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सोमवार, 04 सितंबर, 2006 को 13:56 GMT तक के समाचार
 
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...मुकम्मिल जहाँ नहीं मिलता...
 

 
 
जामुन
नमक मिली जामुन का मज़ा यहाँ कहाँ
लंदन में बसे कुछ ऐसे भारतीयों से भी मुलाक़ात होती रहती है जो तीन या चार साल में एक बार ही स्वदेश जा पाते हैं.

ज़ाहिर है पूरे परिवार को लेकर जाना और रुपयों में सोचें तो लाख से ऊपर का ख़र्च. सोच-समझ कर ही कार्यक्रम बन सकता है.

मैं सौभाग्यशाली हूँ कि चाहे दफ़्तर के काम से ही हो, मेरा नियमित रूप से भारत जाना हो पाता है.

लंदन में बसे आठ साल होने को आए लेकिन अब भी भारत में बहुत कुछ ऐसा है जो यहाँ नसीब नहीं.

फलों की दुकानें सजी होती हैं, लेकिन कहाँ हैं फ़ालसे या जामुन? तरह-तरह के जूस हैं लेकिन गन्ने का रस..?

भुट्टे यहाँ उबाल कर खाए जाते हैं. कोयले पर भुने सोंधीं ख़ुशबू वाले भुट्टों को दिल तरस कर रह जाता है. (एक जगह है ईलिंग रोड जहाँ ऐसे भुट्टे मिलते हैं. एक पाउंड का एक यानी 85 रुपये का एक भुट्टा और आने-जाने का किराया अलग).

फिर, यहाँ के पॉपकॉर्न में वह मज़ा कहाँ जो रेत में भूने गए मक्का के दानों में है.

सड़क पर खड़े हो कर कैंडी फ़्लॉस खाई जा सकती है (हम उसे बुढ़िया के बाल कहते थे), लेकिन एक-एक करके परोसे जा रहे गोलगप्पे कहाँ!

हालाँकि कितनी दुखद बात है कि भारत में भी महानगरों में रहने वाले कुछ लोग सब होते हुए भी इन सब चीज़ों से महरूम हैं. फ़ैशन की डिमांड तो कुछ और ही है न!

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शान का मामला है...

बीबीसी कार्यालय के क़रीब है होबर्न ट्यूब स्टेशन. मेरा रोज़ का आना-जाना इसी स्टेशन से है.

होबर्न ट्यूब स्टेशन
अमीर-ग़रीब सबकी सवारी है ट्यूब

अभी कुछ दिन पहले की बात है. शाम को घर जाने के लिए स्टेशन पहुँची तो बाहर निकल रहे यात्रियों में एक जाना पहचाना चेहरा नज़र आया.

वह थे नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन.

लंदन में ज़्यादातर लोग ट्यूब या बस में सफ़र करते हैं और उसमें किसी तरह की झिझक महसूस नहीं करते.

कार होती है लेकिन उसे स्टेशन पर पार्क कर दिया जाता है और अंडरग्राउंड ट्रेन के ज़रिए दफ़्तर आना-जाना होता है.

दिल्ली में बसों या ऑटो में सफ़र करना कोई बहुत शान की बात नहीं मानी जाती. अपनी कार न हो तो टैक्सी तो हो.

बसें तो वहाँ ग़रीबों की सवारी हैं और ऑटो मध्यमवर्ग की. मैंने ऐसे भी लोग देखें हैं जो बस स्टैंड पर खड़े होते हैं और किसी परिचित को आता देख कर थोड़ा आड़ में हो जाते हैं.

क्या भारत में कभी अति विशिष्ट व्यक्ति बसों या मेट्रो में सफ़र करते देखे जा सकेंगे?

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अख़बार बासी तो बेकार

लंदन में अख़बार बहुत भारी होते हैं. यानी एक मुख्य अख़बार और उसके अंदर कई-कई सप्लीमेंट.

अख़बार

अब जब अख़बार पढ़ लिया तो उसका किया क्या जाए? फेंकने के लिए जगह-जगह बिन रखे हुए हैं जिनमें से समाचार पत्र और पत्रिकाएँ निकाल कर उन्हें रीसाइकिल किया जा सके.

लेकिन इतनी तकलीफ़ कौन उठाए. आमतौर पर लोग अख़बारों को अपने घर के क़रीब के ही कूड़े के डिब्बे में डाल देते हैं.

एक तरीक़ा और ढूँढ निकाला है इससे छुटकारा पाने का.

दफ़्तर जाते हुए ट्रेन में अख़बार पढ़ा और उतरते समय उसे चुपके से सीट पर ऐसे छोड़ दिया जैसे भूल गए हों.

मेरे यहाँ जब बहुत से अख़बार जमा हो जाते हैं तो उस वक़्त भारत के कबाड़ी बहुत याद आते हैं.

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कमाल है...

एक साहब लंदन घूमने आए. आकर घर पत्र भेजा. लंदन की बहुत तारीफ़ें लिखीं. यह भी लिखा, "कमाल की बात यह है कि यहाँ बच्चा-बच्चा अंग्रेज़ी बोलता है."

(हमारी साप्ताहिक लंदन डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर).

 
 
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