग्रहालय देखने आए मिज़ियाँ अम्र जो अब अमरीका वो कहते हैं, " यह एक लंबा संघर्ष था, पर स्वशासन आजादी के बारे में होता है. खुद के शासन में लोगों को आज़ाद होना चाहिए. हम भाग्यशाली हैं कि हम यहाँ खड़े हैं. " मिज़ियाँ अम्र के पिता ने इस लड़ाई में सक्रीय योगदान दिया था और उनको इस युद्ध के कई गोलियां भी लगीं थीं.

नई चुनौती

मिज़ियाँ अम्र खुश हैं लेकिन पर बहुत से लोग मानते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने जिन आशाओं के साथ स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी वो आशाएं पूरी नहीं हुईं. 1990 के दशक में देश गृह युद्ध की भंवर में फंस गया. देश में सरकारी सेनाएं इस्लामी चरमपंथ से लड़ती रहीं.

अल्जीरिया एक अमीर देश हैं क्योंकि यहाँ की ज़मीन में तेल और गैस के भण्डार हैं लेकिन यहाँ के लोग गरीब हैं.

इस देश में आज भी उसी समूह के लोग सत्ता पर काबिज़ हैं जो कि 1962 में थे. कई सत्ता विरोधी कहते हैं कि अब दूसरों को मौका मिलना चाहिए.

संग्रहालय में अपने पोते के साथ घूमने आये पेशे से बिजली का काम करने वाले शम्सी हरूबी कहते हैं, "हम अल्जीरिया में कुछ बदलता हुआ नहीं देखते. जिन शहीदों ने अपनी जानें दे दीं उन्होंने अपना काम कर दिया लेकिन उसके बाद के 50 सालों में तो कुछ नहीं हुआ. युवाओं के पास कोई काम नहीं है, चारों तरफ़ गरीबी हैं लोगों के पास रहने को जगह नहीं है. हम इससे बेहतर कर सकते थे."

देश में 50 वर्षगाँठ के मौके पर जगह जगह राष्ट्रीय गान की धुन बजाई गई. पांच दशक पहले अल्जीरिया ने फ़्रांस को हरा कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था. लेकिन बहुत से युवा यह मानते हैं कि वक़्त आ गया है की अब अल्जीरिया अतीत का दामन छोड़ कर भविष्य की राह पर चल पड़े.

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