क्या सचमुच महान था सिकंदर महान

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सिकंदर एक महान विजेता था - ग्रीस के प्रभाव से लिखी गई पश्चिम के इतिहास की किताबों में यही बताया जाता है. मगर ईरानी इतिहास के नज़रिए से देखा जाए तो ये छवि कुछ अलग ही दिखती है.

प्राचीन ईरानी अकेमेनिड साम्राज्य की राजधानी – पर्सेपोलिस – के खंडहरों को देखने जानेवाले हर सैलानी को तीन बातें बताई जाती हैं – कि इसे डेरियस महान ने बनाया था, कि इसे उसके बेटे ज़ेरक्सस ने और बढ़ाया, और कि इसे ‘उस इंसान‘ ने तबाह कर दिया – सिकंदर.

उस इंसान सिकंदर को, पश्चिमी संस्कृति में सिकंदर महान कहा जाता है जिसने ईरानी साम्राज्य को जीता और जो इतिहास के महान योद्धाओं में से एक था.

हालत ये है, कि यदि कोई पश्चिमी इतिहास की किताबों को पढ़े तो उसे ये सोचने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि ईरानी बने ही इसलिए थे कि सिकंदर आए और उनको जीत ले.

जो थोड़ा और कौतूहल रखेगा, उसे शायद ये भी पता लग सकता है कि ईरानियों को इससे पहले भी यूनानियों ने दो बार हराया था, जब ईरानियों ने उनपर हमला करने की नाकाम कोशिश की, और इसलिए सिकंदर ने ईरान पर हमला बदला लेने के लिए किया था.

मगर ईरानी दृष्टिकोण से देखें तो पाएँगे कि सिकंदर महानता से कोसों दूर था.

हमला, मगर क्यों

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Image caption सिकंदर की सेनाओं ने ईरानी शहर पर्सेपोलिस को तबाह कर दिया था

वहाँ दिखेगा कि सिकंदर ने पर्सेपोलिस को जमींदोज़ कर दिया, एक रात एक ग्रीक नर्तकी के प्रभाव में आकर जमकर शराब पीने के बाद, और ये दिखाने के लिए कि वो ऐसा ईरानी शासक ज़ेरक्सस से बदला लेने के लिए कर रहा है जिसने कि ग्रीस के शहर ऐक्रोपोलिस को जला दिया था.

ईरानी सिकंदर की ये कहकर भी आलोचना करते हैं कि उसने अपने साम्राज्य में सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों को नुक़सान पहुँचाने को बढ़ावा दिया. उसके समय में ईरानियों के प्राचीन धर्म, पारसी धर्म के मुख्य उपासना स्थलों पर हमले किए गए.

सिकंदर के हमले की कहानी बुनने में पश्चिमी देशों को ग्रीक भाषा और संस्कृति से मदद मिली जो ये कहती है कि सिकंदर का अभियान उन पश्चिमी अभियानों में पहला था जो पूरब के बर्बर समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाने के लिए किए गए.

मगर असल में ईरानी साम्राज्य पर विजय का महत्व था, इसलिए नहीं कि उनको सभ्य बनाना था, बल्कि इसलिए क्योंकि वो उस समय तक का विश्व का महानतम साम्राज्य था, मध्य एशिया से लीबिया तक फ़ैला हुआ. ईरान एक बेशकीमती इनाम था.

करीब से देखने पर इस बात के भी बहुत सारे प्रमाण मिलते हैं कि ग्रीक लोग ईरानी शासन और इसके शासकों के प्रशंसक थे.

उन बर्बरों की तरह जिन्होंने रोम को जीता था, सिकंदर भी उस साम्राज्य की प्रशंसा सुनकर आया था. सिकंदर ईरान की प्रशंसा करनेवाली कहानियों से अवगत रहा होगा.

ईरानी साम्राज्य एक ऐसी चीज़ था जिसे जीतने से ज़्यादा बड़ी बात उसे हासिल करना था.

सम्मान भी

ईरानी बेशक उसे आततायी बताते हैं, एक बेलगाम युवा योद्धा, मगर सबूतों से यही पता चलता है कि सिकंदर का ईरानियों में एक आदर भी था.

उसे हमले के कारण ईरान में हुई तबाही का अफ़सोस था. पर्सेपोलिस से थोड़ी दूर एक मकबरे का नुकसान देखकर वो बड़ा व्यथित हुआ था और उसने तत्काल उसकी मरम्मत के आदेश दिए.

अगर 32 साल में मौत के मुँह में चला जानेवाला सिकंदर और अधिक जिया होता तो शायद वो और भी बहुत कुछ चीज़ों का जीर्णोद्धार करवाता.

फिर शायद ईरानियों का मैसिडोनियाई आक्रमणकारियों से संबंध सुधरता और वे उन्हें भी अपने देश के इतिहास में शामिल करते.

और तब शायद 10वीं शताब्दी में लिखी गई ईरानी कृति शाहनामा में सिकंदर केवल एक विदेशी राजकुमार नहीं कहलाता.

प्रोफ़ेसर अली अंसारी स्कॉटलैंड के सेंट एँड्रूयूज़ विश्वविद्यालय में आधुनिक इतिहास के प्राध्यापक और ईरानी अध्ययन विभाग के निदेशक हैं.

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