पारंपरिक जड़ी बूटी से मलेरिया की लड़ाई

  • 9 जुलाई 2012
Image caption मलेरिया सबसे ज्यादा अफ्रीका में फैलता है

मलेरिया की गिनती आज भी दुनिया की खतरनाक बीमारियों में होती है. हर साल दस लाख के करीब लोग इसका शिकार होते हैं, और इनमें से ज्यादातर लोग अफ्रीका के होते हैं.

दुनिया भर के स्वास्थ्य अधिकारी मानते हैं कि मलेरिया से लड़ने के लिए सस्ती और घरेलू उत्पादों से तैयार दवाई बनाने की बड़ी जरूरत है. ऐसी ही एक कोशिश कीनिया के रिफ्ट वैली क्षेत्र में हो रही है.

यहां ज्यादातर किसानों के पास जमीन के छोटे टुकड़े हैं जिन पर वो गेंहू, मक्का, चाय आदि की खेती करते हैं. लेकिन अब कुछ किसान एक ऐसी फसल की खेती भी करने लगे हैं जिसे खाया तो नहीं जाता लेकिन उसका उपयोग मलेरिया की दवाई बनाने में किया जाता है.

नई फसल

आर्टेमिसनिन नाम की ये जड़ी बूटी पूर्वी अफ्रीका का घरेलू पौधा तो नहीं है लेकिन जोसेफ किरागू जैसे किसान इसे यहां लगभग दस साल से उगा रहे हैं.

जोसेफ कहते हैं, "आप बिना किसे दिक्कत के पैसे कमा सकते हैं क्योंकि कोई इसे बर्बाद नहीं कर सकता, या फिर चुरा नहीं सकता. अगर आप गेंहूं की खेती करते हैं तो फसल पर किसी के चुरा लेने का डर लगा रहता है. इस फसल में तो ज्यादा रसायन या दवाई भी नहीं डालनी पड़ती. इसे उगाने में भी बहुत पैसे खर्च नहीं करने पड़ते. मैं लगभग चार टन की खेती करता हूं और 3,000 डॉलर कमा लेता हूं."

जब इस आर्टेमिसनिन पौधे की कटाई हो जाती है तब इसे नैरौबी ले जाया जाता है जहां दवाई बनाने वाली कंपनियां इसे खरीदती हैं. इस फसल से वो मलेरिया निरोधी दवाएं बनाती हैं जिसे स्थानीय नागरिक खरीदते हैं.

ग्रामीण कीनिया में स्वास्थ्य केंद्र में आने वाले रोगियों की तादाद मलेरिया पीडितों की भी होती है. मलेरिया यहां आम बीमारी है और सबसे ज्यादा बच्चों में फैलता है.

लाभकारी

इस स्वास्थ्य केंद्र में नर्स के तौर पर काम करने वाली एला चोंबा कहती हैं कि मलेरिया के मरीज़ों को आर्टेसिमिनिन से काफी फायदा पंहुचता है.

चोंबा कहती हैं, "इस दवाई का फायदा है कि ये आसानी से शरीर में घुल जाती है. ये जल्दी घुलती है इसलिए इसे निगलना भी आसान है. इसके अलावा ये दो चीज़ों का मिश्रण है और हमारे यहां फैले हुए मलेरिया की इलाज में ज्यादा कारगर है."

नैरौबी में कीनिया मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट में मलेरिया की दवाईयों पर प्रयोग होते रहते हैं. यहां आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान और पारंपरिक इलाजों का मिलन होता है. यहां रखे गए सैकड़ों जारों और मर्तबानों में बूटियां रखी हैं जिन पर प्रयोग करके पता लगाया जाता है कि वो बीमारियों के इलाज में कितनी कारगर हैं.

डॉक्टर जेफरी रुकुंगा यहां के पारांपरिक औषधि विभाग के प्रमुख हैं. वो कहते हैं, "हमने एक हजार से ज्यादा दवाईयों का परीक्षण किया है. इनमें से कुछ ऐसी दवाइयां भी हैं जो अफ्रीका के दूसरे देशों में इस्तेमाल किए जाते हैं. लेकिन उन सब में सबसे अव्वल आर्टिमिसनिन ही रहा है."

वैज्ञानिकों का मानना है कि मलेरिया के खिलाफ लड़ाई एक सतत प्रयास है.

एशिया में तो मलेरिया के कुछ परजिवी पर आर्टिमिसनिन का असर भी नहीं पड़ता. डर है कि कई यही चीज़ अफ्रीका में भी न फैल जाए. कीनिया में वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि पारंपरिक औषधियों के साथ उनके प्रयोग उन्हें हमेशा मलेरिया से एक कदम आगे रखेगा.

संबंधित समाचार