बांग्लादेश में अनोखी प्रेम कहानी

  • 15 जुलाई 2012
कॉमन जेंडर इमेज कॉपीरइट Common gender
Image caption कॉमन जेंडर फिल्म ट्रांसजेंडर और हिंदू लड़के के बीच हुए प्रेम की कहानी है

इन दिनो बांग्लादेश के रुपहले पर्दे पर 'कॉमन जेंडर' नामक फिल्म काफी धूम मचाए हुए है. ये एक ट्रांसजेंडर और एक हिंदू लड़के के बीच प्रेम की कहानी है.

इस कहानी की मुख्य किरदार सुष्मिता है जो एक ट्रांसजेंडर है.

दोनों के प्यार को लड़के के घरवाले मानने से इंकार कर देते है.प्यार में नाकाम होने पर सुष्मिता अपनी जान दे देती है.

ढाका में व्यावसायिक फिल्मों के मुकाबले ये फिल्म दर्शकों के सामने एक अलग तरह की कहानी पेश करती है.

इस फिल्म में ये दर्शाया गया है कि बांग्लादेश का समाज ट्रांजेंडर या किन्नर को किस नज़र से देखता है.

नफरत की दृष्टि

इस फिल्म के निर्देशक नोमान रॉबिन फिल्म के लिए इस विषय को चुनने का कारण बताते हुए कहते है, '' कुछ साल पहले जब में ढाका में खरीदारी करने के लिए गया तो मैंने पाया कि एक ट्रांसजेंडर को सुरक्षाकर्मी बेदर्दी से पिट रहा था. उसका कसूर ये था कि वो महिलाओं के शौच में चली गई थी. जब वो अंदर गई तो महिलाओं ने शोर मचाया और सुरक्षागार्ड आ गया. ये महिलाएं कह रही थी कि ये जगह तुम्हारे लिए नहीं है. तब जाकर मुझे पता लगा था कि समाज में लोग किन्नरों से कितनी नफरत करते हैं.''

'कॉमन जेंडर' राजधानी ढाका के बॉक्स ऑफिस पर पिछले तीन हफ्तों से चल रही है और छह सिनेमा हाल पर ये लगी हुई है.

इस फिल्म की टिकट लेने के लिए अब भी लोगों की कतारे देखी जा सकती हैं.

सिनेमा हॉल के एक टिकट विक्रेता शमसुल आरफिन रॉनी का कहना है कि इस फिल्म को लेकर दर्शकों की प्रतिक्रिया बहुत बढ़िया है.

बढ़िया प्रतिक्रिया

शमसुल रॉनी कहते है, ''ये एक अलग तरह की फिल्म है. अलग-अलग समुदाय के लोग इस फिल्म को देखने आ रहे हैं. आमतौर पर हम कोई व्यावसायिक फिल्म हफ्तों तक नहीं दिखाते हैं क्योंकि दर्शकों की प्रतिक्रिया उदासीन हो जाता है.कॉमन जेंडर अब तीन हफ्तों के लिए चल रही है.इस फिल्म ने ये साबित किया है कि अलग कहानी हमेशा दर्शकों को खींचती हैं.''

बांग्लादेश में बहुत से लोग ट्रांसजेंडर से डरते है या उनसे नफरत करते हैं. लोग इस मुद्दे पर बहस करने में असहज महसूस करते हैं.

इस फिल्म में निर्देशक ने ये संदेश देने की कोशिश की है कि किन्नरों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए.

लेकिन क्या फिल्म लोगों का नजरिया बदलने में कामयाब हो पाई है?

नज़रिया

कुछ लोगों का कहना था पहले उन्हें किन्नर हिंसक लगते थे. वो राहगीरों और दुकानों से जबरदस्ती पैसा वसूलते थे. लेकिन इस फिल्म को देखकर लगता है कि समाज ने ही इन लोगों को ऐसा करने के लिए मजबूर किया है.

एक दर्शक का कहना था, ''ये एक अच्छी फिल्म है लेकिन मुझे अब भी किन्नरों से डर लगता है. मेरा नजरिया किन्नरों के प्रति कभी नहीं बदलेगा.''

दूसरे दर्शक ने कहा, ''मेरा किन्नरों के प्रति नजरिया बदलने में समय लगेगा. एक फिल्म इतना बड़ा बदलाव नहीं ला सकती.''

अन्य बांग्ला फिल्मों के मुकाबले ये फिल्म व्यावसायिक तौर पर सफल रही है. लोग इस फिल्म को देखने सिनेमा हॉल आ रहे हैं.

निर्देशक नोमान रॉबिन का कहना है जब उन्होंने इस फिल्म का विचार सामने रखा था तो कई लोगों को उनका ये विचार बेतुका लगा था.

उनका कहना था, ''इस फिल्म को बनाना एक कठिन काम था इसके लिए प्रायोजकों की खोज बेसब्री से शुरु की लेकिन किसी ने प्रतिक्रिया नहीं दी.मैं बड़े कॉर्पोरेट हॉउस के पास भी गया उन्होंने इस फिल्म की प्रशंसा की लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि इस फिल्म का विषय ब्रेंड वेल्यू के साथ नहीं जमता.''

कॉमन जेंडर एक ऐसे समय में सिनेमा घरों में आई है जब ढाका फिल्म उद्योग दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने को लेकर जूझ रहा है.

फिल्म के निर्देशक का कहना है कि राजधानी में सफलता हासिल करने के बाद अब इस फिल्म को देशभर में रिलीज़ करने की तैयारियां की जा रही हैं.

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