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बुधवार, 14 सितंबर, 2005 को 18:13 GMT तक के समाचार
 
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संयुक्त राष्ट्र के 60 साल: कुछ उपलब्धियाँ, कई विफलताएँ
 

 
 
संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय
'चार्टर जिस समझौते के आधार पर बना वह विजयी राष्ट्रों को ही अहमियत देने वाला था'
आमतौर पर किसी व्यक्ति या संस्था के जीवन में 60 साल पूरा कर लेना एक बड़ी उपलब्धि समझी जाती है.

भारतीय परंपरा में तो षष्ठी पूर्ति का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ की 60वीं सालगिरह पर कोई ख़ास उत्साह नज़र नहीं आने से मन में कुछ सवाल उठते ही हैं.

इस अंतरराष्ट्रीय संस्था के बारे में आम आदमी की राय यही है कि यह सठिया गई है और आज के ज़माने के मनमाफ़िक नहीं है. न ही उसकी ज़रूरतों को पूरा कर पाने में शारीरिक या मानसिक रूप से समर्थ है.

किसी भी ऐसे नतीजे पर पहुँचने की जल्दबाज़ी से पहले संयुक्त राष्ट्र के जन्म से अब तक के काम के लेखे-जोखे की पड़ताल की ज़रूरत है.

इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि इस संस्था का जन्म उस वक्त हुआ था जब मित्र राष्ट्र द्वितीय विश्वयुद्ध में विजय की दहलीज़ तक पहुँच चुके थे और शांति स्थापित होने के बाद नई दुनिया का चेहरा तराशने की कोशिश कर रहे थे.

किसका संगठन?

संयुक्त राष्ट्र संगठन का चार्टर जिस अटलांटिक समझौते के आधार पर तय किया गया, वह विजेताओं के राष्ट्र को ही अहमियत देने वाला था.

आदर्शवादी शब्दों का भरपूर प्रयोग इस बात को धुंधलाने में असमर्थ रहा कि इस प्रयास में दुनिया के बहुसंख्यकों की कोई हिस्सेदारी नहीं थी.

न पराजित देशों और न ही उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्षरत मानवता की, जो उस समय तक आज़ादी से वंचित थी.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
आमसभा की सदस्यता तो खुली थी पर सभी महत्वपूर्ण निर्णय सुरक्षा परिषद में ही लिए जाते

यह अचरज की बात नहीं कि संस्था का जो रूप उभर कर आया, वो समतापोषित नहीं था बल्कि ग़ैरबराबरी को सैद्धांतिक जामा पहनाकर प्रतिष्ठित करने वाला ही था.

आमसभा की सदस्यता सभी के लिए खुली थी पर सभी महत्वपूर्ण निर्णय सुरक्षा परिषद द्वारा ही लिए जा सकते थे जिसके पाँच स्थायी सदस्यों को वीटो का निषेधाधिकार प्राप्त था.

दूसरे शब्दों में इन पाँच बड़ी ताकतों में से कोई भी एक वीटो के द्वारा गतिरोध पैदा कर सकती थी.

असंतुलित शुरुआत

इन पाँचों में सभी की स्थिति एक जैसी नहीं थी. ब्रिटेन और फ़्रांस 1945 में ख़स्ताहाल थे और राष्ट्रवादी चीन गृहयुद्ध में बुरी तरह फंसा था.

अमरीका और सोवियत संघ युद्ध समाप्त होते ही एक दूसरे के बैरी बनकर आमने-सामने खड़े थे.

एटमी हथियारों ने शक्ति के संतुलन को आतंक के संतुलन में बदलकर शीतयुद्ध को आरंभ कर दिया था.

इस घटनाक्रम ने संयुक्त राष्ट्र संगठन की संभावनाओं को बुरी तरह से सीमित कर दिया और इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर ही हमें संयुक्त राष्ट्र संगठन का मूल्यांकन करना चाहिए.

मध्यपूर्व में फ़िलिस्तीनी-इज्राइली संघर्षों या फिर हिंद-चीन में मुक्ति संग्राम, दोनों ही रणक्षेत्रों में अमरीका और सोवियत संघ के अलग-अलग पक्षों को समर्थन देने के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ किसी भी रक्तरंजित मुठभेड़ में सार्थक हस्तक्षेप करने में असमर्थ रहा.

1954 का जिनेवा सम्मेलन हो या फिर 1956 में सुयेज संकट, इन मोर्चों पर भी दुनिया को इस संस्था से निराशा ही मिली.

 कोरिया में ज़रूर युद्धविराम के लिए संयुक्त राष्ट्र सफल रहा पर इसका श्रेय गुटनिरपेक्ष देशों को जाता है. लेकिन स्थायी सदस्यों ने इसे अपने विशेषाधिकारों का उल्लंघन माना और दोबारा आमसभा को ऐसा मौका नहीं दिया
 
प्रोफेसर पुष्पेश पंत

दक्षिण एशिया में भारत-पाक विवाद को दूर करने या तनाव घटाने में भी कोई पहल संयुक्त राष्ट्र संगठन नहीं कर सका.

विफलताएँ

विफलताएँ की सूची काफ़ी लंबी है. मध्यपूर्व हो या ईरान अथवा ताइवान, प्रारंभिक दौर में ही इसकी लाचारी जगजाहिर हो गई थी.

कोरिया में ज़रूर युद्धविराम के लिए संयुक्त राष्ट्र सफल रहा पर इसका श्रेय गुटनिरपेक्ष देशों द्वारा प्रेरित जनरल एसेंबली के युनाइटिंग फ़ॉर पीस वाले प्रस्ताव को दिया जाना चाहिए जिसने संयुक्त राष्ट्र के गतिरोध को मौलिक सूझ से तोड़ने का प्रयत्न किया था.

इन प्रयासों को सुरक्षा परिषद की गद्दीनशीन ताकतों ने अपने विशेषाधिकारों का उल्लंघन समझा और इसके बाद दोबारा आमसभा को ऐसा मौका नहीं दिया.

1960 के दशक में कांगो संकट निवारण का एक बड़ा अभियान संयुक्त राष्ट्र संगठन ने चलाया पर यह नवोदित देश को अनावश्यक नरसंहार और विभाजन से नहीं बचा पाया.

इसने संस्था को दिवालिएपन की कगार तक पहुँचा दिया औऱ इसके प्रशासनिक सुधार की माँग तेज़ी पकड़ने लगी.

क्यूबा मिज़ाइल संकट के बाद सोवियत संघ और अमरीका के बीच हॉटलाइन स्थापित हुई और धीरे-धीरे तनाव कमज़ोर होना शुरू होने के कारण यह संस्था हाशिए पर पहुँच गई.

आज संयुक्त राष्ट्र संगठन की छवि एक ऐसी फिज़ूलखर्च नौकरशाही की है जो सिर्फ़ करमुक्त और सुविधा संपन्न स्वार्थो को निरापद रखने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देती है.

महासचिव का पद गरिमामय ज़रूर है पर जिस व्यक्ति की नियुक्ति इसपर हती है उसे सर्वसम्मति हासिल करने के चक्कर में लगभग बधिया बनाकर सिंहासन पर बैठाया जा सकता है.

अफ्रीका में ग़रीबी और भूख झेलते लोग
पिछले एक दशक में ग़रीबी और बढ़ी है और कई देशों में लोग भूख, ग़रीबी से मर रहे हैं

किसी महाशक्ति को नाराज़ करने का ख़तरा न तो महासचिव उठा सकता है और न उसकी संस्था.

उपलब्धियाँ

पर इन सबके अलावा इसकी कुछ उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं.

संयुक्त राष्ट्र के कुछ विभाग विशेष एजेंसियों के रूप में जाने जाते हैं. जैसे यूनेस्को, यूनिसेफ़, विश्व स्वास्थ्य संगठन, आईएलओ, एफ़एओ.

इन्होंने दुनियाभर में आम इंसान की ज़िंदगी को बेहतर बनाने का काम सार्थक ढंग से किया है.

दरिद्रतम देशों को इनके माध्यम से ज़रूरी आर्थिक और तकनीकी सहायता मिल सकी है.

संयुक्त राष्ट्र संगठन ने कुछ ऐसे विषयों पर सरकारों और जनता का ध्यान आकर्षित किया है, जो इसके अभाव में अछूते उपेधित ही रह जाते.

मानवाधिकारों का मुद्दा इनमें से एक है और पर्यावरण का दूसरा. इसके अलावा लिंगभेद दूर करने, शरणार्थी समस्या समाधान और एटमी हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए संवाद को जारी रखने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

आज जब संयुक्त राष्ट्र संगठन के ढांचे में और इसकी कार्यशैली में आमूलचूक परिवर्तन करने की बात ज़ोर पकड़ रही है, बहुत निराश होने की ज़रूरत नहीं है.

अबी यह संभावना शेष है कि साठा अपने को पाठा साबित कर दिखाए.

 
 
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