एलटीटीई निशानेबाज श्रीलंका की टीम में?

  • 14 जुलाई 2012
Image caption श्रीलंका के विरोधी छापामार संगठन के पूर्व बन्दूकधारियों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए चुना गया है.

कभी तमिल छापामार संगठन एलटीटीई के लिए बंदूक चलाने वाले हाथ अब श्रीलंका की निशानेबाजी टीम का हिस्सा बन सकते हैं.

श्रीलंका के विरोधी छापामार संगठन के पूर्व बन्दूकधारियों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए चुना गया है.

इनमें से 16 पूर्व लड़ाकों को पिछले महीने आयोजित प्रतिभा खोज शिविर में चुना गया था.

बाकी सैनिक तैराकी, ऐथलेटिक्स और क्रिकेट जैसे खेलों में श्रीलंका का प्रतिनिधित्व कर पाएंगे.

खेल मंत्रालय के प्रवक्ता ने बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैवीलेंड को बताया कि इनमें से कुछ लोगों को आत्मघाती हमलावर बनने का प्रशिक्षण दिया गया था. सर्वश्रेष्ठ तैराक को तमिल छापामारों की नौ सैनिक इकाई से चुना गया है.

26 साल तक चले गृहयुद्ध के बाद 2009 में श्रीलंका की सेना ने तमिल छापामारों को हरा दिया था. एलटीटीई नेता प्रभाकरण के मारे जाने के साथ ही श्रीलंका में गृह युद्ध भी समाप्त हो गया था.

पुनर्वास कार्यक्रम

जिन लोगों को खेलों में हिस्सा लेने के लिए चुना गया है वो या तो सरकार के पुनर्वास कार्यक्रम की प्रक्रिया मे हैं या फिर उनका पुनर्वास हो चुका है. अब ये लोग संबंधित खेलों का प्रशिक्षण हासिल कर रहे है.

अधिकारियों का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि इनमें से कुछ लोग अगले साल दिल्ली में होने वाले दक्षिण एशियाई खेलों में हिस्सा लेने की योग्यता हासिल कर लेंगे.

प्रवक्ता हराषा अबेकून ने बताया कि ये दूसरे देशों के लिए अच्छा उदाहरण है. इन लोगों ने श्रीलंका की सेना से युद्ध लड़ा और आज की तारीख में काफी अच्छी स्थिति में हैं.

प्रवक्ता ने बताया कि पुनर्वासित किए गए 135 पूर्व विद्रोहियों ने तैराकी, निशानेबाजी, टेनिस और बैडमिंटन जैसे खेलों में अपनी रुचि दिखाई थी.

उन्होंने ये भी बताया कि खेलों की दिशा में एक और प्रयास उन पूर्व विद्रोहियो और पूर्व सैनिकों की वॉलीबाल टीम बनाने का है, जो विकलांग हो चुके हैं.

श्रीलंका का कहना है कि उसने लगभग 11,000 पूर्व छापामारों को विशेष शिविरों में पुनर्वासित किया है और 630 अभी भी पुनर्वास की प्रक्रिया में हैं.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि रेडक्रॉस की इन शिविरों में पहुंच नही है. साथ ही अनेक मानवाधिकार संगठन सरकार की इस पूरी प्रक्रिया को संदेह की नजर से देखते है.

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