मनमोहन के भाषण के विरोध में कपड़े उतारे

 शनिवार, 22 सितंबर, 2012 को 13:46 IST तक के समाचार

शनिवार को विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण के दौरान एक व्यक्ति ने हंगामा किया. विशिष्ट सुरक्षा ज़ोन में पहुंचे इस व्यक्ति ने अपनी शर्ट उतार कर प्रधानमंत्री के बयान का विरोध करते हुए उस पर टीका-टिप्पणी करनी चाही.

प्रधानमंत्री जैसे ही विज्ञान भवन में अपना भाषण देने के लिए आगे बढ़े इस व्यक्ति ने अपनी शर्ट उताकर नारे लगाने शुरु कर दिए. वह कह रहा था, 'भ्रष्ट प्रधानमंत्री वापस जाओ, डीज़ल पर मूल्य वृद्धि वापस लो.'

प्रधानमंत्री के विशेष सुरक्षा दस्ते ने इस व्यक्ति को तुरंत ही पकड़ लिया और अपने साथ ले गए. इस बात की जांच की जा रही है कि यह व्यक्ति सभागार के भीतर कैसे पहुंचा और उसकी पृष्ठभूमि क्या है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक इस व्यक्ति का नाम संतोष कुमार है और ये पेशे से वकील हैं.

जमकर बरसी जनता

इससे पहले विदेशी निवेश और बढ़ती महंगाई पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से शुक्रवार को दिए गए राष्ट्र-संबोधन पर भी जनता और विपक्ष ने कई तल्ख़ टिप्पणियां की थीं.

मनमोहन सिंह ने एफ़डीआई से जुड़े फैसले पर सफ़ाई देते हुए कहा कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते और आर्थिक विकास के लिए कड़े क़दम उठाने पड़ते हैं. लेकिन मनमोहन की इस सफाई से न विपक्ष संतुष्ट नज़र आ रहा है न ही जनता. ट्विटर पर प्रधानमंत्री के बयान को लेकर ही नहीं मुलायम सिंह के रवैये पर भी जनता जमकर बरसी है.

"अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने देश को गुमराह किया है. इसमें वो दूसरे देशों के हितों की वकालत करते दिखे न कि भारतीयों के हितों की, जिनका वे नेतृत्व करते हैं"

मुख्तार अब्बास नकवी, भाजपा नेता

ट्विटर अकाउंट पर अविनाश भट्ट लिखते हैं- ‘प्रधानमंत्री ने सही कहा कि वास्तव में पैसे पैड़ों पर नहीं उगते, ये या तो जमीन के नीचे कोयले में होते हैं, या फिर हवा में टू जी स्पेक्ट्रम के रूप में.’

शुभांकर मुखर्जी लिखते हैं, ‘प्रधानमंत्री जी, पैसे पेड़ों पर नहीं उगते हैं तो हम विदेशी हवाई कंपनियों को ज्यादा सब्सिडी क्यों दे रहे हैं.’

लॉफिंग गैस नाम के ट्विटर अकाउंट पर प्रतिक्रिया है, ‘टीवी पर प्रधानमंत्री मुद्दों को मेज के ऊपर रखते हैं जबकि दूसरे विवरणों के लिए मेज के नीचे देखते हैं.’

ट्विटर पर प्रशांत भट्ट- ‘मुलायम सिंह डीजल कीमतों के विरोध में आयोजित रैली में भाग लेते हैं और संसद में सरकार का समर्थन करते हैं. वो भारतीय राजनीति के सबसे बड़े ग़जनी....’

योगेश कोकाते- ‘सांप्रदायिक शक्तियों को बाहर रखने के लिए मुलायम सिंह को यूपीए सरकार का समर्थन करना पड़ रहा है. अरे....सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय क्या सांप्रदायिक शक्तिया हैं?

मनमोहन के संबोधन पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं आर्थिक मामलों के जानकार भरत भूषण कहते हैं कि हैं कि प्रधानमंत्री का भाषण तो वैसे भी प्रभावशाली नहीं हो सकता था क्योंकि वो प्रभावशाली वक्ता नहीं हैं. अपने भाषण में वो खुद को प्रधानमंत्री के रूप में कम और अर्थशास्त्री के रूप में ज्यादा पेश कर रहे थे.

"संबोधन के वक्त टीवी पर हमने देखा तो साफ़ मालूम पड़ रहा था जैसे इस व्यक्ति जनता के साथ कोई वास्ता नहीं है. बिल्कुल रोबोट की तरह से उन्होंने अपना भाषण पढ़ा. वो समाज के मध्यम वर्ग को अपना वोट बैंक समझते हैं और उसी को ध्यान में रखकर उनका भाषण था. अब ये अलग बात है कि मध्यम वर्ग को अपनी बात समझाने में वो कितना सफल रहे."

भरत भूषण, वरिष्ठ पत्रकार

वो कहते हैं, ''संबोधन के वक्त टीवी पर हमने देखा तो साफ़ मालूम पड़ रहा था जैसे इस व्यक्ति जनता के साथ कोई वास्ता नहीं है. बिल्कुल रोबोट की तरह से उन्होंने अपना भाषण पढ़ा. वो समाज के मध्यम वर्ग को अपना वोट बैंक समझते हैं और उसी को ध्यान में रखकर उनका भाषण था. अब ये अलग बात है कि मध्यम वर्ग को अपनी बात समझाने में वो कितना सफल रहे.''

एफ़डीआई पर राजनीति

इस बीच प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री ने देश को गुमराह किया है. भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, ''अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने देश को गुमराह किया है. इसमें वो दूसरे देशों के हितों की वकालत करते दिखे न कि भारतीयों के हितों की, जिनका वे नेतृत्व करते हैं.”

प्रधानमंत्री ने शुक्रवार को अपने भाषण में कहा था कि पैसे पेड़ों पर नहीं उगते हैं, उनके लिए निवेश जैसे उपाय करने पड़ते हैं.

वहीं जनता दल यूनाइटेड का कहना है कि आर्थिक सुधार के नाम पर प्रधानमंत्री देश में भ्रम फैला रहे हैं.

पार्टी प्रवक्ता शिवानंद तिवारी के मुताबिक, “हर व्यक्ति को मालूम है कि पेट्रोल और डीजल का एक बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है. लेकिन क्या सरकार बता सकती है कि इनकी खपत कम करने के लिए सरकार ने क्या उपाय किए हैं.”

प्रधानमंत्री के वक्तव्य की वाम दलों ने भी काफी आलोचना की है. सीपीएम नेता प्रकाश करात कहते हैं, “प्रधानमंत्री ने उन कदमों के बचाव की कोशिश की है जिनका बचाव करना मुमकिन नहीं है. उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि उन्होंने जो कदम उठाए हैं उन पर आगे अमल कैसे करेंगे, जबकि संसद में उनके पास बहुमत ही नहीं है.”

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