स्कूली बच्ची का तीन महादेशों का अनोखा सफ़र

डनुटा मैक्ज़का (फाइल फोटो )
Image caption डनुटा मैक्ज़का सैन्य ट्रक चलाती थीं और सैनिकों को रसद पहुंचाती थी.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 17 सितंबर 1939 को रूसी सेना जब पोलैंड में दाख़िल हुई तो उसके साथ ही एक स्कूली बच्ची डनुटा मैक्ज़का के अनोखे सफ़र की शुरुआत हुई.

वो हमला पोलैंड के लिए एक ऐसी जंग की शुरूआत थी जिसमें लाख़ों लोग मारे गए और लाखों लोग दुनिया भर में शरणार्थी की तरह रहने के लिए मजबूर हुए.

डनुटा मैक्ज़का की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वो आज अपनी ज़िंदगी के आठवें दशक में हैं लेकिन पोलैंड के फ़ार्महाउस से लेकर साइबेरिया के कैंप और फिर दुनिया भर के कई देशों के रास्ते होते हुए लंदन तक पहुंचने की दास्तान सचमुच में एक अनोखी दास्तान है.

डनुटा का जन्म पूर्वी पोलैंड के एक गांव में हुआ था जो कि अब यूक्रेन में है. सितंबर 1939 में डनुटा स्कूल में पढ़ती थीं लेकिन तभी द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और उनके जीवन ने एक नया मोड़ ले लिया.

Image caption अपने परिवार के साथ डनुटा (नीचे में दायीं तरफ़)

जर्मन सेना पश्चिमी पोलैंड में दाख़िल हो गई और रूसी सेना पूर्वी पोलैंड में घुस गई. रूसी ख़ुफ़िया एजेंट पोलैंड के सैनिकों को तलाशने लगे जिन्हें बाद में कैटिन के जंगलों में ख़ुफ़िया तरीक़े से मौत के घाट उतार दिया गया था.

डनुटा के परिवार को लगा कि शायद वे लोग बच जांएगें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फ़रवरी 1940 का वो दिन डनुटा को आज भी याद है जब सुबह छह बजे रूसी सैनिक उनके घर पहुंचे और घर के सभी लोगों को बाहर निकलने का आदेश दिया.

साइबेरिया

पोलैंड के सैंकड़ों नागरिकों के साथ डनुटा के परिवार को साइबेरिया के लेबर कैंप ले जाया गया. डनुटा ने वो सारी घटनाएं अपनी डायरी में लिख रखी हैं जिनसे पता चलता है कि उन्हें कारगो ट्रेन से साइबेरिया ले जाया गया था.

रास्ते में कई बच्चों की मौत हो गई. रूसी सुरक्षाकर्मी मृत बच्चे को ट्रेन की खिड़की से फेंक देते थे और अगर किसी बड़े व्यक्ति की मौत हो जाती थी तो ट्रेन के धीरे होने के बाद उनके शवों को उतार देते थे.

आख़िरकार डनुटा साइबेरिया के लेबर कैंप में पहुंची लेकिन उस जंगल में ना तो कोई जानवर था ना कोई आदमी, यहां तक की किसी परिंदे की आवाज़ भी सुनाई नहीं दे रही थी.

Image caption इटली में डनुटा मैक्ज़का की मुलाक़ात एक पोलिश सैनिक से हुई जिनसे उन्होंने बाद में शादी कर ली.

जैसे ही सर्दियों का मौसम आया डनुटा की बहन जोसिया बीमार पड़ गई और उसकी मौत हो गई.

जून 1941 में हिटलर ने तत्कालीन सोवियत रूस पर हमला कर दिया. अब पूरी तस्वीर बदल चुकी थी. रूसी सैनिक के क़ब्ज़े में रह रहे पोलिश लोग अब उनके सहयोगी बन गए थे.

उन्हें विकल्प दिया गया कि वे चाहें तो रूस की सेना में शामिल हो जांए या फिर निर्वासन में अपनी सेना का गठन करें.

पोलिश लोगों ने जनरल एंडर्स की कमान में अपनी सेना का गठन किया और उज़बेकिस्तान की ओर कूच कर गए लेकिन रास्ते में हज़ारों लोग बीमरी के कारण मर गए.

इस बीच डनुटा 18 साल की हो गई थी और वो भी सेना में शामिल हो गई.

जनरल एंडर्स की सेना कोई आधुनिक सेना की तरह नहीं थी क्योंकि उनके साथ हज़ारों औरतें, बच्चे और बूढ़े भी शामिल थे.

ईरान

उनकी सेना मघ्य एशिया होते हुए ईरान पहुंची जहां ब्रितानी सेना से उनकी मुलाक़ात हुई. ईरान के बाद वे लोग उत्तरी अफ़्रीक़ा की तरफ़ कूच कर गए.

डनुटा उन 800 पोलिश महिलाओं में से थीं जो सेना के ट्रकों को चलाती थीं और पूरे फलस्तीन में पोलिश और ब्रितानी सेना को रसद पहुंचाती थीं.

Image caption लंदन के अपने घर में डनुटा मैक्ज़का

उन दिनों को याद करते हुए डनुटा कहती हैं, ''मैं बहुत छोटी थी इसलिए मैं एक कंबल के ऊपर बैठती थी ताकि ट्रक का पहिया मुझे दिखाई दे सके. पुरूष हम महिलाओं को ट्रक चलाते देख काफ़ी आश्चर्यचकित होते थे.''

पोलैंड के बहुत सारे यहुदी फलस्तीन में ही बस गए लेकिन डनुटा दूसरे सैनिकों के साथ 1943 में इटली चलीं गईं.

इटली

इटली में डनुटा की मुलाक़ात एक पोलिश सैनिक से हुई जिनसे उन्होंने बाद में शादी की और यहीं उनके लिए युद्ध समाप्त हो गया.

हज़ारों पोलिश नागरिकों के साथ डनुटा इटली से ब्रिटेन पहुंची जहां उनकी मुलाक़ात उनके भाई और मां-बाप से हुई.

युद्ध समाप्त होने के बाद कई लोग पोलैंड अपने घरों को वापस चले गए लेकिन पोलैंड अब रूसी यूक्रेन बन चुका था इसलिए बहुत से लोग ब्रिटेन में ही रुक गए.

जनरल एंडर्स भी लंदन में बस गए. डनुटा भी अपने परिवार के साथ लंदन में ही बस गईं. उन्होंने अपने घर में ढेर सारे प्लांट लगाएं हुए हैं जो उन्हें पोलैंड के फ़ार्महाउस की याद दिलाते हैं जो उन्होंने 70 साल पहले छोड़ा था.

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