विहिप के बयानों से धब्बा लगता है: मोहन भागवत

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Image caption दिल्ली में विदेशी पत्रकारों के सामने मोहन भागवत ने आरएसएस की उदार छवि सामने रखने की कोशिश की.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्वीकार किया है कि विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के नेताओं के बयानों के कारण कई बार संघ के नाम पर भी “धब्बा” आता है.

दिल्ली स्थित विदेशी संवाददाता क्लब में मोहन भागवत ने विदेशी मीडिया संस्थानों से जुड़े लगभग दो दर्जन पत्रकारों के सवालों के जवाब में ये स्वीकार किया.

बीबीसी से जुड़े रहे नामी गिरामी पत्रकार सर मार्क टली ने मोहन भागवत से सीधा सवाल पूछा कि एक तरफ आप आत्मीयता और प्रेम से काम की बात कहते हैं फिर भी विश्व हिंदू परिषद जैसे संघ के आनुषांगिक संगठनों और प्रवीण तोगड़िया जैसे नेताओं के नेताओं को ऐसी बातें कहने की इजाज़त क्यों दी जाती है जो मुसलमानों के प्रति द्वेष बढ़ाए?

मोहन भागवत ने कहा कि ऐसे बयान देने वाले संगठनों को बताया जाता है कि आपके बयानों के कारण आपको सांप्रदायिक संगठन कह दिया जाता है और धब्बा संघ पर भी लगता है.

उदार छवि?

उन्होंने कहा, “आरएसएस के जन्म से पहले के भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर उन्हें (आनुषांगिक संगठनों को) बात करनी पड़ती है. अगर वो अपनी बात तरीके से कहें तो ठीक है पर जब वो ठीक ढंग से विचार नहीं रख पाते तो ऐसी बातें पैदा होती हैं.”

मोहन भागवत ने बात को और स्पष्ट करते हुए कहा, “दरअसल हमें अपने विचारों को काफी संयमित ढंग से प्रकट करना चाहिए. कई बार वो गड़बड़ी हो जाती है. आपने जिन संगठनों का नाम लिया (यानी विश्व हिंदू परिषद आदि) उनसे ऐसा हो जाता है. लेकिन कई बार वो ऐसे मुद्दों से दोचार होते हैं कि उन्हें ऐसा कहना पड़ता है. हम उनसे कहते हैं कि आपको ऐसी बातें कहनी पड़ती हैं (पर) इसके कारण आपको सांप्रदायिक संगठन करार दे दिया जाता है और चूँकि आप हमारे स्वयंसेवक हैं इसलिए धब्बा हम पर भी लगता है.”

सरसंघचालक ने संयमित तरीके से जवाब देते हुए आरएसएस की उदार छवि को विदेशी पत्रकारों के सामने रखने की कोशिश की.

उनके पूर्ववर्ती सरसंघचालक कुप्पहळ्ळी सीतारमैया सुदर्शन ने हिंदू विरोधियों के खिलाफ़ “एक और महायुद्ध” की भविष्यवाणी की थी, लेकिन मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू मूल्य किसी उग्र विचार का समर्थन नहीं करते.

राजनीतिक सवाल

राजनीतिक से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए मोहन भागवत ऐसी बात कहने से बचते रहे जिससे किसी तरह का विवाद पैदा हो.

संवाददाताओं ने उनसे पूछा कि उनके विचार में भारतीय जनता पार्टी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर किसे सामने लाना चाहिए? उन्होंने कहा ये भारतीय जनता पार्टी को ही तय करना है.

उनसे पूछा गया कि संघ से कार्यकर्ता और कुछ नेताओं के खिलाफ़ बम विस्फोटों के सिलसिले में जाँच चल रही है. तो क्या वो तथाकथित “भगवा आतंकवाद” के लिए खुद को कितना जिम्मेदार मानते हैं?

भागवत का कहना था “अगर जाँच चल रही है तो जाँच पूरी होनी चाहिए और उसके बाद अगर कोई गलत बात सामने आई तो कानून अपना काम करेगा. लेकिन ऐसा कुछ है नहीं क्योंकि हम धमकाने पर यकीन नहीं करते और हम किसी समाज के विरोध में भी नहीं हैं. हम अपने समाज को संगठित कर रहे हैं.”

संघ के प्रतिष्ठित नेता माधव सदाशिव गोलवलकर ने अपने लेखों में भारत के तीन आंतरिक दुश्मन गिनाए हैं – मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट.

क्या मोहन भागवत आज के परिप्रेक्ष्य में गोलवलकर की विचारधारा को स्वीकार करते हैं या अस्वीकार करते हैं?

भागवत का जवाब था, “हम उनके (गोलवलकर के) विचारों को स्वीकार या अस्वीकार नहीं करते. संघ सोचता है कि पूजा पद्धति या विचारधारा के आधार पर कोई दुश्मन नहीं होना चाहिए. गुरूजी ने जो कुछ कहा उसे आपको विस्तार से पढ़ना चाहिए. आपको एक किताब को विचार के तौर पर नहीं लेना चाहिए. मैं जानता हूँ कि गुरूजी क्या थे और क्या सोचते थे.”

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