BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
 
गुरुवार, 22 सितंबर, 2005 को 00:10 GMT तक के समाचार
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
महाशक्ति के मज़लूम नागरिक
 

 
 
ब्रांक्स
ब्रांक्स में आकर आपको लगता ही नहीं कि आप अमरीका में हैं
न्यूयॉर्क शहर के सबसे ग़रीब इलाक़े ब्रांक्स के एक फ़ुटपाथ पर रोज़ाना दोपहर को लोगों की क़तार लगनी शुरू हो जाती है.

यहाँ दुनिया के सबसे अमीर देश में समाज के हाशिए पर रहने वाले ऐसे लोग भोजन की तलाश में आते हैं, जिनके पास न घर है, न रोज़गार और न ही इतने पैसे कि खाना-कपड़ा ख़रीद सकें.

न्यूयॉर्क की चमचमाती हुई गगनचुम्बी इमारतों वाले दौलतमंद इलाक़े मैनहटन से आधे घंटे की दूरी तय करके ब्रांक्स पहुँचने पर ये कल्पना करना भी मुश्किल हो जाता है कि ये इलाक़ा विश्व की एकमात्र महाशक्ति का ही एक हिस्सा है.

यहाँ पिछले पच्चीस साल से पार्ट ऑफ़ द सॉल्यूशन या पॉट्स नाम का संगठन ग़रीब और मज़लूमों को मुफ़्त खाना मुहैया करवाता है.

भोजनालय में छह-सात मेज़ें और कुर्सियाँ लगी हुई हैं और लोग बारी-बारी से भोजन करके जाते हैं.

मजबूरी

बाहर पंक्ति में खड़े दुबले पतले इक्यावन साल के माइक कहते हैं कि उनके लिए पॉट्स में आना एक तरह की मजबूरी है.

माइक ने किंचित संकोच के साथ कहा, “आप देख ही रहे हैं कि मैं कोई भारी भरकम आदमी नहीं हूँ. लेकिन जीवित रहने के लिए मुझे यहाँ आना ही पड़ता है क्योंकि इतना पैसा तो मेरे पास है नहीं कि खाना खा सकूँ”.

इंजीनियरिंग पढ़े-लिखे एक नौजवान अपना नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बातचीत के लिए राज़ी हुए.

 आप देख ही रहे हैं कि मैं कोई भारी भरकम आदमी नहीं हूँ. लेकिन जीवित रहने के लिए मुझे यहाँ आना ही पड़ता है क्योंकि इतना पैसा तो मेरे पास है नहीं कि खाना खा सकूँ
 
माइक

पूछे जाने पर कि पढ़े लिखे होने के बावजूद उन्हें भोजन करने के लिए इस सदाव्रत में क्यों आना पड़ता है, उन्होंने कहा कि नशे की लत ने उन्हें घर से बेघर कर दिया.

उन्होंने कहा, “ये एक बहुत बड़ा मिथक है कि अमरीका में आकर कोई भी अमीर हो जाता है. शेयर बाज़ार में अमीर लोग अरबों डॉलर का घोटाला करते हैं और पकड़े जाने पर उन्हें थोड़ी-बहुत सज़ा होती है. लेकिन अगर कोई ग़रीब आदमी अपना घर चलाने के लिए मजबूरी में छोटी मोटी चोरी करता है तो उसे पच्चीस साल के लिए जेल भेज दिया जाता है.”

पॉट्स चलाने वाली मेरी ऐलिस ने बताया कि कोई भी व्यक्ति भोजन करने के लिए आ सकता है. किसी से कोई सवाल नहीं किया जाता और न ही उनकी पहचान के बारे में ही जानकारी ली जाती है.

उन्होंने कहा कि अफ़्रीक़ी-अमरीकी, लातीनी अमरीकी, पूर्वी यूरोपीय सहित सभी तरह के लोग यहाँ खाने के लिए आते हैं.

मेरी ने कहा, “इन सभी लोगों की एक ही पहचान है – ग़रीबी और भूख.”

दो संसार

मैनहटन और ब्रांक्स के अंतर को इस तरह समझा जा सकता है कि अगर मैनहटन उत्तरी ध्रुव है तो ब्रांक्स दक्षिणी ध्रुव.

 हम जानते हैं कि हम दुनिया के सबसे अमीर देश में रहते हैं, हम ये भी जानते हैं कि हम दुनिया के सबसे अमीर शहरों में से एक में रहते हैं. लेकिन हमारे लोगों को बिलकुल भुला दिया गया है
 
मेरी एलिस

अगर मैनहटन में गगनचुंबी इमारतें और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का राज है तो ब्रांक्स़ में ग़रीब मोहल्ले हैं, सड़कों पर फैली गंदगी है, नशे की लत के शिकार लोग हैं और अपराध का विस्तार है.

अमरीका के जनगणना विभाग के आंकड़ों के मुताबिक़ ये न्यूयॉर्क का सबसे ग़रीब इलाक़ा है जहाँ 22 प्रतिशत लोग ग़रीबी की रेखा से नीचे रहते हैं.

यहाँ पहुँचते ही सबसे पहले सवाल दिमाग़ में आता है कि तरक़्क़ी की रफ़्तार में जो देश सबसे आगे है, उसके कुछ लोग आख़िर क्यों पिछड़ गए?

कठिन सवाल

लोगों को भोजन मुहैया करवाने वाले संगठन पॉट्स में काम करने वाली मेरी ऐलिस इसके लिए सरकारी नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराती हैं.

लंगर
भूखे और ग़रीब लोगों का सहारा है 'पॉट्स' का लंगर

उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि हम दुनिया के सबसे अमीर देश में रहते हैं, हम ये भी जानते हैं कि हम दुनिया के सबसे अमीर शहरों में से एक में रहते हैं. लेकिन हमारे लोगों को बिलकुल भुला दिया गया है.”

मेरी पिछले दस साल से पॉट्स संगठन से जुड़ी हुई हैं. उनका मानना है कि अमरीका में अमीर लगातार अमीर होते जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर ग़रीबों की संख्या बढ़ती जा रही है.

अमरीका की सरकार की ओर से जारी किए गए 2004 के आंकड़ों को देखें तो क़रीब चार करोड़ अमरीकी नागरिक ग़रीबी में जी रहे हैं.

चक्रवात प्रभावित लुईज़ियाना में 23 प्रतिशत, मिसीसिपी में 22 प्रतिशत और अलाबामा में 16 प्रतिशत लोग ग़रीब हैं.

लेकिन विकासशील देशों से तुलना की जाए तो अमरीका की ग़रीबी कुछ दूसरी तरह की है.

मेरी ने इसे समझाते हुए कहा, “विकासशील देशों में लोग ग़रीबी को अपनी क़िस्मत मानकर स्वीकार कर लेते हैं. लेकिन यहाँ के ग़रीब अपनी स्थिति को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. इसलिए वो हमेशा ग़ुस्से में भरे रहते हैं.”

 
 
इससे जुड़ी ख़बरें
 
 
इंटरनेट लिंक्स
 
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
 
सुर्ख़ियो में
 
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
 
  मौसम |हम कौन हैं | हमारा पता | गोपनीयता | मदद चाहिए
 
BBC Copyright Logo ^^ वापस ऊपर चलें
 
  पहला पन्ना | भारत और पड़ोस | खेल की दुनिया | मनोरंजन एक्सप्रेस | आपकी राय | कुछ और जानिए
 
  BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>