...ना इधर के रहे ना उधर के रहे

 गुरुवार, 16 अगस्त, 2012 को 09:11 IST तक के समाचार
कश्मीर

अशरफ जान अपने माता पिता से महज़ कुछ सौ मीटर की दूरी पर रहती हैं पर वो उनसे 22 साल से नहीं मिलीं. बीच में एक नदी है लेकिन अशरफ जान तैरना जानती हैं, परेशानी है तो महज़ भारत पाकिस्तान के बीच का बँटवारा.

अपने घर के पास मगर परिवार से बहुत दूर अशरफ जान को जब घर की याद सताती है तो वो उस जगह आ कर खडी हो जाती हैं जहाँ से उनके माता पिता का घर साफ़ दिखता है. अशरफ जान कहती है कि उनके माता पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि पिछले छह साल से वो अपने घर के बाहर भी नहीं निकले. अशरफ कहती हैं " कई बार लगता है कि उठूँ और तैर कर उस पार चली जाऊं लेकिन जा नहीं सकती."

साल 1948 में भारत और पाकिस्तान ने अपना कश्मीर के लिए अपना पहला युद्ध लड़ा. वो लड़ाई ख़त्म हो गई और जो जिस देश जहाँ तक वो उसके पास रह गया और बीच की सीमा को नियंत्रण रेखा का नाम दे दिया गया. बहुत बड़ी तादाद में परिवार बँट गए.

बंटवारे के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच की यह नियंत्रण रेखा सुलगती रही. साल 2003 से भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध विराम के बाद से इस इलाके के कई परिवार उत्तरी कश्मीर की नीलम नदी के किनारे उस जगह आ कर जमा हो जाते हैं जहाँ नदी सबसे संकरी है और दोनों किनारों से लोगों को देखा जा सकता है.

दोनों तरफ़ से कश्मीरी आ कर एक दूसरे को हाथ हिला कर तसल्ली कर लेते है.

कश्मीर

इसी तरह के लोगों में से एक हैं 65 साल के सिद्दीक बट जो अपनी बेटी को देखने के लिए ऐसे ही एक दिन नीलम नदी के किनारे आए हैं.

नदी के उस पार एक जगह की ओर इशारा करते हुए सिद्दीक बट ने कहा, "वो वहां ज़रा देर पहले बैठी हुई थी." उनकी बेटी की शादी हो चुकी है और उसके चार बच्चे हैं.

"जब एक दशक के चरमपंथ के बाद भी कश्मीर में भारतीय शासन हिला नहीं तो इन लोगों पर सवाल उठ खड़े हुए. उसके बाद 9 /11 के हमलों के चलते पूरी दुनिया में धार्मिक चरमपंथियों के लिए स्वीकार्यता और कम हो गई." "

हसन अस्करी रिजवी

अशरफ जान और सिद्दीक बट उन क़रीब 30000 लोगों में से हैं जो 1990 के दशक में भारत प्रशासित कश्मीर से भाग कर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर जा बसे थे क्योंकि उस समय कश्मीर में हिंसा का दौर शुरु हो चुका था.

जब ये लोग भाग कर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर पहुँचे तो उन्हें भाग कर आए शरणार्थियों के लिए बनाए गए कैम्पों में रखा गया. इन सभी लोगों को उम्मीद थी कि जल्द शांति लौट आएगी और वो अपने घरों को लौट पाएगें.

लेकिन ऐसा अब तक नहीं हुआ.

ऐसी मान्यता है कि करीब एक दशक तक चले भारत विरोधी चरमपंथ के दौर के में क़रीब 30000 युवक भारत प्रशासित कश्मीर से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की ओर चले आए ताकि वो हथियारों का प्रशिक्षण ले कर भारत से लड़ सकें.

इनमें से ज्यादातर वापस भारत चले गए. बहुत से पकड़े गए, बहुत से मारे गए. कुछ लोग चुपचाप अपने घरों में वापस पहुँच आम ज़िन्दगी बसर करने लगे.

बदलती हकीकत

आज उनमें से तीन से चार हज़ार पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में रह रहे हैं. इन लोगों में से कई अब अधेड़ हो गए हैं और उन्होंने शादियाँ कर ली हैं.

पाकिस्तानी सरकार के हिसाब से भारत प्रशासित कश्मीर से आए हुए लोगों की कुल तादाद 36000 है. पर जब से भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी रिश्ते बेहतर होने लगे हैं इन लोगों को अपने हालात ख़राब होते महसूस हुए.

दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते तो सुधरे लेकिन नियंत्रण रेखा की गहराई कम नहीं हुई.

पाकिस्तान में सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हसन अस्करी रिजवी कहते हैं, " जब एक दशक के चरमपंथ के बाद भी कश्मीर में भारतीय शासन हिला नहीं तो इन लोगों पर सवाल उठ खड़े हुए. उसके बाद 9 /11 के हमलों के चलते पूरी दुनिया में धार्मिक चरमपंथियों के लिए स्वीकार्यता और कम हो गई."

"मेरे बच्चों का यहाँ कोई भविष्य नहीं उन्हें कोई पाकिस्तानी पहचान पत्र नहीं मिल सकता इसका मतलब वो पासपोर्ट नहीं बनवा सकते नौकरियां नहीं कर सकते किसी अधिकारी की मांग नहीं कर सकते"

एक पूर्व चरमपंथी

पहले तो साल 2003 में भारत- पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर युद्ध विराम हो गया, उसके बाद साल 2006 से पाकिस्तान ने भारत प्रशासित कश्मीर में काम कर रहे चरमपंथी संगठनों को मदद देना एकदम बंद कर दिया.

चरमपंथी संगठनों की आर्थिक मदद बंद करने के बाद इस साल पाकिस्तान सरकार ने पूर्व चरमपंथियों के पुनर्वास के लिए एक वित्तीय पैकेज की घोषणा की है जिसकी मदद से वो कोई काम काज शुरू कर सकें और शादी ब्याह कर के अपने घर बसा सकें.

इन क़दमों की वजह से भारत विरोधी चरमपंथी आंदोलन और कमज़ोर पड़ गया.

दो पाटन के बीच

इस बीच भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा और भारत प्रशासित कश्मीर में शांति का लाभ उठाते हुए नियंत्रण रेखा पर कंटीली बाड़ लगा दी है. इस बाड़ की वजह से चरमपंथियों का भारत की तरफ़ आना और भी मुश्किल हो गया.

दूसरी तरफ़ चरमपंथियों के लिए नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ़ समर्थन घटता जा रहा है. कश्मीर के लोग अब हिंसा की जगह तर्कों, प्रदर्शनों और मानवाधिकार की बात उठा रहे हैं जिसको ना केवल दुनिया भर से बल्कि भारतीय मीडिया से समर्थन हासिल हो रहा है.

कश्मीर

वहीं पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में रह रहे चरमपंथियों की हालत बेहद खाराब होती जा रही है. एक पूर्व चरमपंथी ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा," मेरे बच्चों का यहाँ कोई भविष्य नहीं. उन्हें कोई पाकिस्तानी पहचान पत्र नहीं मिल सकता. इसका मतलब वो पासपोर्ट नहीं बनवा सकते, नौकरियां नहीं कर सकते, किसी अधिकार की मांग नहीं कर सकते."

पर ना भारत ना पाकिस्तान इन लोगों को इनके घरों में लौटने देने के लिए तैयार है.

भारत को चरमपंथ के फिर भड़कने का ख़तरा है पाकिस्तान को नकारात्मक पब्लिसिटी का. इनमे से ज़्यादातर लोग पाकिस्तान से दुखी हैं.

कश्मीर के दोनों हिस्सों के बीच चल रही बस सेवा में यात्रा पत्र देने के पहले दोनों देशों के अधिकारी बहुत बारीकी से इस बात की पड़ताल करते हैं कि कोई पूर्व चरमपंथी इस पार से उस पार ना चला जाए.

पूर्व चरमपंथियों के पास भारत लौटने का एक ही रास्ता है जो भारत पाकिस्तान दोनों की मंज़ूरी से बनाया गया है. पूर्व चरमपंथियों को हवाई ज़हाज़ से नेपाल जाना होता है और वहां से सड़क के रास्ते श्रीनगर. लेकिन इतने पैसे सबके पास नहीं कि कि वो सपरिवार यह यात्रा कर सकें.

यानी जब तक सड़क का रास्ता सबके लिए नहीं खोला जाता तब तक ज़्यादा से ज़्यादा बिछड़े हुए लोग यही कर सकते हैं कि नीलम नदी के किनारे पर खड़े हों और अपने घरों को निहार लें.

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