क्या है विवादास्पद ईशनिंदा क़ानून ?

 मंगलवार, 28 अगस्त, 2012 को 14:09 IST तक के समाचार
भट्टी

इस्लामाबाद में कुछ अज्ञात हमलावरों ने शहबाज़ भट्टी की हत्या कर दी थी.

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक 11 साल की लड़की रिमशा को ईशनिंदा करने के आरोप में हिरासत में लिया गया है.

इस घटना के बाद से ही इस विवादास्पद क़ानून को लेकर फिर सवाल उठने लगे हैं.

रिमशा का संबंध ईसाई धर्म से है और उन पर कुरान-ए कायदा का अपमान करके उसकी प्रति में आग लगाने का आरोप है.

क्यों चर्चा में है पाकिस्तान का ईशनिंदा क़ानून?

पाकिस्तान के गठन बाद से ही ये क़ानून विवादों में रहा है लेकिन साल 2010 में पांच बच्चों की एक ईसाई मां को मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद से काफ़ी चर्चा में रहा है.

आसिया बीबी नाम की इस महिला पर आरोप था कि उन्होंने पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद का अपमान किया था.

इस घटना के बाद वर्ष 2011 के जनवरी महीने में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर पर उनके ही सुरक्षागार्ड ने मार दिया था. हत्या के बाद इस सुरक्षागार्ड ने आत्मसमर्पण कर लिया था और बताया था कि उसने गोली इसलिए चलाई क्योंकि उनके मुताबिक सलमान तासीर ने ईश-निंदा क़ानून को काला क़ानून कहा था.

माना जाता है कि सलमान तासीर ईश- निंदा क़ानून के आलोचक थे. इस घटना के बाद पाकिस्तान दो भागों में विभाजित दिखा जिसमें एक पक्ष इस सुरक्षागार्ड को हीरो मान रहा था. मार्च 2011 में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी की भी इस्लामाबाद में हत्या कर दी गई थी.

ये क़ानून कब से है?

धर्म से संबंधित आपराधिक मामलों को सबसे पहले ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1860 में संहिताबद्ध किया गया था और इसमें वर्ष 1927 में विस्तार किया गया.

विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसे अपना लिया.

पाकिस्तान में ज़िया-उल हक़ की सैन्य सरकार के दौरान 1980 से 86 के बीच इसमें और धाराएं शामिल की गईं. वे उनका इस्लामीकरण करना चाहते थे और वर्ष 1973 में अहमदी समुदाय को ग़ैर-मुस्लिम समुदाय घोषित किया गया था और वो इसे क़ानूनी तौर पर अलग करना चाहते थे.

ये क़ानून क्या कहता है?

ईसाई

आसिया बीबी की सज़ा के खिलाफ़ ईसाई समूदाय ने विरोध प्रदर्शन किया था.

ब्रितानी शासनकाल के दौरान बनाया गया ये आम क़ानून था. इसके तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी पूजा करने की वस्तु या जगह को नुकसान या फिर धार्मिक सभा में खलल डालता है तो उसे दंड दिया जाएगा. साथ ही अगर कोई किसी की धार्मिक भावनाओं का अपमान बोलकर या लिखकर या कुछ दृष्यों से करता है तो वो भी गैरक़ानूनी माना गया.

इस क़ानून के तहत एक से 10 साल तक की सज़ा दी सकती थी जिसमें जुर्माना भी लगाया जा सकता था. वर्ष 1980 की शुरुआत में पाकिस्तान की दंड संहिता में धार्मिक मामलों से संबंधित अपराधों में कई धाराएं जोड़ दी गईं.

इन धाराओं को दो भागों में बांटा गया- जिसमें पहला अहमदी विरोधी क़ानून और दूसरा ईशनिंदा क़ानून शामिल किया गया.

अहमदी विरोधी क़ानून 1984 में शामिल गया था. इस क़ानून के तहत अहमदियों को खुद को मुस्लिम या उन जैसा बर्ताव करने और उनके धर्म का पालन करने पर प्रतिबंध था.

ईशनिंदा क़ानून को कई किश्तों में बनाया गया और उसका विस्तार किया गया. वर्ष 1980 में एक धारा में कहा गया कि अगर कोई इस्लामी व्यक्ति के खिलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करता है तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है.

वहीं वर्ष 1982 में एक और धारा में कहा गया कि अगर कोई व्यक्ति कुरान को अपवित्र करता है तो उसे उम्रकैद की सज़ा दी जाएगी. वर्ष 1986 में अलग धारा जोड़ी गई जिसमें ये कहा गया कि पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा के लिए दंडित करने का प्रावधान किया गया और मौत या उम्र कैद की सज़ा की सिफारिश की गई.

इस क़ानून से कौन प्रभावित हो रहा है?

पाकिस्तान का मानवाधिकार आयोग यानी एचसीआरपी ईशनिंदा से जुड़े मामलों पर दस्तावेज़ तैयार कर रहा है. आयोग का कहना है कि जिन लोगों पर इस क़ानून के तहत आरोप लगाए गए हैं उनमें मुसलमानों की संख्या ज्यादा है जिसके बाद अहमदी समुदाय से जुड़े मामले आते हैं.

एचसीआरपी के अनुसार वर्ष 1988 से कुरान को अपवित्र करने के 1000 मामले दर्ज किए गए हैं जबकि ईशनिंदा के 50 मामले सामने आए हैं. पाकिस्तान में निचली अदालतों में आए सैकड़ों मामलों में ईश-निंदा के लिए लोगों को सज़ा सुनाई गई लेकिन हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव, छानबीन की प्रक्रिया में कमी या शिकायकर्ता की गलत मंशा को देखते हुए फैसलों को पलट दिया.

इसमें से सैकड़ों ईसाई हैं जिनपर आरोप लगाए गए हैं. इनमें से कम से कम 12 को ईश-निंदा मामले में मौत की सज़ा तक सुनाई गई है.

क्या इन्हें निष्पक्षतौर पर लागू किया जा रहा है?

धार्मिक पार्टियां

पाकिस्तान में धार्मिक पार्टियां ईश-निंदा का विरोध करती है

निचली अदालतों के सामने अगर अहमदी समुदाय या ईशनिंदा का कोई मामला सामने आता है तो जजों पर दबाव होता है वो सज़ा सुनाए. लेकिन ज्यादातर मामलों में उच्च न्यायलयों में जाकर फैसले पलट जाते हैं और कई बार दोषियों को छोड़ दिया जाता है.

इसका एक कारण ये होता है कि संगठित धार्मिक समूह उच्च अदालतों के जजों की तुलना में निचली अदालतों के जजों को आसानी से प्रभावित कर लेते हैं.

दूसरा मानवाधिकार समूहों का कहना है कि ज्यादातर मामले आपसी दु्श्मनी का नतीजा होते है और उच्च न्यायलय में ऐसे मामले जैसे ही जाते ही उनकी आसानी से कलई खुल जाती है.

क़ानून के जानकारों का कहना है कि ईशनिंदा के तहत दोषी ठहराया जाना आसान होता है क्योंकि इसमें अपराध और भावना के बीच संबंध बताने की जरुरत नहीं होती.

क्या पाकिस्तान में लोग इस क़ानून का समर्थन करते हैं?

पाकिस्तान में एक बड़ा तबका ईशनिंदा के लिए दंड दिए जाने के विचार का समर्थन करता है लेकिन धर्मग्रंथ क्या कहते है उन्हें इस बारे में बहुत कम जानकारी है.

हाल ही में जो घटनाएं सामने आई है उससे पता चलता है कि ज्यादातर लोग ये मानते है जनरल जिया-उल-हक के शासनकाल में जो क़ानून संहिताबद्ध किया गया था वो सीधा कुरान से लिया गया है और उसे किसी व्यक्ति ने नहीं बनाया है.

संशोधन करने को लेकर क्यों है अनिच्छुक प्रशासन?

शेरी रहमान ने क़ानून में संशोधन के लिए निजी बिल पेश किया था

पाकिस्तान में करीब सभी गैर-इस्लामी पार्टियों के एजेंड़े में ईशनिंदा क़ानून में संशोधन करना शामिल है लेकिन अभी तक किसी भी पार्टी ने इसमें संशोधन लाने को लेकर कोई प्रगति नहीं की है.

सैद्धांतिक तौर पर इसलिए क्योंकि ये एक संवेदनशील मामला है और कोई भी बड़ी पार्टी धार्मिक पार्टियों से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहती. इन धार्मिक पार्टियों ने कई मौको पर ये साबित किया है कि वे बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ सड़को पर उतार सकते हैं.

सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सांसद शेरी रहमान ने वर्ष 2010 में ईशनिंदा क़ानून में संशोधन लाने के लिए निजी बिल पेश किया था. इस बिल में ईशनिंदा के अभियुक्तों के क़ानूनी अधिकारों को बेहतर करने का प्रस्ताव था. लेकिन बाद में इस बिल को वापस ले लिया गया था.

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