तालिबान ने दिए शांति के संकेत

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Image caption माना जा रहा है कि तालिबान अमरीका से दोबारा बातचीत शुरु करना चाहता है

तालिबान अमरीका को बातचीत करने के लिए संकेत भेज रहा है लेकिन ये माना जा रहा है अमरीका में हाल ही में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के कारण वो इस बातचीत को लेकर अनिच्छुक है.

लेखक राशिद अहमद बता रहे हैं कि इससे अफगानिस्तान के भविष्य पर किस तरह का असर पड़ेगा.

पिछले तीन महीनों में तालिबान ने कई बार अमरीका से बातचीत शुरु करने के संकेत दिए हैं लेकिन कुछ ही महीनों में अमरीका में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव के चलते वो अभी इस पर कोई जवाब नहीं दे रहा है.

इस बीच तालिबान ने अमरीका और अफगान की सेना पर हमले बढ़ा दिए है और रमज़ान के बावजूद इन लड़ाईयों में कमी नहीं आई है.

जुन महीने के अंत में जापान के क्योटो में हुए एक अकादमिक सम्मेलन के दौरान तालिबान शूरा के एक सक्रिय सदस्य ने अफगान हाई पीस काउंसिल के एक प्रमुख सदस्य मासूम स्तानकज़ई और राष्ट्रपति हामिद करज़ई के सलाहकार से बातचीत की थी.

हालांकि तालिबान ने ये कहा था कि वो करज़ई के किसी प्रतिनिधि से बातचीत नहीं करेगा.

वहीं इसी समय पेरिस में हुए सम्मेलन के दौरान पूर्व तालिबान के प्रतिनिधियों ने अफगान के प्रतिनिधियों से मिलकर कई संवेदनशील मुद्दों जैसे सत्ता में भागीदारी और संविधान में बदलाव पर चर्चा की थी ताकि उसमें तालिबान को भी शामिल किया जा सके.

जवाब नहीं

इसके बाद पूर्व या सक्रिय तालिबान प्रतिनिधियों के प्रमुख अकादमिक लोगों और पूर्व संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी मिशेल सेंपल द्वारा लिए गए साक्षात्कार में ये बाते निकलीं कि तालिबान अमरीका से दोबारा बातचीत शुरु करना चाहता है और उसका कई मुद्दों पर बहुत ही दोस्ताना रवैया था.

लेकिन ओबामा प्रशासन के किसी भी सदस्य ने न इसके स्वागत पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और न ही बातचीत के लिए कोई प्रतिबद्धता दिखाई.

इसका कारण साफ है कि अमरीका में 2 नवंबर को चुनाव होना है. राष्ट्रपति ओबामा और न ही रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी, तालिबान के साथ मेलमिलाप की कोई भाषा इस्तेमाल करना चाहते है जिससे दोनों ही अपने प्रतिद्वंद्वी के सामने कमज़ोर दिखाई दे.

हालांकि विदेश मंत्रालय की तरफ से बातचीत दोबारा शुरु करने की कुछ कोशिशें हुई हैं लेकिन वे भी चुनाव के बाद उस पर ध्यान लगाना चाहते हैं और तालिबान से बातचीत को लेकर ओबामा प्रशासन में एक राय की कमी दिखाई दे रही है.

इसका नतीजा ये हो सकता है कि बातचीत नवंबर के बाद हो.

तालिबान और अमरीका के प्रतिनिधियों ने जर्मनी और कतर में कम से कम सात बार गुप्त बातचीत की थी. दोनों के बीच बातचीत जनवरी 2012 में रुक गई थी.

तालिबान पुनर्जीवित

तालिबान ने ये बातचीत बंद कर दी थी और माना जाता है कि इसका कारण एक अमरीकी सैनिक के बदले ग्वांतनामों से पांच तालिबान के नेताओं को रिहा करने की प्रतिबद्धता थी जो उसने पूरा नहीं किया था.

इस बीच तालिबान ने अमरीका और अफगान सेना पर अप्रैल, मई और जून के महीने में हमले किए हैं. पिछले साल इसी समयावधि में हुए हमलो की तुलना में इसमें 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

सबसे ज्यादा खतरनाक हेलमंद और कंधार में तालिबान का पुनर्जीवित होना है ,जिसका पिछले दो सालों में अमरीकी सैनिकों द्वारा किए गए हमलों में सफाया हो गया था.

पाकिस्तान और अमरीका के रिश्ते नीचे गिरे हैं और अमरीका लागातार पाकिस्तान को तालिबान के नेताओं और लड़ाकूओं को शरण देने का आरोप लगाता रहता है.

सख्त रवैया

अमरीका की सेना, अमरीकी कांग्रेस और मीडिया ने इस पर सख्त रवैया अपनाया है.

ऐसे में ये दिखाई दे रहा है कि तालिबान के साथ दोबारा बातचीत का दबाव डालने की बजाय राष्ट्रपति ओबामा पर ये दबाव डाला जाएगा कि वो हक्कानी नेटवर्क को आतंकवादी सगंठन घोषित करे.

इससे क्षेत्र में नकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं. ये इस ओर भी इशारा करेगा कि पाकिस्तान आतंकवाद का समर्थक है जिसकी वजह से उस पर अमरीकी प्रतिबंध लग जाएंगे, अमरीकी सेना पाकिस्तान में सीमा पार ज्यादा छापे मारेगी.

इससे तालिबान के नेता मुल्ला मोहम्मद उमर का अमरीका के साथ बातचीत करना नामुमकिन हो जाएगा और इससे अमरीकी सेना के खिलाफ कई आत्मघाती हमले किए जा सकते है.

हक्कानी नेटवर्क ने कई पश्चिमी, पाकिस्तानी और अफगान के लोगों को फिरौती के लिए बंधक बनाया हुआ है. अगर हक्कानी पर आतंकवादी की स्टैंप लगा दी जाती है तो उनका जीवन खतरे में पड़ जाएगा.

तालिबान नहीं चाहते कि अमरीकी सेना वर्ष 2014 में अफगानिस्तान से बाहर जाए.

करज़ई तालिबान से बात करने के इच्छुक हैं और पाकिस्तान भी यही चाहता है. हालांकि इस्लामाबाद ने तालिबान, अमरीका या करज़ई के साथ बातचीत करवाने में मदद करने के लिए बहुत थोड़ा किया है.

पाकिस्तान ज्यादा मदद कर सकता था अगर वो मुल्ला उमर और हक्कानी सगंठन को लड़ाई कम करने और बातचीत करने के लिए ज्यादा दबाव डालता.

अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव और वर्ष 2014 में आने वाली अनिश्चतता और जातीय हिंसा तालिबान के साथ शांति वार्ता को और दूर ले जा रही है.

अमरीका और नेटो अब तक इन राजनीतिक चुनौतियों पर ज्यादा जोर देने में असफल रही है जिससे आने वाले महीनों में अफगानिस्तान के भविष्य पर प्रभाव पड़ेगा.

अमरीका को तालिबान से तुरंत बातचीत शुरु करने की जरुरत है और उसे अफगान सरकार को इन दिक्कतों से उबारने में मदद करनी शुरु करनी होगी.

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