क्या दुनिया खाद्य संकट के कगार पर है?

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Image caption अमरीका में इस वर्ष रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है जिसका असर खेती पर भी पड़ा है.

भारत के कई हिस्सों में इस बार मॉनसून देर से आया है और कुछ इलाकों में अब तक उम्मीद से कम बारिश हुई है.

मॉनसून में देरी का सीधा असर खेती पर पड़ता है. इस महीने की शुरुआत में केंद्र ने माना था कि इस साल मानसून में देरी हुई है लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि देश के पास पर्याप्त मात्रा में खाद्य भंडार है.

वैसे मॉनसून में देरी और इसका खेती पर असर सिर्फ़ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कुछ और हिस्सों में भी देखा जा रहा है.

अमरीकी राष्ट्रीय पर्यावरण डाटा केंद्र के अनुसार इस वर्ष जून महीने तक के आँकड़ों से पता चलता है कि इस वर्ष गर्मी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. और मध्यपश्चिम अमरीका इस वक्त इस सदी का सबसे बुरा सूखा झेल रहा है.

इसका असर वहाँ कृषि पर भी पड़ रहा है क्योंकि मध्यपश्चिम अमरीका देश का मुख्य कृषि क्षेत्र है.

फसल

तो क्या इससे ये माना जाए कि दुनिया एक बार फिर खाद्य संकट के कगार पर खड़ी है?

अमरीका, गेंहू, सोयाबीन और मक्के का दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है. अमरीकी कृषि मंत्रालय के इस सप्ताह जारी पूर्वानुमान के मुताबिक इस वर्ष मक्के की पैदावार 12 फीसदी कम होगी.

वॉशिंगटन से बीबीसी संवाददाता ज़ो कॉनवे कहते हैं कि इस साल के पहले छह महीने अब तक के सबसे गर्म महीने थे और कई राज्यों में सूखा इतना भयंकर है कि कृषि मंत्रालय ने इसे अमरीका के इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा घोषित कर दिया है.

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Image caption भारत के कई हिस्सों में मॉनसून इस बार देर से आया है.

अमरीका में ये मक्के की फसल का मौसम है लेकिन अब तक काफ़ी फसल सूख चुकी है.

खाद्य संकट?

मध्यपश्चिम अमरीका के इलिनोइस राज्य के किसान कहते हैं कि उन्होंने इससे पहले इतनी सूखी धरती कभी नहीं देखी. एक किसान ने बताया, "काफ़ी फ़सल पहले ही बर्बाद हो चुकी है. अब अगर बारिश हो भी जाए तो मुझे नहीं लगता कि फसल अब बचाई जा सकती है क्योंकि अब बहुत देर हो चुकी है."

एक और किसान ने कहा, "मैं मानता हूं कि वर्ष 1988 के बाद से ये अब तक का सबसे ख़राब सूखा है. बल्कि मुझे लगता है कि ये 1988 से भी बुरा समय है क्योंकि उस साल कम-से-कम शुरू में इतनी बुरी स्थिति नहीं थी."

तापमान बढ़ने के साथ ही फसलों के दाम भी बढ़ रहे हैं. पिछले एक महीने में मक्के के दाम 45 फीसदी, गेंहू के 36 फीसदी और सोयाबीन के दाम 17 फीसदी बढ़ गए हैं.

पांच साल पहले कहा गया था कि खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों की वजह से दुनिया में साढ़े सात करोड़ भूखे लोग बढ़े थे और 30 से ज़्यादा देशों में दंगे हुए थे.

खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों को ही दो साल पहले अरब क्रांति का एक कारण बताया गया था.

लेकिन कुछ विश्लेषक कहते हैं कि खाद्य संकट होने की संभावना नहीं है. इसकी वजह है दुनिया के सबसे ग़रीब लोगों के मुख्य भोजन- गेंहू और चावल- की अच्छी आपूर्ति.

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