क्या इस्लामी कट्टरपंथियों को मिलेगा माली में समर्थन?

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Image caption इस्लामी चरमपंथी टिम्बकटू में पवित्र मकबरों को तोड़ रहे हैं.

अल-कायदा से जुड़े इस्लामी चरमपंथियों ने माली पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया है. उन्होंने टिम्बकटू शहर में विश्व धरोहरों की सूची में आने वाले आधे से ज्यादा मकबरे और दरगाहों को नष्ट कर दिया है और शरिया कानून को लागू कर दिया है.

शताब्दियों से माली के लोग इस्लाम के उदारवादी रूप को मानते रहे हैं. पर सवाल ये है कि क्या इन लड़ाकुओं को माली के समाज में कोई समर्थन मिल सकता है.

शहर के औद्योगिक क्षेत्र में स्थित इस मस्जिद के अदंर आते ही इस बात का अंदाज़ा हो जाता है कि माली में उदारवादी इस्लामी पहचान की वजह क्या है?

'निंदनीय'

कुल्हाडियों से पवित्र मकबरों को तोड़ने वाले इस्लामी चरमपंथियों का कहना है कि इस्लाम की सही व्याख्या के तहत यह स्थल निंदनीय हैं. लेकिन सूफी मुसलमान इन्हें पूरी मान्यता देते है.

सूफी इमाम ओमर तनापो कहते हैं कि जो उत्तर में इस्लामी लोग जो कर रहे हैं उसका मजहब से कोई वास्ता नहीं है.

वह कहते हैं, ''आप उनका क्या जवाब देंगे जो इस्लाम के नाम पर इसे नष्ट कर रहे हैं. जिस क्रूर ताकत का यह लोग इस्तेमाल कर रहे हैं वह इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है. मोहम्मद साहब ने आदेश दिया था कि हम नियमित रूप से वहां जाएं.''

कट्टरपंथियों के हमलों से डरे लगभग सौ लोगों ने एक चर्च के आंगन में शरण ले रखी है.

बागियों के आने के बाद टिम्बकटू से भाग कर आने वाली तवाद यतारा कहती हैं, ''उन्होंने हमारी चर्च को नष्ट कर दिया है और बाइबल और पादरी के कपड़े जला दिए हैं. टिम्बकटू में ईसाई होना इस समय असंभव है. यहाँ तक कि वह मुसलमानों से भी दुर्व्यवहार करते हैं. अगर हम ईसाई की तरह वहां जाएंगे जो वह हमें मार डालेंगे.''

नकाबपोश महिलाएं

शुक्रवार की नमाज़ के लिए मस्जिद में आई कई महिलाओं ने पूरा नकाब पहन रखा है. इनकी वेश-भूषा से ही इस बात का अंदाज़ा लगता है कि ये इस्लाम के कट्टर रुप को मानते हैं.

उत्तरी क्षेत्र पर कब्जा करने वाले इस्लामी यहां पर इबादत करते थे. हालांकि वह भी शरिया राज्य चाहते हैं लेकिन माली के यह लोग खुद को बागियों की गतिविधियों से दूर रखते हैं.

सऊदी अरब से पढ़ कर आने के बाद माली में वहाबी को मानने वालों की संख्या पिछले सालों में बढ़ी है. वह इन मस्जिदों के लिए पैसा ले कर आए हैं.

इमाम मोहम्मद तूरे कहते हैं, ''मैं चाहता हूं कि माली शरिया वाला देश बन जाए लेकिन उसका यह तरीका नहीं है. इन बागियों के साथ कोई बातचीत नहीं होनी चाहिए और शरिया हथियारबंद लोगों द्वारा थोपा नहीं जाना चाहिए. शरिया खुद ही आएगा. मैं जानता हूं कि ऐसा जल्द ही होगा. खुदा की मर्जी से माली शरिया देश होगा.''

पर ज्यादातर लोगों का मानना है कि बातचीत के लिए वक्त बीत चुका है.

हांलाकि सभी हथियारबंद इस्लामियों की निंदा करते हैं. लेकिन ऐसी आशंका है कि इस संकट से धार्मिक विभाजन हो सकता है.

खतरा केवल धरोहरों को ही नहीं है , जिंदगी जीने के उस तरीके को भी है जो सदियों से इस देश में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित रहा है.

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