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सोमवार, 25 जुलाई, 2005 को 13:30 GMT तक के समाचार
 
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देशी और विदेशी मीडिया का फ़र्क
 

 
 
मनमोहन सिंह
मनमोहन सिंह ने संबोधित किया अमरीकी संसद को
1990-91 की बात है. मंडल विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था. उन्हीं दिनों पहली बार मुझे भारतीय संसद को अंदर से देखने का मौक़ा मिला.

अंदर एक सांसद जो अभी भी सरकार में हैं ज़ोर-ज़ोर से चीख रहे थे, कुछ क्लास रूम की पिछली सीट पर बैठे छात्रों की तरह हुड़दंग मचा रहे थे और एक तो बिल्कुल रेलवे स्टेशन पर 'चाय गरम' वाले अंदाज़ में बैठ जाइए श्रीमान की गुहार लगा रहे थे.

पत्रकारिता में आने के बाद संसद जाने के और भी मौक़े मिले लेकिन एक छात्र के रूप में जो मनोरंजन पहली बार हुआ उसकी तस्वीर बिल्कुल खींची हुई है. अब आइए फ़ास्ट फ़ारवर्ड करता हूं इस कहानी को.

साल 2005, शहर—वाशिंगटन डीसी, अवसर—प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमरीका यात्रा. बीबीसी की ओर से पहुँचा इस यात्रा की ख़बर आप तक पहुँचाने.

देशी और विदेशी का फ़र्क

बातों और मुलाक़ातों के अलावा प्रधानमंत्री की इस यात्रा की ख़ास बात थी अमरीकी संसद के संयुक्त अधिवेशन के सामने उनका भाषण.

वहाँ प्रवेश के लिए मीडिया पास की ज़रूरत थी, तो मैं पहुंचा प्रधानमंत्री के साथ आए भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के पास.

टका सा जवाब मिला हम आपको पास नहीं दे सकते. आप विदेशी मीडिया हैं. अरे जनाब मीडिया में देशी और विदेशी क्या और वो भी जब लगभग डेढ़ करोड़ भारतवासी हमें सुनते हों तो फिर ये लकीर कैसी.

लेकिन सरकारी बाबू ने जब एक बार फ़ाइल के ऊपर लाल फ़ीता बांध दिया तो फिर उसे ब्रह्मा ही खोल सकते हैं.

सोच रहा था सोनिया गांधी केवल 20-25 साल में भारत की प्रधानमंत्री की कुर्सी के क़रीब पहुंच गईं लेकिन बीबीसी हिंदी जो सालों से वहाँ मौजूद है उसे अभी भी विदेशी माना जा रहा है.

लेकिन भला हो उन अधिकारियों का क्योंकि उसी बहाने मैं कुछ ऐसी चीज़े देख पाया जो वैसे नहीं देख पाता.

अब इतनी दूर से गया था वॉशिंगटन और भारतीय प्रधानमत्री के भाषण का हाल सीधा आप तक अमरीकी संसद के भीतर से नहीं पहुँचाता तो सब कुछ व्यर्थ था.

भाग-दौड़

बचे हुए थे बस कुछ ही घंटे. बीबीसी के वॉशिंगटन ब्यूरो ने मदद की और वहाँ के प्रमुख ने कहा चिंता मत करो. थोड़ी दौड़-भाग करनी होगी लेकिन पास मिल जाएगा.

कैपिटॉल हिल के मीडिया सेल ने मदद की

एक चिठ्ठी देकर उन्होंने मुझे भेज दिया सीधा अमरीकी संसद दि कैपिटॉल के मीडिया सेल में. उमस भरी गर्मी, एक कंधे पर लैपटॉप, एक कंधे पर कैमरा और रिकॉर्डिंग यंत्र लटकाए हांफ़ता हुआ पहुँचा उस इमारत के सामने जहाँ से इन दिनों दुनिया चलाई जाती है.

कड़ी सुरक्षा और उस पर से मेरे पास तरह-तरह के उपकरण. पूरी जाँच पड़ताल हुई और फिर मीडिया सेल में प्रवेश मिला. बीबीसी के कारण दरवाज़े आराम से खुल रहे थे. और एक घंटे के अंदर एक कागज़ मिल भी गया. मैने पूछा कि क्या ये काफ़ी होगा.

ख़ूबसूरत आंखों वाली एक महिला ने कहा ये कागज़ लेकर ट्रेन से चले जाएँ एक पते पर और वहाँ आपको एक फ़ोटो आइकार्ड मिल जाएगा.

मेरे पीठ पर वज़न कुछ ज़्यादा ही था. मैने पूछा क्या टैक्सी नहीं जाएगी वहाँ. महिला ने मेरी परेशानी भांप ली, मुस्करा कर कहा चिंता मत कीजिए ये ट्रेन इसी इमारत के बेसमेंट से चलती है.

संसद के भीतर ट्रेन. ख़ैर वहाँ पहुँचा जहाँ वो ट्रेन आनी थी. खिलौनेवाली ट्रेन की तरह डब्बे और बाक़ायदा स्टेशन बने हुए. चारों ओर अमरीका के अलग-अलग राज्यों के झंडे और अमरीका के महान हस्तियों की मूर्तियाँ.

पांच मिनट में मैं अपनी मंज़िल पर था. एक अधिकारी से पूछा एक ही इमारत के अलग-अलग हिस्सों तक जाने के लिए ट्रेन की ज़रूरत क्यों.

उन्होने कहा ये इतना फैला हुआ है उसके बिना हम दिन भर चलते ही रह जाएँगे.

यदि आप दिल्ली से वाकिफ़ हैं तो समझ लीजिए की नॉर्थ ब्लाक और साउथ ब्लॉक से रेल भवन या शास्त्री भवन के लिए ज़मीन के अंदर-अंदर ये ट्रेन हैं और बाहर निकलकर पैदल या गाड़ी से जाने की कोई ज़रूरत ही नहीं. और हाँ बड़े बड़े अधिकारी भी इसका इस्तेमाल करते हैं.

तो फ़ोटो आइकार्ड मिल गया और प्रधानमंत्री का भाषण आप तक पहुँचा भी पाया. उनके साथ आई मीडिया टीम को जब इस ट्रेन के बारे में बताया तो वो भी चकित थे.

हिंदी की औकात?

लेकिन थोड़ा सा चकित मैं भी था भारतीय मीडिया के कुछ सदस्यों से मिलकर जिनसे सालों बाद मुलाक़ात हो रही थी. इनमें से कुछ मेरे संपादक रह चुके थे, कुछ ने साथ काम किया था.

लेकिन उन दिनों इनकी ज़ुबान से हिंदी शायद ही कभी निकलती थी, अंग्रेज़ी मीडिया के पत्रकार थे और नामीगिरामी अंग्रेज़ी स्कूलों में शिक्षा पूरी की थी.

वही पत्रकार धड़ल्ले से तो नहीं लेकिन अच्छी तरह समझ में आ जानेवाली हिंदी बोल रहे थे. मैने अपने एक पुराने संपादक से पूछा कि हिंदी अचानक इतनी फ़ैशनेबल कैसे हो गई.

उन्होंने कहा—यार ये हिंदी टेलीविज़न जो न करवाए. टीवी शोज़ में जाओ, और सवाल हिंदी में पूछे जाएँ तो जवाब हिंदी में ही देना पड़ता है न.

और अब तो मैं घर और दफ़्तर में भी हिंदी में ही बात करने की कोशिश करता हूं जिससे की प्रैक्टिस होती रहे. मैं बस इतना ही कह पाया—बढ़िया है.

 
 
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